रघु’राज एक सचः सुशासन का दंभ और नकारा पुलिस तंत्र

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रांची (मुकेश भारतीय)। झारखंड के सीएम रघुबर दास राज्य में सुशासन की बात करते हैं लेकिन क्या वाकई यहां कानून का भय कहीं दिखता है ? यदि उनके दो साल के राज खासकर हाल के दिनों की पड़ताल की जाये तो सब कुछ दलगत सत्ता-तंत्र से जुड़े लोगों तक ही सीमित नजर आता है। शासन- प्रशासन का निचला तबका हो या आम आदमी। वह गुंडों और अपराधियों की रहमोकरम पर अधिक निर्भर प्रतीत हो रहा है।

आरटीसी इंजीनियरिंग कॉलेज की छात्रा के साथ राजधानी के भीतर जो कुछ जिस निर्दयता से हुआ, उसने निर्भया की बरसी पर एक कलंक बन गया। इस मामले में समूचा पुलिस महकमा घटना के पखबारे बाद भी पूर्णतः नकारा साबित है। उसकी सीआईडी और एसआईटी की टीम भी कोई सुराग नहीं पा सकी। डीएसपी, एसएसपी, एसपी, डीआईजी, आईजी से लेकर डीजीपी तक शुरु से ही कभी 24 घंटे तो कभी 72 घंटे के भीतर अपराधियों को गिरफ्त में लेने की ढिंढोरे पीटते रहे लेकिन अभी तक सब कुछ हवा-हवाई ही निकला है। इधर पीड़िता के परिजन की फरियाद पर सीएम ने 3 दिनों के भीतर अगर उस जघन्य अपराध का खुलासा नहीं हुआ तो मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की अनुसंशा कर दी जायेगी।

इस मामले का खुलासा न होने और उसे सीबीआई को सौंपते ही  यह बात बिल्कुल साफ हो जायेगी कि पुलिस घातक अपराधों पर अंकुश लगाने में असक्षम है। आम जन जीवन के बीच उत्पन्न भय का माहौल और भी गहरायेगा।

दूसरी घटना राजधानी रांची की प्रथम महिला यानि मेयर आशा लकड़ा से जुड़ी है। एक तरफ सीएम ट्रैफिक वालों को बिना किसी दबाव के काम करने का दम भरते हैं, वहीं दूसरी तरफ कोई ट्रैफिक पुलिस कायदा कानून की बात करता है तो उसे तत्काल सस्पेंड कर दिया जाता है। मेयर भाजपा की चहेती हैं। इसका मतलब यह थोड़े है कि वह कानून का पालन करने के बजाय मनमर्जी करेगी। बीच सड़क पर अपनी गाड़ी खड़ी कर हंगामा बरपायेगी।

सबसे शर्म की बात तो यह है कि उपर स्तर के अधिकारी लोग राजनेताओं की तलवा इस कदर चाटते हैं कि बिना किसी जांच-पड़ताल के कनीय लोगों के विरुद्ध पलक झपकते कार्रवाई कर डालते हैं।

तीसरी घटना जमशेदपुर के आदित्यपुर थाना की है। वहां एक प्रभावशाली व दबंग भाजपा नेता संप्रति महानगर उपाध्यक्ष भूपेंद्र सिंह,जो सीएम रघुवर दास के करीबी का धौंस जमाता है, उसके भाई कंचन सिंह ने अपने गुर्गों के साथ दारु के नशे में पहले मांडर विधायक गंगोत्री कुजूर की बेटी गम्हरिया सीओ कामिनी कौशल लकड़ा के साथ बदसलुकी की। फिर बीच सड़ पर हंगामा मचाया। आम भीड़ को आक्रोशित होते देख आदित्यपुर पुलिस सबको थाने ले आई। जहां पर सत्ता मद में चूर कंचन सिंह और उसके गुर्गों ने जमकर उत्पात मचाया। पुलिस वालों भद्दी-भद्दी गालियां दी। एक महिला समेत कई पुलिस वालों को पीट दिया।

इस मामले को लेकर जब थाना पुलिस द्वारा गैर जमानतीय धाराएं लगा कर आगे की कानूनी कार्रवाई शुरु की तो डीएसपी और एसपी स्तर से तत्काल सुपरविजन करते हुये एफआईआर को ही जमानती बना दिया।

बकौल झारखंड पुलिस मेंस एसोसिएशन, अपनी पोस्टिंग बचाने के लिए सरायकेला के एसपी संजीव कुमार और डीएसपी सुमित कुमार ने कानून तोड़ने वालों की मदद की। रघुवर सरकार दोनों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करे।

बहरहाल यह सब घटनाएं तो बानगी है। हकीकत हर तरफ काफी गहरी है। आकड़े बताते हैं कि झारखंड पुलिस में सिपाही से इंस्पेक्टर तक 87% हैं और डी एस पी से डी जी तक 13 % हैं। लेकिन हैरानी की बात है कि 87% को 13 % संचालित नहीं करती है बल्कि उन पर हुकूमत चलती है। जबकि 87% वाले 24 घण्टे आम जनता से सीधे जुड़े रहते हैं। फिर भी 13% से जनता की भेंट होली, दिवाली, ईद की तरह होती है। गुड वर्क 13% के नाम और बदनामी 87% के नाम।

इसमें कोई शक नहीं कि 87% में ढेर सारे अच्छे, कर्मठ, ईमानदार, जनता में लोकप्रिय पुलिसकर्मी भी हैं। पुलिस की जो भी गरिमा बची खुची है, वह सब इन्ही की बदौलत है। ऐसे लोगों को प्रेस (मीडिया) भी अपेक्षित सहयोग नहीं करती।

जरुरत है कि सुशासन का दंभ भरने वाली सरकार पुलिस व्यवस्था को अंदर से दुरुस्त करे। राज्य के सुरुप रांची सरीखे शहरों में कर्मठता और योग्यता के आधार पर मजबूत पुलिस तंत्र खड़ा कर उसे कुरुप होने से बचाया जाना चाहिये। क्योंकि आम धरणा यही है कि सुखदार स्थानों पर कहीं अधिक रसुखदार अकरमण्य पुलिस अफसरों की अधिक पोस्टिंग होती है।

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