रांची के ऐसे पत्रकार संगठन के अध्यक्ष और अखबार के संपादक पर मुझे शर्म है

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-: मुकेश भारतीय :-

बनिया सिर्फ बनिया होता है। वह सब कुछ अपनी नफा-नुकसान के तराजू पर तौलता है। यदि हम रांची के पत्रकारों की बात करें तो प्रायः वे ऐसे ही बनिया नजर आते हैं। बात जब किसी संपादक-प्रकाशक-पत्रकार की हो तो उनकी बनियागिरी काफी स्पष्ट हो जाती है।

आगे लिखने से पहले स्पष्ट कर दूं कि बनिया शब्द का आशय किसी जाति विशेष से नहीं है। बल्कि मूल सांकेतिक डंडीमार धंधे से है। जिसकी व्यापक पैमाने पर व्याख्या करने के साथ आत्म चिंतन-मंथन होनी चाहिये।

बीते कल एक पत्रकार संगठन के अध्यक्ष और एक दैनिक अखबार के संपादक से मुलाकात-बात हुई। ये महाशय रांची प्रेस क्लब तदर्थ सदस्यता कमिटि में भी शामिल हैं। इनसे मिलने का आशय इन्हें यह जतलाना था कि रांची प्रेस क्लब की सदस्यता में जो कुछ भी हुआ है या फिर जो कुछ भी हो रहा है, वह कितना उचित या अनुचित है।

लेकिन कहां किसी ख्बाव पूरी हुई है, हर शख्स की आरजू अधूरी रही है। एक टीवी जर्नलिस्ट के अनुरोध पर वहां गया था। शायद पत्रकार संगठन चलाने वाले दैनिक अखबार के संपादक से कुछ सकारात्मक समझने का सुअवसर मिले। लेकिन हुआ सब उम्मीदों के विपरित सब कुछ उल्टा।

सच पुछिये तो उस महाशय के वे शब्द मेरे कान में उबलते गर्म शीशे से कम न थे, जब उन्होंने कहा कि उन्होंने मनोज शर्मा नामक पत्रकार को सिर्फ जलील करने की मंशा से रांची प्रेस क्लब का सदस्य बनने नहीं दिया। क्योंकि उसने मेरे अखबार में काम करने के बाद पैसे न देने को लेकर सोशल साइट पर लिख दिया था।

आगे लिखने के पहले मैं बता दूं कि मनोज शर्मा कौन हैं। मनोज शर्मा जी का मैं सम्मान करता हूं। मैं क्या सैकड़ों युवा पत्रकार बन्धु करते हैं।  मनोज शर्मा एक वेबाक पत्रकार के साथ रांची विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एंव जन संचार विभाग में प्राध्यापक हैं।

मीडिया में प्रयुक्त कंप्युटर सॉफ्टवेयर के साथ समाचार लेखन की बारिकियों पर उनकी अच्छी पकड़ है, जो अपने छात्रों की मस्तिष्क में दिल खोल कर उकेरने में वे कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। मैं भी उनका शिष्य रहा हूं। उनकी बेहतरीन कबलियत को अच्छी तरह जानता हूं। कोई उस पर सबाल उठाये, किसी कीमत पर मंजूर नहीं। वे बेबाक पत्रकार हैं। व्यवस्था और परिस्थिति के तलवे चाटने वाले संपादक पत्रकार या अपनी स्वार्थ हित में संगठन चलाने वाले लोगों से उनकी कद्र की अपेक्षा भी नहीं करता।

एक पत्रकार को जलील करने की मंशा दिखाने वाले संगठन-अखबार के रहनुमा महाशय के बारे में एक बात बता दूं कि एक बार मैं राजनामा.कॉम के संपादक की हैसियत से मिलने गया था। उनकी अगुआई में एक चैनल लांच हो रहा था। मेरा इरादा था झारखंड की पत्रकारिता और भविष्य पर उनकी सोच जानना।

लेकिन जैसे मैंने उन्हें सादर शब्दों से 2-3 मिनट समय की मांग की तो अचानक उबल पड़े- ‘ देखो यार मेरे पास नौकरी-वौकरी नय है। समय नहीं दे सकते।’ तब मैंने “ क्या मैं आपको नौकर दिखता हूं” कह कर फौरन निकल गया था।

कल उस संगठन संचालक और संपादक की बात सुनने के बाद एक बात तो बिल्कुल साफ हो गई कि कथित रांची प्रेस क्लब की तदर्थ सदस्यता कमिटि ने सदस्यता प्रदान करने के क्रम में निजि खुन्नस निकाली है। सबने पहले से ‘एक नीजि सूची’ तय कर रखा था कि इन्हें किसी कीमत पर सदस्य नहीं बनानी है और उन्हें सार्वजनिक तौर पर जलील करनी है। उनकी इस ओछी मुहिम में सूची 250 पहुंच गई। क्योंकि सदस्यता कमिटि के प्रायः सदस्य इस हमाम में नंगे रहे।

सबाल उठता है कि पत्रकारों की हित में लड़ाई लड़ने के ढिंढोरे पीटने वाले एक नामचीन संगठन के अध्यक्ष और एक दैनिक अखबार के संपादक की मानसिकता जब इतनी ओछी हो तो पत्रकारिता का लिबास ओढ़ सिर्फ दलाली करने वालों से क्या उम्मीद किया जाये?

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