राजनीति वनाम मोदी जी का गुजरात मॉडल

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gujratराजनामा.कॉम (कनक तिवारी)। भाजपा ने अपना अश्वमेध वाला घोड़ा सिकंदर महान की तरह भारत विजय अभियान के नाम पर छोड़ दिया है. कहता है भारत विजय किए बिना मानने वाला नहीं. पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा का ‘फील गुड‘ और ‘इंडिया शाइनिंग‘ का नारा फील बैड और कांग्रेस शाइनिंग में तब्दील हो गया. उससे सबक लेकर भाजपा बल्कि संघ परिवार ने गुजरात मॉडल के विकास को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने का खुद में जोश भर लिया है.

भाजपा ने घोषित तौर पर लगभग 500 करोड़ रुपयों का अंतर्राष्ट्रीय संचार एजेंसियों जैसे एप्को, वर्ल्डवाइड, अंतर्राष्ट्रीय विज्ञापन एजेंसी ओगिल्वी एंड माथेर की सहायक कंपनी सोहोस्क्वेयर तथा मैक्कान वर्कग्रुप की सहायक कंपनी टैग को प्रचार और अफवाह अभियान ठेका दे रखा है. इनमें से कुछ एजेंसियां पिछले लोकसभा चुनाव के पहले से ही भाजपा के पक्ष में कार्यरत रही हैं.

अटलबिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एन.डी.ए. सरकार के अभियान में प्रमोद महाजन के संयोजकत्व में भाजपा ने 150 करोड़ रुपयों का व्यय किया ही था. चुनाव में औसतन प्रत्येक उम्मीदवार आसानी से 5 करोड़ रुपयों तक खर्च कर लेगा. दिल्ली फतह करने का यह अंतर्राष्ट्रीय प्रचार-बुद्धि का भारतीय राजनीतिक अनुभव-उत्कर्ष बनने का संभावना क्षण लाया गया है.

संघ परिवार की चतुर कूटनीति है कि गुजरात के विकास मॉडल की तुरही बजाते समय अपने स्थायी एजेंडा सांप्रदायिक धु्रवीकरण को भूलना श्रेयस्कर नहीं होगा. देश में छोटे मोटे सांप्रदायिक दंगों तथा विवादों के चलते हिंदू मुस्लिम सौहार्द्र की पतली त्वचा को उस घाव के ऊपर से खरोंचा जाता रहा जो भारत विभाजन के पहले से कुछ लोगों द्वारा स्थायी नासूर बनाए जाने के कुचक्र का शिकार है. गुजरात का विकास मॉडल उस खरोंच पर भी मलहम की तरह लगाता दिखाया जाए लेकिन सौहार्द्र की त्वचा को पपड़ियाने नहीं दिया जाए. यही तो विराट मोदी अभियान की नई महाभारत का युद्ध पर्व है.

यदि सुप्रीम कोर्ट नहीं होता तो ऐसा ही अभियान अयोध्या में लंका कांड में तब्दील होने को सदैव बेताब रहता. संघ परिवार के आंतरिक रणनीतिकार यह स्वीकार करने में गुरेज नहीं कर सकते कि गुजरात विकास मॉडल के आर्थिक उद्घोष औैर सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के सांप्रदायिक आग्रह को समानांतर के बदले अंतर्निर्भर रणनीति का हिस्सा बनाया जाए. इस बार सोमनाथ से आडवाणी के नेतृत्व में अयोध्या की धार्मिक यात्रा नहीं बल्कि नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वडोदरा से वाराणसी होते हुए दिल्ली की राजनीतिक यात्रा की जाए.

भाजपा की कई सरकारें खुले आम प्राकृतिक संसाधनों, लौहअयस्क, कोयला, जंगल, जमीन, बॉक्साइट वगैरह बहुत बड़े उद्योगपतियों को खैरात की तरह दे रही हैं. कांग्रेस उसमें से आरोपों के अनुसार छोटा हिस्सा मिल जाने से ही इतनी खुश दिखाई देती है कि न तो जनआंदोलन कर पाती है. न ही न्यायालयों में परिणामधर्मी मुकदमे लड़ पाती है. अपराध जगत में ऐसा भी समय आता है जब चोरी करने वाले पकड़े जाते हैं और डकैत मूंछों पर ताव देते दाऊ या ताऊ कहलाते हैं.

उसका यह भी कारण है कि दोनों बड़ी राष्ट्रीय पार्टियों के आर्थिक फलसफे का कंस्ट्रक्ट और टेक्स्ट तो एक ही है. दोनों किसान विरोधी, मजदूर विरोधी, गरीब विरोधी और छोटे व्यापारी विरोधी भी हैं. दोनों के वैश्विक तथा भारतीय उद्योगपतियों से कारोबारी और सियासी रिश्ते हैं. दोनों में अंतर केवल नेतृत्व के चेहरों का है. एक पार्टी कहती है उसने आर्थिक चिंतन के सरदार को नेता चुना. दूसरी पलटकर कहती है उसने असरदार नेता को चुना है.

