मेरी कश्ती डूबी वहां, जहां पानी कम था !

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madan tiwariराजनामा.कॉम।  अरविन्द केजरीवाल ने वाराणसी से लड़ने की घोषणा की , मैंने भी रीजोलुशन लिया था हर हाल में केजरीवाल के खिलाफ लडूंगा , मैंने भी तैयारी करना शुरु कर दिया. यह १० मार्च के आसपास की बात है. केजरीवाल २३ मार्च को वाराणसी आने वाले थे, जनता की राय लेने .बाद में तारीख बढाकर २५ हो गई. मै भी वहा पहुंचा . कुमार सौवीर मित्र थे, इन्हें भी खबर की, ये लखनउ से २० मार्च की ही वाराणसी पहुँच गए थे. पराड़कर भवन जिसे पत्रकार भवन के नाम से भी जानते है और वह पत्रकारों के लिए है , वहा इन्होने एक कमरा ले रखा था . मै २३ मार्च की रात को करीब बारह बजे वहा पहुंचा . एक और पत्रकार मित्र हरिशंकर शाही भी २४ मार्च को वहा आये. दुसरे दिन २४ मार्च को हमलोग दिन में रविदास गेट के पास स्थित कैफे एट होम में खाना खाने गए. रहने के लिए एक फ़्लैट और एक आफिस के लिए कमरे की व्यवस्था करनी थी.

कुमार सौवीर के एक मित्र दुबे ने कही कमरा देखा था. चुकि कुमार सौवीर वाराणसी में रह चुके थे इसलिए फ़्लैट एव आफिस की व्यवस्था का जिम्मा उनका था. कैफे एट होम में एक और पत्रकार हरेन्द्र शुक्ला को कुमार सौवीर ने निमंत्रित किया था .हरेन्द्र शुक्ला वाराणसी में आज अखबार में काम करते है. इन्हें भी कमरे की व्यवस्था करने को कहा गया था. उन्होंने कैफे एट होम से थोड़ा आगे एक फ़्लैट दिखाया . दो कमरा , एक किचेन , हाल था. पांच हजार रुपया किराया बताया था, कहा की वह फलैट उनके ही जिम्मे है, सफाई करवानी है, फर्नीचर की व्यवस्था स्वंय करना था . चौकी, टेबल, कुर्सी, पंखा यह सबकुछ की व्यवस्था करनी थी. जगह बहुत पसंद आई . मैंने हरेन्द्र शुक्ला जी को पांच हजार रुपया अग्रिम दे दिया . हमलोग फिर शुक्ला जी के घर गए, उनके बच्चो से मिले, शुक्ला जी अपने छात्र जीवन के संस्मरण सुनाये, अपने संघर्ष की दास्ता सुनाई. अच्छा लगा. सोचा, चलो एक संर्घषशील व्यक्ति है , सहयोग करेंगे. शुक्ला जी गोपालगंज बिहार के रहने वाले थे परन्तु वाराणसी में रहकर जीवनयापन हेतु पत्रकारिता करते थे.

शाम को अस्सी घाट पर अरविंद केजरीवाल के खिलाफ पर्चा ( पम्फलेट) बाटने गया , वहा बहस हो गई लेकिन पर्चा बाटा. जहा बहस हुई थी उसी जगह सोमनाथ भारती के साथ भाजपाइयो ने मारपीट की थी, सुबह में भड़ास मीडिया के सम्पादक यशवंत सिंह के गाँव गाजीपुर निकले , वहा से शाम को वाराणसी आये जहा अरविन्द केजरीवाल की सभा थी. मैंने अपना चुनाव का कार्यक्रम बता दिया था. नोमिनेशन के पहले आफिस खोलना है, रहने की व्यवस्था कर लेनी है . नोमिनेशन १७ अप्रैल से था. हरेन्द्र शुक्ला जी ने वादा किया था सब व्यवस्था हो जायेगी.

अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ लड़ने की बात पर सभी भाजपाई समर्थन कर रहे थे, कुछेक जगहों से आर्थिक मदद की भी पेशकश हुई. लेकिन सोशल मीडिया परा मोदी के खिलाफ मेरी पोस्टिंग उन्हें पसंद नहीं आई. कुमार सौवीर भी नापसंद करने वालो में थे, उनके लिए मुसलमान का पर्यायवाची शब्द था कटुआ .

१२ अप्रैल को फिर वाराणसी पहुंचा . हरेन्द्र शुक्ला जी से फोन पर बात हुई उन्होंने बताया की वह फ़्लैट नहीं मिला पाया , दूसरा देखा है , उसे ठीक कर लिया है, और पैसा चाहिए. मैंने उनका एकाउंट नम्बर लिया दस हजार रुपया ट्रांसफर कर दिया. जब शाम को वाराणसी पहुंचा तो हरेन्द्र शुक्ला जी ने बताय की वह फ़्लैट भी नहीं हो पाया है , लेकिन एक फ़्लैट अस्सी घाट पर ठीक कर लिया है. उस जगह गए. ठीक अस्सी घाट पर थी वह जगह . दो कमरा था अच्छा था.कुमार सौवीर लखनउ से चले थे लेकिन गाडी खराब हो जाने के कारण देर रात को वाराणसी पहुंचे. १५ अप्रैल को वापस गया जाना था , वहा के लिए निकल गया . हरेन्द्र शुक्ला जी को बता दिया , २१से २३ अप्रैल के बिच नोमिनेशन करना है , आप दस प्रस्तावक तैयार रखेंगे. उन्होंने आश्वस्त किया , कोई बड़ी बात भी नहीं थी उनके लिए , वे दसियों साल से वाराणसी में रह रहे थे और जैसा की उनका दावा था कि वाराणसी में कोई भी काम हो वे करा सकते है. नोमिनेशन का काम कोई ख़ास था नहीं , आराम से पेपर लेकर , दस प्रस्तावको का दस्तखत लेना था .

22 अप्रैल को वाराणसी के लिए अपने मित्र बिम्लेंदु चैतन्य, अरूप ब्रह्मचारी एव राजेन्द्र के साथ वाराणसी के लिए निकला . तिन बजे के पहले वहा पहुँच कर नामांकन पेपर ले लेना था . २ बजे के पहले पहुँच गया . हरेन्द्र शुक्ला को फोन लगाया व्यस्त थे, कुमार सौवीर यशवंत सिंह के साथ बीएचयू के विश्वनाथ मंदिर में थे, हमलोग खुद कचहरी पहुंचे लेकिन आफिस पहुचने में देर हो गई तिन बज गया था . पेपर नहीं मिल पाया . हरेन्द्र शुक्ला जी ने हाथ खड़े कर दिए उनसे प्रस्तावक नहीं मिल पा रहे थे . कुमार सौवीर के मित्र दुबे ने कहा पांच पांच सौ रुपये में प्रस्तावक मिल जायेंगे. मैंने मना कर दिया , कुमार सौवीर ने खुद पेमेंट करने की बात की, मैंने स्पष्ट कर दिया नहीं लडूगा चुनाव लेकिन इस तरह से प्रस्तावक की व्यवस्था कर के चुनाव लड़ना जमीर को गवारा नहीं. कुमार सौवीर ने कहा की देखता हु प्रस्तावक . हरेन्द्र शुक्ला ने कहा , वे खुद और दो तिन अन्य मित्र हो जायेंगे . यानी हमें पांच प्रस्तावक और चाहिए थे.

