रांची में हो रही है यह कैसी पत्रकारिता ?

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वरिष्ठ लेखक-पत्रकार कृष्ण बिहारी मिश्र अपने फेसबुक वाल पर……

कल की ही बात है… मैं रांची स्थित भाजपा मुख्यालय में था, नगर विकास मंत्री सी पी सिंह, भाजपा मुख्यालय के भूतल स्थित किसान प्रकोष्ठ में बैठे थे, उनके चाहनेवालों की भीड़ चारो ओर से उन्हें घेरे थी, तभी जीटीवी का कैमरामैन पहुंचा और सी पी सिंह को एक बाइट देने को कहा।
सी पी सिंह – किस संदर्भ में बाइट लेना है।
जीटीवी का कैमरामैन – अरे वहीं हत्या हो रहा है, न देश में, उसके बारे में।
सी पी सिंह – कौन सी हत्या, कैसी हत्या।
जीटीवी का कैमरामैन – अरे वहीं, किसान सब हत्या कर रहा है न।
सी पी सिंह – अरे भाई किसान किसी की हत्या क्यों करेगा? आप बताइये न कि आपको किस संदर्भ में बाइट चाहिए, मंदसौर पर चाहिए या महाराष्ट्र वाले पर।
जीटीवी का कैमरामैन – अरे भाई हम नहीं जानते, आप ऐसा करिये कि हमारे ब्यूरो चीफ का नंबर है न, उन्हीं से पूछ लीजिये, कि वो क्या बाइट चाहते है? हमको क्या मालूम? अरे हमें क्या? हमलोगों को भेज दिया जाता है और हमलोग चले आते है।
सी पी सिंह – फोन लगाओ जी।
अचानक फोन लगाया जाता है, जीटीवी के ब्यूरो चीफ को, उधर से प्रश्न बताया जाता है और लीजिये, नेता जी तैयार बाइट देने के लिए।
यानी इस प्रकार चल रहा है झारखण्ड में पत्रकारिता। यह केवल एक संस्थान की बात नहीं, बल्कि हर जगह की है, अब कोई भी रिपोर्टर, संवाददाता या ब्यूरोचीफ स्वयं समाचार संकलन करने के लिए नहीं निकलता, उसे लगता है कि वो समाचार संकलन को निकलेगा तो फिर उसकी इज्जत चली जायेगी, वो रिपोर्टर का काम करने के लिए नहीं बना है, वो तो पत्रकारिता का जगदगुरु शंकराचार्य बनने के लिए पैदा हुआ है, और वो यह बनकर रहेगा।

पूर्व में ऐसी बात नहीं थी, रिपोर्टर और कैमरामैन साथ-साथ चला करते थे, पर अब ये प्रथा पूरी तरह समाप्ति की ओर है, रिपोर्टर या संवाददाता या ब्यूरोचीफ अब घर में रहता है और कैमरामैन सारा काम करके चल आता है, बाद में रिपोर्टर, संवाददाता या ब्यूरोचीफ कार्यालय जाता है, और बना-बनाया उसे जब समाचार मिलता है, तब उस समाचार को अपना नाम देकर वह नोएडा या अपनी मनमुताबिक जगहों पर समाचार भेज देता है और मुख्यालय में बैठा व्यक्ति रिपोर्टर, संवाददाता या ब्यूरोचीफ की खूब वाह-वाही करता है। कहीं-कहीं तो कैमरामैन वो सारा काम कर देता है, जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते, यानी काम करे कैमरामैन, नाम हो किसी ओर का।

यहीं नहीं आप यह भी जान लें कि आजकल रिपोर्टर, संवाददाता या ब्यूरोचीफ से भी ज्यादा लोग कैमरामैन को जानने और सम्मान देने लगे है, क्योंकि लोग जानते है कि यहीं सर्वेसर्वा है, ये विजूयल लेगा तभी दिखेगा, रिपोर्टर की कोई औकात नहीं कि उसके द्वारा लाये गये विजूयल को कोई काट दे, क्योंकि जो विजूयल वो लेगा, काटेगा, वहीं न जायेगा।

इधर देखने में आ रहा है कि ज्यादातर राजनीतिक दलों के नेता, विभिन्न प्रशासनिक, सामाजिक व धार्मिक संगठनों के लोग रिपोर्टरों, संवाददाताओं, व ब्यूरोचीफ की जगह इनके कैमरामैनों के मोबाइल नंबर रखे होते है, और समय-समय पर उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रमों की जानकारी देते रहते है, क्योंकि वे जानते है कि कैमरामैन के पास ही हमेशा कैमरा होता है और वो चाहेगा, न्यूज चलेगा, इसलिए वे इन्हीं लोगों से ज्यादा सम्पर्क में रहते है, समय-समय पर इनकी आवभगत भी खूब होती है। यानी रिपोर्टर, संवाददाता या ब्यूरोचीफ से ज्यादा सर्वाधिक लोकप्रिय गर कोई है तो वह है कैमरामैन।

स्थिति ऐसी है कि इन्हीं सभी कारणों से विभिन्न चैनलों के मालिक या संचालनकर्ता अब रिपोर्टर, संवाददाता या ब्यूरोचीफ की जगह सिर्फ कैमरामैन की बहाली कर रहे है, क्योंकि वे जान चुके है कि ये रिपोर्टर, संवाददाता या ब्यूरोचीफ कुछ नहीं करते, केवल ये दबंगई करते है, इसलिए अब ज्यादातर प्रमुख चैनल कैमरामैनों की बहाली कर रहे है, रांची में बहुत सारे ऐसे राष्ट्रीय चैनल है, जहां केवल कैमरामैन है, पर वे स्वयं को संवाददाता और ब्यूरोचीफ कहने में गर्व महसूस करते है, जो सफेद झूठ के अलावा कुछ भी नहीं है।

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