रघुबर जी, शराबबंदी को लेकर अपनी बाट न लगाईए

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mukesh bha-: मुकेश भारतीय :-

नशेड़ी ही नशे की बात करता है। झारखंड के सीएम रघुवर दास ने बिहार के सीएम नीतिश कुमार के उस बयान पर अपनी प्रतिक्रिया दी है, जिसमें श्री कुमार ने कहा था कि झारखंड सरकार को घमंड का नशा हो गया है।

वेशक श्री दास के इस प्रतिक्रिया को आक्रामक नहीं कहा जा सकता। राजनीतिक विश्लेशक इसे अपरिपक्वता का परिचायक मानते हैं। बकौल रघुवर, यह कहना कि बिहार के सीएम को जातिवाद का नशा है।, भ्रष्टाचार का नशा है और घमंड का भी नशा है। वो हमसे नशा की बात कर रहे हैं।

आखिर नीतिश कुमार ने क्या बुरा कहा। बकौल नीतिश, समूचे बिहार में शराबबंदी सख्ती से लागू है और झारखंड की सीमा पर शराब की नई-नई दुकाने खुल रही है। लेकिन वे बिहार की जनता को शराब का गुलाम बनाए रखने की मंशा को सफल नहीं होने देगें। पड़ोसी राज्यों से शराब पीकर आने वाले तथा शराब कारोबारी बिहार के कानून की गिरफ्त में आएगें तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी। शराबबंदी के मुद्दे को लेकर जल्द ही वे व्यापक रणनीति के साथ झारखंड को आंदोलित करेगें।

nitish_kumarदरअसल नीतिश सरकार ने अन्य पड़ोसी राज्यों की सरकारों के साथ रघुवर सरकार को भी बिहार में लागू शराबबंदी के मुद्दे पर सहयोग करने की अपील पत्र भेजा था। खुद नीतीश जी को यह उम्मीद थी की भौगोलिक एवं सामाजिक संरचना के मद्देनजर रघुबर जी व्यक्तिगत तौर पर रुचि लेगें और उनके मुहिम को बल देगें। लेकिन बतौर सीएम रघुबर जी ने दो टूक जबाब भेज डाला कि इस विषय को राज्य उत्पाद विभाग को भेज दिया गया है। जाहिर है कि एक सीएम को किसी पड़ोसी कद्दावर सीएम के पत्र को इस तरह हल्के ढंग से नहीं लिया जाना चाहिए था। लेकिन बाकई हुआ उल्टा। बिहार की सीमा से सटे झारखंड हलके में शराब माफियाओं ने अपनी दुकानों की बाड़ लगा दी। जाहिर है रघुवर जी ने जो पत्र उत्पाद विभाग को अग्रेसित किया, उसकी आड़ में उसके अधिकारियों ने उसे कमाई का जरिया बना दिया।

बिहार में लागू शराबबंदी से लोग खुश हैं। आधी आबादी तो नीतिश जी को एक अवतार के रुप में देख रही है। शराबबंदी से वहां चोरी-चकारी, छिनतई, मारपीट, झगड़ा-झंझंट में काफी कमी आई है। सड़क हादसों का ग्राफ काफी तेजी से नीचे गिरा है। शराब के आदि लोग भी दुआ कर रहे हैं कि किसी सुरत में उन्हें नशा की लत न लगे।

सबसे बड़ी बात कि नीतिश जी कोई अपरिपक्व नेता नहीं रह गए हैं। उन्होनें श्री अटलबिहारी वाजपेयी और श्री लालकृष्ण आडवाणी सरीखे दिग्गज भाजपा नेताओं की टीम में सराहनीय काम किया है। कोई 4 फीसदी आबादी के बल जाति का नशा नहीं कर सकता। बिना जमात के समर्थन मिले कुर्सी पर पुनः काबिज नहीं हो सकता। विगत चुनाव में नीतिश जी को आधी आबादी का भरपूर समर्थन मिला। जिसे बड़े से बड़े राजनीतिक सूरमा नहीं भांप सके। उस समर्थन का मूल कारण शराबबंदी का वादा ही था।

नीतिश ने भ्रष्टाचार के मामले में भी सदैव कड़ा रुख अख्तियार किया है। अगर उनमें घमंड का नशा होता तो खुद को गरीब राज्य का अदद सेवक के रुप में प्रचारित नहीं करते।

उसे कौन भूल सकता है कि भाजपा के ही तत्कालीन उपमुख्यमंत्री और वित्तमंत्री शुशील कुमार मोदी ने अत्याधिक राजस्व जमा करने की लालच में शहर से गांव तक की जिंदगी शराब के हवाले कर दी थी। उस समय भी नीतिश कुमार ने व्यक्तिगत तौर पर इसे समाज हित में गैरजरुरी स्रोत बताया था। सरकार गठबंधन की थी। शराब माफियाओं के दबाव में वे बेचैनी महसूस कर रहे थे और जब मौका मिला तो अपने ईरादे साफ कर दिए।

raghubar dasसच पुछिए तो आज झारखंड की बदहाली का एक बड़ा कारण हड़िया और शराब ही है। सिडिंकेट माफियाओं ने तो यहां भी शहर हो या गांव, हर तरफ अपनी आगोश में ले रखा है। राज्य के सबसे बड़े कद्दावर नेता शिबू सोरेन, जिनके चरण स्पर्ष कर रघुवर जी सदा आशिर्वाद लेते रहे हैं, उन्होंने भी लोगों के सर्वांगिन विकास के लिए खासकर आदिवासी समुदाय से हड़िया-दारु त्यागने की बात करते रहे हैं।

रघुवर जी को यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार में जिस तरह सफल शराबबंदी हुई है और लोगों का भरपूर समर्थन मिला है, उसका सकारात्मक असर झारखंड में  भी देखने को मिल रहा है। यहां की आधी आबादी भी इस बुराई के प्रहारों से बचने को बेचैन है। नशे के आदि लोग भी चाहते हैं कि कोई उन्हें बेहतर जिंदगी जीने में मदद करे। जो कि सरकार से बेहतर कोई अन्य नहीं हो सकता।

पड़ोसी पड़ोसी होता है। पड़ोसी अगर कोई सराहनीय पहल करता है तो उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। रघुवर जी  ने स्थानीय नीति को परिभाषित कर एक इतिहास रचा है। अगर शराबबंदी की दिशा में भी आगे कदम उठाते हैं तो वे राजनीति के मील के पत्थर बन सकते हैं। ऐसे मुद्दों पर टकराव की राजनीति और अपरिपक्वता उनकी  लोकप्रियता में ग्रहण ही लगाएगा।

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