मोदी राज का पहला सालः ‘टुकड़ों में अच्छा-टुकड़ों में खराब’

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राजनामा.कॉम (प्रमोद जोशी)।  इसे ज्यादातर लोग मोदी सरकार का पहला साल कहने के बजाय ‘मोदी का पहला साल’ कह रहे हैं। जो मोदी के बुनियादी आलोचक हैं या जो बुनियादी प्रशंसक हैं,उनके नजरिए को अलग कर दें तो इस एक साल को ‘टुकड़ों में अच्छा और टुकड़ों में खराब’ कहा जा सकता है।

narendra-modi-pmमोदी के पहले एचडी देवेगौडा ऐसे प्रधानमंत्री थे, जिनके पास केन्द्र सरकार में काम करने का अनुभव नहीं था। देवेगौडा उतने शक्ति सम्पन्न नहीं थे, जितने मोदी हैं।

मुख्यमंत्री के रूप में मोदी ने कुछ देशों की यात्रा भी की थी, पर पश्चिमी देशों में उनकी आलोचना होती थी। केवल चीन और जापान में उनका स्वागत हुआ था। पर प्रधानमंत्री के रूप से उन्हें वैदेशिक सम्बन्धों के मामले में ही सफलता ही मिली है।

अभी उनकी सरकार के चार साल बाकी हैं। पहले साल में उन्होंने रक्षा खरीद के बाबत काफी बड़ा फैसले किए हैं। इतने बड़े फैसले पिछले दस साल में नहीं हुए थे। इसी तरह योजना आयोग को खत्म करने का बड़ा राजनीतिक फैसला किया। पार्टी संगठन में अमित शाह के मार्फत उनका पूरा नियंत्रण है। दूसरी ओर कुछ वरिष्ठ नेताओं का असंतोष भी जाहिर है।

मोदी सरकार का एक साल पूरा होने पर जितने जोशो-खरोश के साथ सरकारी समारोह होने वाले हैं, उतने ही जोशो-खरोश के साथ कांग्रेसी आरोप पत्र का इंतज़ार भी है। दोनों को देखने के बाद ही सामान्य पाठक को अपनी राय कायम करनी चाहिए।

सरकार के कामकाज का एक साल ही पूरा हो रहा है, पर देखने वाले इसे ‘एक साल बनाम दस साल’ के रूप में देख रहे हैं। ज्यादातर मूल्यांकन व्यक्तिगत रूप से नरेंद्र मोदी तक केंद्रित हैं।

पिछले एक साल को देखें तो निष्कर्ष यह निकाला जा सकता है कि निराशा और नकारात्मकता का माहौल खत्म हुआ है। पॉलिसी पैरेलिसिस की जगह बड़े फैसलों की घड़ी आई है। हालांकि अर्थ-व्यवस्था में सुधार के संकेत हैं, पर सुधार अभी धीमा है।

modi-governmentइसके विपरीत राजनीतिक सतह पर आलोचना कहें या तारीफ सरकार पर मोदी और उनके इर्द-गिर्द चार-पाँच नेताओं का प्रभुत्व है। सरकार के साथ पार्टी यानी अमित शाह के काम-काज का मूल्यांकन भी होना चाहिए। मोदी के बड़े से बड़े विरोधी भी मानेंगे कि जिस व्यक्ति ने केंद्र सरकार में एक दिन भी काम नहीं किया, उसने न केवल सीधे प्रधानमंत्री पद सम्हाला और पूरी सरकार और पार्टी पर नियंत्रण स्थापित कर लिया। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के महत्व को स्थापित करना।

मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, स्वच्छ भारत, बेटी पढ़ाओ, बेटी बढ़ाओ, स्मार्ट सिटी वगैरह-वगैरह सरकारी उपलब्धियाँ हैं और विपक्ष की निगाह में ये सब बातें जुमलेबाजी से आगे कुछ नहीं।

काला धन, महंगाई, रोज़गार और किसानों की आत्महत्याओं पर केंद्रित कांग्रेसी साहित्य कहता है कि यह सरकार हर मोर्चे पर फेल है। और कहीं कुछ अच्छा हुआ भी है तो हमारी नीतियों को जारी रखने के कारण हुआ है।

एक लगभग मौन प्रधानमंत्री के बाद देश में अत्यधिक मुखर प्रधानमंत्री की सरकार काम कर रही है। विपक्ष की गतिविधियों को भी देखना होगा। कांग्रेस के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती मुख्यधारा की राजनीति में वापसी की है। साथ ही नेतृत्व परिवर्तन को लेकर भी पार्टी के भीतर ऊहापोह चल रही है।

नरेंद्र मोदी इस उम्मीद के साथ सामने आए थे कि वे ‘ढीली व्यवस्था’ का विकल्प देंगे। इस मामले में उनका पहला साल आंशिक रूप से आश्वस्त करता है। उनके पास अभी चार साल बाकी हैं, जो उनके भविष्य के लिए निर्णायक होंगे।

खासतौर से महत्वपूर्ण होगा सन 2019 के चुनाव से पहले का सन 2018। शायद तब तक उनके पास राज्यसभा में भी यथेष्ट बहुमत होगा। पर आज वे एक महत्वपूर्ण मोड़ पर हैं।

