मौन है लखनऊ के दल्ले पत्रकारों की कलम !

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राजनामा.कॉम।  लखनऊ के दल्ले पत्रकार राजनीति से लेकर अन्य कई टापिक पर खूब प्रवचन देते दिख जाएंगे, लेकिन जब प्रदेश शासन द्वारा पत्रकारों की सामूहिक पिटाई या आरटीआई एक्टिविस्ट की गिरफ्तारी जैसा प्रकरण होता है तो ये चुप्पी साध जाते हैं.. ऐसा ये इसलिए करते हैं क्योंकि बोल देने से इनकी दलाली की दुकान पर ताला लटकने का खतरा पैदा हो जाता है… शासन सत्ता से मिले मकान दुकान माल मान्यता विज्ञापन लैपटाप कैश पैकेज पर संकट आ सकता है….

मुलायम का समधी अरबिंद बिष्ट जो कभी पत्रकार रह चुका है, इन दिनों एक गंभीर आरोपों से घिरा हुआ है. उसने सवाल पूछने पर बुजुर्ग आरटीआई एक्टिविस्ट अशोक कुमार गोयल को जेल भिजवा दिया है. ये इतना संजीदा और बड़ा मुद्दा है कि इस पर यूपी के सभी पत्रकारों को एकजुट होकर प्रदेश सरकार की ऐसी तैसी कर देनी चाहिए लेकिन दलालों की नगरी में सब एक दूसरे की दल्लेबाजी को प्रोटेक्ट करते हुए चलते हैं सो बोलेगा कौन….

धन्यवाद कहिए भाई Prabhat Ranjan Deen को जिन्होंने इस मुद्दे पर खुलकर और बेबाक लिखा है-http://goo.gl/iDmzBb इसे पढ़िए और थोड़ी शर्म है तो आप भी दो शब्द अपने वाल पर लिखकर मुलायम एंड कंपनी को लानत भेजिए…

बधाई के पात्र आईपीएस अमिताभ ठाकुर और उनकी एक्टिविस्ट पत्नी Nutan Thakur भी हैं जिन्होंने इस मामले का संज्ञान लेकर जनगोलबंदी  शुरू कर दी है ताकि सरकार पर दबाव डाला जा सके…http://goo.gl/kcK8yp पढ़िए और अपने मुर्दा मन मिजाज को जगाइए.  लखनऊ के बेशर्म पत्रकारों को ठाकुर दंपत्ति से सीख लेने की जरूरत है..

बुजुर्ग आरटीआई एक्टिविस्ट अशोक कुमार गोयल की मुलायम के समधी अरबिंद बिष्ट द्वारा 25 अप्रैल को कराई गई गिरफ्तारी के बारे में Bhadas4media पर खबर अगले रोज 26 तारीख को छप गई थी, सोनभद्र के एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र के आधार पर….http://goo.gl/Z0FM46 पढ़िए और सीखिए पत्रकारीय सक्रियता व चौकन्नापन.

लेकिन इस मसले पर लखनऊ के पत्रकारों का जमीर नहीं जगा क्योंकि उन्होंने सरोकार और संघर्ष नामक शब्दों को दूसरे आम पत्रकारों के नाम कर रखा है और खुद खास बने रहने के लिए रीढ़ की हड्डी तक निकाल कर मुलायम एंड कंपनी के पास ले जाकर गिरवी रख दी है…

लखनऊ के पत्रकार संगठन और लखनऊ में रह रहे पत्रकार नेताओं की हालत तो सबसे ज्यादा बुरी है. इनके पास फुल टाइम दलाली और बकचोदी का मेनू रहता है… बड़े लोगों की चापलूसी करना, झूठ बोलना, मक्खनबाजी करना, सरकारी मंच पाने के लिए तत्पर रहना, यहां वहां से पैसे ऐंठना इनका नित्यकर्म है. गजब ये है कि इन दलाल नेताओं को सरकार और कार्पोरेट पोषित मीडिया बड़े पत्रकार के रूप में प्रोजेक्ट करता है. करे भी क्यों न. इन दलालों को बड़ा बनाकर दिखाकर सरकार और कार्पोरेट को अपनी दलाली लायजनिंग कराने और जनता को भरमाने में आसानी जो हो जाती है…

मुझे कभी कभी शर्म आती है कि मैं उस यूपी का निवासी हूं जहां इतने बड़े बड़े हरामखोर, दलाल, चिरकुट और बेशर्म पत्रकार रहते हैं कि उन्हें अपनों के उत्पीड़न पर भी पीड़ा नहीं होती, मुंह से दो बोल नहीं फूटते, कलम से आग नहीं निकलती… ऐसे घटिया पत्रकारों वाले प्रदेश में पत्रकारिता, सरोकार और एक्टिविज्म का भगवान ही मालिक है….

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….भड़ास4मीडिया के संपादक यशवंत सिंह अपने फेसबुक वाल पर

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