यहाँ सिर्फ़ पेड न्यूज़ नहीं, बल्कि मीडिया ही पूरी तरह पेड है

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media-newsशायद आपको याद होगा कि पिछले लोकसभा चुनाव (वर्ष 2009) और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव (वर्ष 2010) के बाद ‘पेड न्यूज़’ की चर्चा काफ़ी गर्म रही थी। ख़ासकर जब यह सच्चाई सामने आयी कि किस तरह न केवल छुटभैये पत्रकार बल्कि कई बडे़ मीडिया-घराने भी भारी रक़म लेकर अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों की प्रचार-सामग्री को समाचार के रूप में प्रकाशित किया करते थे। उस समय मीडिया द्वारा इस कृत्य की काफ़ी निन्दा-भर्त्सना हुई, जाँच और संगोष्ठियाँ हुईं, प्रेस काउंसिल, एडिटर्स गिल्ड और पत्रकार यूनियनों ने प्रस्ताव पारित करके नुक़सान के यथासम्भव नियन्त्रण और भरपाई की कोशिश की, पत्रकारिता के मूल्यों की हिफ़ाज़त और बहाली की दुहाई दी गयी और फिर सब शान्त हो गया।

अब 2014 के इस लोकसभा चुनाव के दौरान प्रिण्ट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दोनों में फिर ‘पेड न्यूज़’ की भरमार है; लेकिन अब यह सब बड़ी सावधानी और पर्देदारी के साथ हो रहा है। आज मीडिया तरह-तरह के अश्लील, फूहड़ और अवैज्ञानिक कार्यक्रमों और विज्ञापनों से (जैसे – जोश व शक्तिवर्धक दवा, कपिल कॉमेडी नाइट्स, सास-बहू और साज़िश और निर्मल बाबा) भी काफ़ी मुनाफ़ा कमा रहा है। लेकिन जब उपरोक्त तरीक़ों से मीडिया दैत्यों के मुनाफ़े की हवस शान्त नहीं हुई तो उन्होंने ‘पेड न्यूज़’ नामक नया हथकण्डा ईजाद किया। उन्होंने अपनी नज़र चुनावों में नेताओं और चुनावी दलों द्वारा पानी की तरह बहाये जाने वाले पैसे पर टिका रखी है। पहले हुए चुनावों और इन चुनावों में यह नंगे रूप में सामने आया कि कई अख़बार और न्यूज़ चैनल नेताओं से पैसा लेकर उनकी प्रशस्ति में लेख व समाचार प्रकाशित व प्रसारित करें और वह भी विज्ञापन के रूप में नहीं बल्कि बाक़ायदा समाचार और सम्पादकीय के रूप में। ऐसा पाया गया है कि चुनावों के समय कई पत्रकार दलालों की तरह ‘रेट कार्ड’ लेकर नेताओं के ईद-गिर्द घूमते हैं, जिसमें न सिर्फ़ किसी नेता के पक्ष में ख़बरें छापने के रेट लिखे होते हैं, बल्कि इसके भी अलग रेट होते लिखे होते हैं कि विपक्षी उम्मीदार से सम्बन्धित ख़बरें न छापी जायें या उनकी नकारात्मक तस्वीर ही प्रस्तुत की जाये।

‘पेड न्यूज़’ की परिघटना ने भारतीय पूँजीवादी लोकतन्त्र के ‘स्वतन्त्र और निष्पक्ष’ चुनावों के सारे दावों की रही-सही हवा भी निकाल दी है। चुनाव आयोग मीडिया में बढ़ती ‘पेड न्यूज़’ पर काफ़ी दुखी होते हुए इसे तत्काल रोकने की लफ्फ़ाज़ी ज़रूर करता है। दरअसल पूँजीवादी जनतन्त्र के खेल में चुनाव आयोग की भूमिका महज़ एक रेफ़री की ही होती है और उसका यही काम होता है कि पूँजीवादी जनतन्त्र में होने वाली चुनावी नौटंकी साफ़-सुथरे तरीक़े से हो जाये। अब बदलते दौर में पेड न्यूज़ की श्रेणी में सिर्फ़ समाचार ही नहीं बल्कि न्यूज चैनलों पर चलने वाली बहसें व नेताओं के इण्टरव्यू तक पेड होते हैं। 12 अप्रैल, 2014 को ‘इण्डिया टी.वी.’ के कार्यक्रम ‘आप की अदालत’ में आये नरेन्द्र मोदी से की गयी बातचीत भी इसी श्रेणी में आती है; ऐसे कई उदाहरण हैं।