फिलहाल मोदी की लोकप्रियता का ग्राफ स्थिर होने लगा है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में पराजय ने दूसरे किस्म का संकेत भी दिया है। इस बात को लेकर संशय है कि सरकार ‘प्रो-फार्मर, प्रो-पुअर’  है या ‘एंटी-फार्मर, एंटी पुअर।’ आँकड़ों में महंगाई कम हुई है, पर अनाज, सब्जियों और दालों के भाव बढ़े हैं।

माकपा महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा कि केंद्र की राजग सरकार संसदीय प्रक्रियाओं की अनदेखी करने के लिए बेहतर जानी जाएगी। सरकार ने एक ही रिकॉर्ड स्थापित किया है और वह है अप्रत्याशित संख्या में विदेश यात्रा पर जाना। येचुरी का प्रतिक्रिया इसके अलावा कुछ और हो भी नहीं सकता।

मोदी सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती राजनीतिक है। पार्टी के भीतर और बाहर ऐसी छवि बन रही है कि सत्ता तीन-चार लोगों तक सीमित है और सारी शक्तियाँ पीएमओ में केंद्रित हो गई हैं। पुरानी व्यवस्था तोड़ने पर जोर है। नई बनी नहीं है। पार्टी के काबिल लोग किनारे हैं।

राजकोषीय घाटे के फेर में सरकार ने सामाजिक क्षेत्र पर खर्च में कटौती की है। इनमें स्वास्थ्य, शिक्षा और पेयजल जैसे कार्यक्रम शामिल हैं। ग्रामीण विकास विभाग, महिला और बाल विकास मंत्रालय और शिक्षा के बजट घटा दिए गए हैं।

हालांकि उसे लोकसभा में पूर्ण बहुमत मिला है, पर राज्यसभा में कमजोर स्थिति के कारण उसे कई बार मुँह की खानी पड़ रही है। खासतौर से भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव और जीएसटी कानून पास न होने के कारण सरकार को नीचा देखना पड़ा है।

दबे मुँह पार्टी के भीतर असंतोष भी है। यह बात अभी तक बाहर कही जा रही थी, पर जब यह बात अरुण शौरी ने कही, तब उसका प्रभाव ज्यादा पड़ा।

अरुण शौरी इतने बड़े राजनेता नहीं हैं कि भाजपा की अंदरूनी राजनीति को प्रभावित कर पाएं, पर मीडिया और बौद्धिक जगत को प्रभावित करने की सामर्थ्य उनमें है।

उन्हें शिकायत है कि आर्थिक नीतियों में मोदी सरकार उस किस्म का बदलाव नहीं ला सकी जिसकी अपेक्षा थी। उनके अनुसार एक साल का शासन ‘टुकड़ों में अच्छा’ है।

सबसे सकारात्मक परिणाम वैदेशिक सम्बंधों में देखने को मिले हैं। सरकार ने पड़ोसी देशों से रिश्ते सुधारने का काम किया है। साथ ही कश्मीर, मालदीव, यमन और नेपाल में आपदा प्रबंधन के काम में अपने कौशल का परिचय दिया है।

संयोग से नरेंद्र मोदी गुजरात में भूकम्प का बाद आपदा प्रबंधन को सक्रिय करने के लिए ही गुजरात भेजे गए थे। उनके अनुभव का लाभ अब मिल रहा है।

इस वक्त देश की समस्या है आर्थिक विकास का ठहर जाना। यह प्रवृत्ति सन 2008 की वैश्विक मंदी से पैदा हुई है। यूपीए के दूसरे दौर में अर्थ-व्यवस्था ढलान पर उतर गई। बहरहाल अब संकेतक बता रहे हैं कि इस साल से हालात सुधरेंगे, पर अभी तक अपेक्षित गति आ नहीं पाई है। आर्थिक नीतियों को भी लोग अपने-अपने तरीके से देखते हैं। एक ओर जहाँ शेयर बाजार ने उनका समर्थन किया है, वहीं सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों का बजट कम होने पर विरोधियों ने उनकी आलोचना की है।

कॉरपोरेट इंडिया की हालत पिछले एक साल में बेहतर हुई है। सरकार के फैसलों में तेजी है। खासतौर इंफ्रास्ट्रक्चर और रक्षा के क्षेत्र में जितने बड़े फैसले इस साल हुए हैं उतने बड़े फैसले पिछले दस साल में नहीं हुए।

देश के कॉरपोरेट सेक्टर को अभी ब्याज दरों में कटौती का इंतज़ार है। कटौती होने पर निर्माण की गतिविधियाँ बढ़ेंगी, जिससे रोजगार बढ़ेगा।

नीति के स्तर पर सरकार ने योजना आयोग को भंग करके और नीति आयोग की स्थापना करके बड़ा फैसला किया है। चौदहवें वित्त आयोग की सिफारिशें मानकर राज्यों को राजस्व में ज्यादा बड़ा हिस्सा देने का फैसला दूसरा बड़ा कदम है।

इन फैसलों के दूरगामी परिणाम होंगे। खासतौर से कुशल राज्य सरकारें अपने इलाकों के विकास में पहले के मुकाबले ज्यादा सफल होंगी। सही है या गलत माना जा रहा है कि ऊपर के स्तर पर भ्रष्टाचार में कमी आई है, नौकरशाही पर लगाम लगी है और पिछले एक साल में कोई बड़ा घोटाला सामने नहीं आया है।

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