राजनीतिक प्रदूषण के बावजूद कांग्रेस और भाजपा में ही टक्कर

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राजनामा.कॉम (डॉ. पुरुषोत्तम मीणा) पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव सामने हैं और राजनेता राजनीतिक भाषणबाजी के प्रदूषण की लपेट में मतदाता को गुमराह करने में पीछे नहीं हैं। किसी भी जनतान्त्रिक शासन व्यवस्था में चुनाव लोकतन्त्र का वो पावन पर्व होता है, जिसमें जनता को अपने पिछले चुने हुए प्रतिनिधियों से पांच वर्ष के कार्यकाल का लेखाजोखा पूछने का एक संवैधानिक अवसर होता है, जबकि अगले पांच वर्ष के लिये अपने क्षेत्र की जरूरतों और अपने क्षेत्र की समस्याओं के निदान के लिये जनप्रतिनिधि चुनने का अवसर होता है।

लेकिन इस बार के इन पांच राज्यों के चुनावों पर राष्ट्रीय दलों की आपसी बयानबाजी का प्रदूषण इतना प्रभावी होता जा रहा है कि असल मुद्दे और जनता की लोकतान्त्रिक इच्छाएँ गौण होती जा रही हैं। जनता क्या चाहती है, इस बात से किसी भी दल को कोई मतलब नहीं है। हॉं हर कोई सामने वाले को खुद से अधिक निकम्मा सिद्ध करने का भरसक प्रयास करने में जरूर लगा हुआ है, जिसके लिये झूठ का भी जमकर उपयोग किया जा रहा है। तथ्यों को तोड़ा और मरोड़ा भी जा रहा है।

ऐसे हालात में पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में प्रादेशिक मुद्दों को चुनावी पटल से पूरी तरह से नकारने वाले राजनैतिक दल मतदाता को नासमझ और बेवकूफ समझने की बड़ी भारी भूल कर रहे हैं। यही नहीं मतदाता को बेवकूफ बनाने के लिये जहॉं एक ओर सोशल मीडिया का सहारा लिया जा रहा है, वहीं दूसरी और इलेक्ट्रोनिक एवं प्रिंट मीडिया को खरीदकर पेड न्यूज दिखाई एवं प्रकाशित करवाई जा रही हैं।

बनावटी सर्वे करवाकर जनता में इस बात का नाटकीय वातावरण बनाया जा रहा है कि अब तक जो कुछ भी हुआ वो सब बकवास है और अब जो कुछ होने वाला है, उसके लिये भारतीय राजनीति में एक महामानव का अवतार हो चुका है, जो चुटकी बजाते ही सब कुछ ठीक कर देने वाला है। इसलिये आसाराम की भांति उस महामानव को मतदाता को अपना मत ही नहीं आस्था भी और सब कुछ समर्पित कर देने का समय आ गया है।

पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बहाने 2014 में प्रस्तावित लोकसभा चुनावों की अभी से तैयारी शुरू की जा रही है। बल्कि ये कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा कि सत्ता से बाहर बैठे प्रतिपक्ष के लिये पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की परवाह करने से कहीं अधिक नयी दिल्ली की कुर्सी की तैयारी अधिक की जा रही है। इस बात की किसी को परवाह नहीं है कि यदि दो बड़े राजनैतिक दलों में से जिस किसी को भी पांच विधानसभा चुनावों में जनता निरस्त करेगी, वह तो धराशाही हो ही जाना है। यदि फिर भी वो खुद को धराशाही नहीं भी मानता है तो 2014 में उसे सब कुछ स्पष्ट हो जाना है।

इस प्रकार के हालातों से निपटने के लिये राजनेताओं का एक मात्र यही ध्येय है कि किसी भी प्रकार से जनता का असल मुद्दों से ध्यान हटाया जावे, जनता को भटकाया जावे और चुनावों के दौरान जनता की भावनाओं को भड़काकर येनकेन प्रकारेण अपने-अपने पक्ष में मतदान करने का प्रयास किया जावे।

जबकि इसके विपरीत भारत की जनता जो सब कुछ जानती है और समय आने पर हथौड़े की चोट मारने से नहीं चूकती है। जनता देख रही है कि उद्योगपतियों को छूट प्रदान करने के लिये, अफसरों को मोटीˆमोटी तनख्वाह और सुविधाएँ देने के लिये और राजनेताओं के ऐशोआराम के लिये मंहगाई की कोई परवाह नहीं है।

जनता पर लगातार करों की मार पड़ रही है और जीवन रक्षक जरूरत के सामानों की लगातार कीमतें बढने दी जा रही हैं। जमाखोरों पर कोई लगाम नहीं है। बिचोलियों की चांदी हो रही है। हर क्षेत्र में दलालों का राम्राज्य है। प्रशासन में अन्दर तक भ्रष्टाचार है। जिसका माकूल जवाब आने वाले समय में जनता सभी सत्ताधारी दलों को देने जा रही है।

वहीं दूसरी ओर राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिपक्ष की भूमिका निभाने वाली, लोकसभा को नहीं चलने देने में माहिर और सत्ता सुख के लिये बेसब्र भाजपा का परम्परागत मतदाता आने वाले विधानसभा चुनावों में भाजपा को इस बात का जवाब देने जा रहा है कि दो सदस्यों से नयी दिल्ली की कुर्सी तक जिन तीन मुद्दों के बल पर भाजपा की प्रगति हुई वे तीन मुद्दे अर्थात राममन्दिर, समान नागरिक संहिता और कश्मीर अब कहॉं पर हैं?