पूँजीवादी मीडिया में ‘पेड न्यूज़’ के बढ़ते ग्राफ़ की ज़्यादा व्याख्या करना या उस पर चिन्ता ज़ाहिर करते हुए मीडिया को वर्गीय हितों से अनुरूप न देखना परले दर्जे की मूर्खता ही होगी। हालाँकि विभ्रमग्रस्त बुद्धिजीवी समुदाय मीडिया में आ रहे इस बदलाव से काफ़ी चिन्तित दिखायी पड़ता है। वे मीडिया पर कारपोरेट के नियन्त्रण को कम करना और पत्रकारों की स्वतन्त्रता चाहते हैं। मौजूदा मीडिया में दिन-ब-दिन आ रही पतनशीलता के बावजूद ये बुद्धिजीवी मीडिया के उजले व सकारात्मक पक्ष को देखने की दुहाई देते हुए मुनाफ़ाख़ोर मीडिया से यह अपेक्षा करते हैं कि वह जनता का पक्ष भी लेगा और वैज्ञानिक तथा प्रगतिशील दृष्टिकोण बनाने में सहायक होगा, ऐसी सोच पर बस हँसा ही जा सकता है।

सच्चाई यह है कि पूँजी की ताक़त से संचालित मीडिया का काम ही – व्यवस्था के पक्ष में ही जनमत तैयार करना है। पूँजीवादी मीडिया मुख्य रूप से तीन काम करता है – पहला बुर्जुआ शासन और सामाजिक ढाँचे के पक्ष में जनमानस तैयार करना, दूसरा एक उद्योग के रूप में मुनाफ़ा कमाना और तीसरा बाज़ार तन्त्र की मशीनरी में उत्पादन का प्रचार करके बिक्री बढ़ाने के नाते अहम भूमिका निभाना। जिस मीडिया जगत में मालिकों की कुल आमदनी का 80 से 100 प्रतिशत विज्ञापनों से आता है। और जहाँ सभी समाचार पत्र, चैनलों के मालिक कारपोरेट घराने हों वहाँ पत्रकारों की स्वतन्त्रता की बात सोचना ही बेमानी है। आलोचना की पूँजीवादी जनवादी स्वतन्त्रता वहीं तक है जहाँ तक व्यवस्था की वैधता पर सवाल न खड़े हों और बुराइयों-कमजोरियों को सुधारने में मदद मिलती रहे। हम पूँजी संचालित मीडिया के विश्लेषण से पहले अमेरिका के प्रसिद्ध उपन्यासकार अप्टन सिंक्लेयर द्वारा पूँजीवादी पत्रकारिता की आलोचना को रखना चाहेंगे। अमेरिकी पूँजीपतियों के सन्दर्भ में अप्टन सिंक्लेयर का कहना था कि, “राजनीति, पत्रकारिता तथा बड़े पूँजीपति हाथ में हाथ मिलाकर जनता तथा मज़दूरों को लूटते तथा धोखा देते हैं।” सिंक्लेयर ने देखा कि जब तक जनता की आवाज़ पूँजीवादी प्रेस के सम्पादकों तथा समाचार लेखकों के हाथ में रहेगी, उन्हें तथा उनके सामाजिक न्याय के आन्दोलन को निष्पक्ष साझेदारी प्राप्त नहीं होगी। प्रेस की आलोचना को प्रगतिवादी काल में आन्दोलनों के वृहत इतिहास के साथ जोड़ते हुए सिंक्लेयर ने सामाजिक अन्याय की उन सभी समस्याओं में मीडिया की केन्द्रीय भूमिका होने की तरफ़ इशारा किया जो नये पूँजीवाद की वृद्धि में सहायक हुई। सिंक्लेयर का कहना था कि देश जनमत से नियन्त्रित होता है और जनमत ज़्यादातर समाचारपत्रों से ही नियन्त्रित होता है। हावर्ड विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर ह्यूगो मन्सटबर्ग ने 1911 में लिखा था – “क्‍या यह जानना ज़रूरी नहीं है कि कौन समाचार पत्रों को संचालित करता है?” विज्ञापनकर्ताओं की शक्ति को देखते हुए सिंक्लेयर ने लिखा कि “यह प्रचार-प्रसार की व्यवस्था जो विज्ञापनों के बदले मिलती है सैद्धान्तिक रूप से एक बेईमानी है लेकिन लाभ-अर्जन के लिए किये जाने वाले समाचार प्रकाशन के व्यवसाय का अविभाज्य अंग है। वैध और अवैध इतने धीरे से एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं कि किसी भी ईमानदार सम्पादक के लिए यह बहुत मुश्किल हो जाता है कि वह कहाँ पर सीमा रेखा निर्धारित करे। व्यावसायिक पत्रकारिता की दिखावटी निष्पक्षता इसी तरीक़े से प्रत्यक्ष हो जाती है, जब यह पूँजीवाद-विरोधी सामाजिक आन्दोलनों का विवरण देती है। व्यावसायिक पत्रकारिता के अन्तर्गत व्यापार को समाज का एक सहज परिचारक, जबकि मज़दूर को एक कम उदार (शुभचिन्तक) ताक़त की तरह देखा जाता है।” लब्बोलुआब यह कि पूँजी की ताक़त से संचालित मीडिया का काम ही है व्यवस्था के पक्ष में जनमत तैयार करना।