मेरा भी परिवार है वाराणसी में , मैं सिर्फ मित्रो की मदद से लड़ना चाहता था. लेकिन हालत को अब मै समझाने लगा था. वाराणसी में वोट के लिए चल रही राजनीतिक चालो से वाकिफ होने लगा था, वहा सौ –पचास वोट मायने रखता था. मोदी की पूरी पलटन आई हुई थी . रणनीति स्पष्ट थी, विरोधी वोटो में बिखराव और अपने वोटो को समेटने की कवायद जारी थी. लोकसभा के चुनाव में उम्मीदवार न भी प्रचार करे उसे दो हजार-चार वोट आराम से आ जाते है, इस तरह के वोटो को रोकने की निति पर भाजपा काम कर रही थी. वैसे उम्मीदवार जो भाजपा के हजार-दो हजार वोट काट सकते थे उन्हें रोकने का षड्यंत्र रचा जा रहा था. विरोधी के वोट एकजुट न हो इसलिए विरोधी वोटो में बिखराव के लिए बड़ी संख्या में वैसे उम्मीदवार खड़े किये जा रहे थे जो हजार –दो हजार वोट भी काट सके. मै अबतक सबकुछ समझ चुका था लेकिन लक्ष्य लेकर चल रहा था , पहले नामांकन फिर प्रचार और इन सभी चालो का खुलासा.

मेरे मित्र बिमलेंदु चैतन्य के परिवार का एक युवक वाराणसी में क्लब चलाते है पुकारी नाम छोटे है. ठीक संकट मोचन मंदिर के नजदीक. रात को ग्यारह बजे छोटे से भेट हुई , छोटे का युवाओं पर अच्छी पकड़ है. बिलियर्ड्स का क्लब है. शाम से रात बारह बजे तक नौजवानों की भीड़ लगी रहती है. छात्र संघो के चुनाव में विशेष दिलचस्पी रखने वाले छोटे का पूरा नाम चंद्रदेव तिवारी है , दो भाई है , बड़े भाई का नाम है हरिशंकर तिवारी . हमें पांच छह प्रस्तावक चाहिए थे, दोनों भाइयो ने प्रस्तावक की व्यवस्था कर देने का जिम्मा लिया साथ ही साथ कहा अगर जरुरी होगा तो सौ-दो सौ युवा प्रचार में साथ रहेंगे. उन्होंने अपना वादा निभाया , पांच की जगह आठ प्रस्तावक लेकर आये.

मुझे आशंका थी इसलिए अलग से मैंने एक परिवार को पांच छह प्रस्तावक लाने के लिए कहा था , वे लाये भी लेकिन दुर्भाग्य बगल के लोकसभा क्षेत्र चंदौली के तहत उनका विधानसभा क्षेत्र पड़ता था उन्होंने वाराणसी जिला के निवासी होने का मतलब प्रस्ताव होने की योग्यता समझ लिया. अब लगता है , कुमार सौवीर , हरेन्द्र शुक्ला पर प्रस्तावक की जिम्मेवारी देने की वजाय अगर मैंने अपने स्तर से प्रयास किया होता तो सैकड़ो मिल जाते. अपने किसी परिवार के यंहा नहीं गया जो भूल थी और उसका खामियाजा नोमिनेशन खारिज होने के रूप में सामने है .
madan tiwari 2२४ तारीख को मोदी का नामांकन था, सभी सड़के बैरिकेटिंग कर के बंद कर दी गई थी. मै फिर भी ग्यारह बजे तक नामांकन स्थल पर पहुँच कर नामांकन पत्र लिया . सारे कागजात ठीक कर लिए लेकिन बैरीकेडिंग के कारण प्रस्तावको को आने में देर हुई . एफिडेविट आन लाइन दाखिल किया था. जिलाधिकारी को इ फायालिंग की सूचना नहीं थी, वहा चुनाव कार्यालय में कार्यरत किसी कर्मचारी को नहीं पता था की कैसे चेक करना है. खैर सबकुछ पूरा था , प्रस्तावको का नाम भरकर दस्तखत करा कर दाखिल किया , एक प्रस्तावक जो कुमार सौवीर के मित्र थे उनका पहचान पत्र बहुत पुराना था , पूछने पर उन्होंने बताया की नगर निगम के पिछले चुनाव में उन्होने वोट दिया था. मैंने उनका नाम भर दिया.