आज मतदाता के समक्ष सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या भाजपा का चाल, चरत्रि और चेहरा बदल गया है? यदि हां तो फिर भाजपा को सत्ता में लाने से क्या हासिल होने वाला है? इस बात पर भी मतदाता गम्भीरता से विचार कर रहा है!

जहां तक पांच राज्यों की विधानसभाओं में चुनावी संघर्ष की बात है तो आमने-सामने की टक्कर तो भाजपा और कॉंग्रेस में ही मानी जा रही है। यद्यपि दिल्ली में आम आदमी पार्टी ताल ठोक रही है। राजस्थान में राष्ट्रीय जनता पार्टी और म. प्र. एवं राजस्थान में बहुजन समाज पार्टी भी सदा की भॉंति अपनी उपस्थिति फिर से दर्ज कराने को बेताब है।

दिल्ली में आम आदमी पार्टी निम्न तबके के लोगों को बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाती रही है, लेकिन कुछ ही समय में इस पार्टी और इस पार्टी के सुप्रीमो अरविन्द केजरीवाल की हकीकत जनता के सामने आ चुकी है। वैसे आम आदमी पार्टी का संविधान उठाकर देखेंगे तो पायेंगे कि इस पार्टी के संविधान में आम आदमी का जिक्र तो बारˆबार किया गया है, लेकिन जहॉं कहीं भी आम आदमी को पार्टी के मंच पर प्रतिनिधित्व प्रदान करने का जिक्र आया है तो उसमें आम आदमी को प्रतिनिधित्व प्रदान करने के बजाय इस बात की पुख्ता व्यवस्था की गयी है कि आम आदमी और दबे कुचले वर्ग को किसी भी सूरत में आम आदमी पार्टी की नीतियों के निर्धारण में निर्णायक भूमिका नहीं होगी। इससे इस बात का प्राथमिक तौर पर ही अनुमान लगाया जा सकता है कि आम आदमी के नाम पर बनायी गयी पार्टी का भविष्य क्या होगा!

जहां तक राजस्थान में पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी का हिन्दीकरण करके इसे राष्ट्रीय जनता पार्टी के रूप में प्रचारित करने वाले आदिवासी नेता और पूर्व जनसंघी डॉ. किरोड़ी लाल मीणा की पत्नी गोलमा देवी मीणा के नेतृत्व में प्रदेश के सभी क्षेत्रों में हुंकार भरने और किसान-आदिवासी को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने की बात करने का सवाल है, तो आम जनता इस प्रकार की बातों को कोई भाव नहीं दे रही है।

ये बात अलग है कि आम आदमी पार्टी और नेशनल पीपुल्स पार्टी अनेक सीटों पर भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही नुकसान पहुँचाने का काम जरूर बखूबी करने वाली हैं। चुनाव बाद जहां “आप” के केजरीवाल की ओर से किसी को समर्थन नहीं दिये जाने की बात पर “आप” पार्टी के मतादाताओं को विश्‍वास है, वहीं राजस्थान में डॉ. किरोड़ी लाल मीणा के अन्धभक्त मतदाता भी इस बात को खुलकर स्वीकार कर रहे हैं कि अगली राजस्थान सरकार डॉ. मीणा के समर्थन के बिना नहीं बन सकेगी और फिर खूब मोलभाव करने का मौका मिलेगा!

बसपा के इतिहास पर नजर डालें तो म. प्र. और राजस्थान में बसपा के टिकिट पर जीतकर आने वाले विधायक चुनाव के बाद हर बार अपनी पार्टी बदलते रहे हैं। उनका चुनाव जीतने के बाद बसपा सुप्रीमो मायावती से मोहभंग हो जाता रहा है और वे सत्ता का सुख भोगने को बेताब होते रहे हैं। इस इतिहास से इस बार मतदाता को इस बात का अहसास हो चुका है कि यदि बसपा के प्रत्याशी को चुनाव जिताया तो ये बात तय है कि वो निश्‍चित रूप से सत्ता के करीब पहुँचने वाली पार्टी का दामन थामेगा। इसलिये इस बार बसपा की स्थिति बहुत अच्छी रहेगी इस बात की बहुत कम उम्मीद की जा सकती है। पिछले परिणामों को दोहराने की अपेक्षा करना भी उचित नहीं लगता है। ऐसे में कॉंग्रेस और भाजपा के बीच ही असल टक्कर होने वाली है।

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