कार्ल मार्क्स ने बहुत पहले ही कहा था कि, “पत्र-पत्रिकाओं के व्यवसाय की स्वतन्त्रता एक विभ्रम है। उनकी एकमात्र स्वतन्त्रता व्यवसाय न होने की स्वतन्त्रता ही हो सकती है।” इसी सन्दर्भ में लेनिन का स्पष्ट कहना था कि, “पूँजीपतियों के पैसे से चलने वाले अख़बार पूँजी की ही सेवा कर सकते हैं।” देश में सबसे ज़्यादा बिकने वाले अंग्रेज़ी अख़बार ‘टाइम्स ऑफ़ इण्डिया’ के मालिकों में से एक समीर जैन खुले आम यह बात कहता है कि अख़बार और कुछ नहीं एक माल है और इसलिए समाचारों को बेचने में कुछ भी बुरा नहीं है और हम वही बेचते हैं जो उपभोक्ता (पाठक) की “माँग” होती है। मीडिया समूह तो अब खुले तौर पर इस बात का दम्भ भरते हैं कि भारत में समाचार, मनोरंजन और खेलों के बीच की विभाजक रेखा धूमिल होती जा रही है। आई.पी.एल. इस नंगी सच्चाई का सबसे बड़ा उदाहरण है जिसके क़रीब आते ही अख़बार और न्यूज़ चैनलों की तो बाँछें खिल जाती हैं क्योंकि इस दौरान उनको क्रिकेट, बालीवुड, राजनीति, अश्लीलता की मिली-जुली गरमागरम मसालेदार चटपटी ख़बरें आसानी से मिल जाती हैं जो उनके मुनाफ़े की हवस शान्त करने का बेहतरीन माध्यम हैं। मीडिया घरानों की आपसी होड़ और उनके अन्तरविरोधों की वजह से भारतीय “लोकतन्त्र” के जो खुलासे हुए हैं, वे यूँ तो व्यवस्था के पतन की ओर साफ़ इशारा करते हैं, लेकिन उनके ज़रिये समूची व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने की बजाय मीडिया लोगों का गुस्सा कुछ नेताओं, नौकरशाहों और राजनीतिक दलों के ख़िलाफ़ केन्द्रित कर देता है जिससे जनता को समस्याओं की असली जड़ यानी पूँजीवादी व्यवस्था के बारे में जानकारी नहीं मिल पाती। मीडिया में ख़बरों का चयन, उनकी प्राथमिकता, बहसतलब मुद्दे, जनता की भावनाएँ और आकांक्षाएँ, जन प्रतिरोध इत्यादि कुछ इस तरह प्रस्तुत किये जाते हैं, जिससे जनता में भ्रष्ट नेताओं के ख़िलाफ़ तो गुस्सा रहता है, लेकिन विश्व और जीवन दृष्टि के रूप में कुल मिलाकर शासक वर्ग के विचारों का ही वर्चस्व क़ायम रहता है।