नेता या चेहरा कोई भी हो वह तो राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था का सरदर्द था और बनने ही वाला है. हिंदुत्व की विजय की महत्वाकांक्षा के कुलांचे भरते हुए यह संघ परिवार और भाजपा को रास आया कि विकास की कांग्रेसी असफलता को प्रतिद्वंद्वी आर्थिक मॉडल दिखाकर दोनों लोक साध लिए जाएं. गुजरात में हुए 2002 के दंगों से दक्षिणपंथी योजनावीरों को निश्चित तौर पर आघात लगा था. कांग्रेस और अन्य विरोधी दलों ने कटुतम आलोचना भले की. वे भाजपा की अगली कार्ययोजना को कमतर आंकते रहे. एन.डी.ए. के अन्य साथी घटक दलों को भी यह सूंघना संभव नहीं हुआ कि अंततः भाजपा का एजेंडा क्या है.

यह था वह मनोवैज्ञानिक वातावरण जिसके तहत भाजपा ने इंडिया शाइनिंग के अपने पुराने 2004 के नारे को नई बोतल में भरा. नवउदारवाद, निजीकरण तथा वैश्वीकरण की समर्थक ताकतों को भाजपा ने अपने राजनीतिक छाते के नीचे खड़े करने का जतन भी किया. देश के पहले दस बड़े नव धनाड्यों में से अधिकांश ने भाजपा के कार्यवृत्त को लेकर हामी भर दी. अतिरिक्त लाभ यह मिला कि जो गुजरात पहले से ही कांग्रेस के कार्यकाल में विकसित रहा, उसका भी श्रेय लूटने में मोदी ने कोई हिचकिचाहट नहीं की.

पुराने तथ्यों, आंकड़ों, उपलब्धियों वगैरह को मोदी प्रशासन की छबि को रोशन करने के काम में इस तरह इस्तेमाल किया गया कि जनस्मृति को पुराना कुछ भी याद नहीं रहा. सब कुछ नया नया लगा. इसी बीच मोदी और उद्योगपतियों की अंतरंग मुलाकातें संख्या और पारस्परिकता में बढ़ती रहीं. लक्ष्य एक था. शक्तियां दो. धनुष उद्योगपतियों का और तीर पर भाजपा तथा मोदी का नाम लिखा गया.

मूलतः कुछ नहीं बदला. हिंदुत्व का नया नामकरण गुजरात का विकास मॉडल हुआ. केवल विकास मॉडल कहने से बिहार, महाराष्ट्र और तमिलनाडु वगैरह के भी उस सूची में घुस जाने के अफसाने बुने जाते. 2002 के गुजरात दंगों के दाग को मिटाने के लिए पार्टी कार्यकर्ताओं को हटाकर बाजार को केन्द्रीय भूमिका दी गई. विदेशी विज्ञापन एजेंसियों को पार्टी के मस्तिष्क का चीरघर बनाया गया. कार्यकर्ता संघ दक्ष की आवाज़ पर घुटनों घुटनों रेंगते भर रहे.

अमेरिकी चुनावों में धनबल का उपयोग होता है. उस फेनोमेना को भी पछाड़ने के गुर सिखाए जाने लगे. चुनाव प्रचार मतदाताओं को रिझाने या प्रभावित करने के बदले उनमें नई संस्कारशीलता डालने का माध्यम बनाया गया है. चुनाव परिणाम चाहे जो हो. भाजपा और मोदी के पक्ष में केवल वोट नहीं चाहिए. इस विचारधारा की मर्यादा के खूंटे से मतदाता को बांधने का जतन किया जा रहा है. यह वाचाल प्रचार हुआ कि 2002 के बाद गुजरात दंगामुक्त प्रदेश है, जबकि बाकी राज्य ऐसा दावा नहीं कर सकते.

गुजरात के मुसलमान इस कदर भयभीत कर दिए गए हैं कि उनकी ओर से दंगा करने की संभावनाएं ही नहीं हैं. मोदी के नेतृत्व में बकरी के मुकाबले यह शेर की प्रकृति की हिंदू सांप्रदायिकता है जो पुचकार की मुद्रा में दहाड़ लेती है कि वह बकरी के साथ एक ही घाट में साबरमती का पानी पी रही है. मोदी ने वह काम कर दिखाया जो विपरीत तरह के हिन्दू गांधी ने भी नहीं किया था. गुजरात में गांधी का कोई नामलेवा रहेगा-यह भी संदेह है.

नरेन्द्र मोदी मिथक पुरुष की तरह प्रचारित हैं. वे अक्षम कांग्रेस नेतृत्व की असफलता का पर्दाफाश करते नए रक्षक के रूप में बाज़ार में खुद अपनी ब्रांडिंग करने में मशगूल हैं. यह तय है कि अंबानी, अदानी, टाटा, रुइया, मित्तल, जिंदल, अनिल अग्रवाल जैसे बीसियों बड़े उद्योगपति देश के सरकारी और आम जनता के संसाधनों के कब्ज़ेदार बना दिए जाएंगे. इन घरानों में से कुछ ने मीडिया पर भी अपना मालिकी हक और दबदबा कायम कर लिया है. विरोध की आवाज़ें भी मीडिया की ही मोहताज़ होती हैं. (साभारः रविवार)

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