यह तो तय है कि जैसे-जैसे मीडिया पर बड़ी पूँजी का शिंकजा कसता जायेगा, वैसे-वैसे मीडिया का चरित्र ज़्यादा से ज़्यादा जनविरोधी होता जायेगा और आम जनता के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों और मीडिया में उनकी प्रस्तुति के बीच की दूरी बढ़ती ही जायेगी। आज के दौर में कारपोरेट लोग मीडिया को विज्ञापन देते हैं जिनसे मीडिया की हर साल लगभग 18 हज़ार करोड़ रुपयों की कमाई होती है। सरकारी विज्ञापनों से, काग़ज़-कोटे में मिलने वाली कमाई तो है ही। ऐसे में मीडिया जगत की पक्षधरता के बारे में भ्रमित होने की ज़रूरत नहीं है। मौजूदा मीडिया कारपोरेट जगत का मीडिया है और उसकी आलोचना नहीं करता है। साफ़ है जो जिसका खायेगा, उसी के गुण गायेगा। मार्क्स ने लिखा है कि, “जिस वर्ग के पास भौतिक उत्पादन के साधन होते हैं, वही मानसिक उत्पादन के साधनों पर भी नियन्त्रण रखता है।” जिसके नतीजे के तौर पर, आम तौर पर कहें तो वे लोग जिनके पास मानसिक उत्पादन के साधन नहीं होते हैं, वे शासक-वर्ग के अधीन हो जाते हैं। आने वाले समय में पूँजीवादी मीडिया में और अधिक मुनाफ़ा कमाने के लिए ‘पेड न्यूज़’ की संख्या बढ़ेगी ही। सच्चाई यही है कि मौजूदा मीडिया अपने आप में ही पूँजी से पेड होता है और उसकी पक्षधरता हमेशा लुटेरी और मुनाफ़ाखोर व्यवस्था के प्रति ही होगी।

उपरोक्त मीडिया का यह विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए हम पूँजीवादी व्यवस्था में भी जनसरोकारों से जुड़े मीडिया को खड़ा करने की सम्भावनाओं को ख़ारिज़ नहीं कर रहे हैं, बल्कि मुनाफ़े पर टिके लूट के इस तन्त्र से लड़ने के लिए एक वैकल्पिक मीडिया खड़ा करने की ज़रूरत आज कहीं ज़्यादा है। साथ ही हमें यह भी नहीं भूलना होगा कि पत्रकारिता के क्षेत्र में हमारे देश का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। आजादी की लड़ाई में राधामोहन गोकुल जी, राहुल सांकृत्यायन, प्रेमचन्द, गणेशशंकर विद्यार्थी और शहीदे-आज़म भगतसिंह जैसे लोगों ने अपनी लेखनी से समाज को आगे ले जाने का काम किया। आज के समय में भी पूँजी की ताक़त से लैस मीडिया के बरक्स जन संसाधनों के बूते एक जनपक्षधर वैकल्पिक मीडिया खड़ा करना किसी भी व्यवस्था परिवर्तन के आन्दोलन का ज़रूरी कार्यभार है। इक्कीसवीं सदी में तो मीडिया की पहुँच और प्रभाव और भी अधिक बढ़ गया है। ऐसे में एक क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया को खड़ा करना इंसाफ़पसन्द लेखकों-पत्रकारों के लिए ज़रूरी कार्यभार है।

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