उनका नाम वोटर लिस्ट में नहीं था, उन्होंने झूठ कहा था कि निगम के चुनाव में वोट दिया था. उनके कारण ही खारिज हुआ नोमिनेशन . गलती हालांकि मेरी थी शत प्रतिशत . जब आशंका हो गई थी क्या हो सकता है मेरे खिलाफ , क्या किया जा रहा है मेरे खिलाफ तो मुझे साड़ी बागडोर अपने हाथ में ले लेनी चाहिए थी, लेकिन इसमे भी दिक्कत थी. खुद चार चार दिन वाराणसी में रह रहे है कुमार सौवीर लेकिन अगर मै चार छह घंटे के लिए अलग होकर किसी कार्य के लिए निकला तो बुरा लगता था उन्हें, क्यों खबर नहीं की, कहा थे ? खाना अब कैसे आयेगा , मानो मेरे बिना वे अनाथ हो. यह कोई चाल थी उनकी ? कोई षडयंत्र था मेरे खिलाफ ? या मेरे मोदी विरोधी विचारों के कारण पैदा हुई जलन थी ? दिन रात शराब, गन्दी गंदी गालिया बकना कुमार सौवीर के स्वभाव में है, कब किसी को बिना कारण गाली दे देंगे कोई नहीं जानता . बिना इसकी परवाह किये कि साथ में बच्चे है या परिवार बहुत ही अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते थे . नामांकन से लौटते समय उनके उस मित्र जो मेरी कश्ती के डूबने का कारण बने उनसे मोदी के बारे में चर्चा हो रही थी, गाडी कुमार सौवीर चला रहे थे, अचानक बहस के बीच में घुस पड़े और शुरू कर दिया गाली गलौज वाली भाषा , युवा लडके मेरे साथ थे , मुझे बुरा लगा बहस हुई , गाडी से उतर कर निकल गए. मेरे साथ राजेन्द्र था वहा गाडी चलाकर क्लब तक पहुचाया सबको.

आये थे मित्र का साथ देने और निकाल दिया उसका जनाजा वाह रे मित्रता . 25 को नोमिनेशन खारिज होने के बाद जव अपने आफिस पहुंचा तो कुमार सौवीर को गायब पाया , वे निकल चुके थे वहा से बिना जानकारी लिए की क्या हुआ नोमिनेशन का. कही न कही कुछ तो ऐसा है जो सबकुछ को रहस्मय बनाता है. पहले प्रस्तावक न होने की मजबूरी दर्शा कर मुझे रोकना , प्रस्ताव इंतजाम होने के बाद बात बात पर खिजना और अनाप शनाप बाते करना जैसे कचहरी में मै उधर नामांकन दाखिल कर रहा था और कुमार सौवीर इधर यहाँ कहकर मजे ले रहे थे कि “ मेरा सांसद गिरफ्तार हो गया “ . आवास पर वापस आने के बाद इन्होने बिमलेंदु चैतन्य को कहा था नामांकन खारिज होगा. पहले से डेरा डाले हुए रहना लेकिन स्क्रूटनी में क्या हुआ बिना जाने निकला जाना . यह सबकुछ रहस्मय था . हरेन्द्र शुक्ला द्वारा पंद्रह हजार लेने के बाद एक बार भी हिसाब न देना ? .

मैंने 25 को स्क्रूटनी के बाद गया लौटने और आगे की रणनीति निर्धारित करने का निर्णय लिया. नोमिनेशन खारिज होना कोई मायने नहीं रखता था , मै कोई जितने वाला उम्मीदवार थोड़े था ? बस वहा अपनी आवाज रखना चाहता था जिसे रोकने का प्रयास किया गया . लेकिन आवाज कही रूकती है ? उम्मीदवार के रूप में नहीं लेकिन किसी उम्मीदवार के प्रचारक के रूप में तो वह सबकुछ कह ही सकता हु जो कहना चाहता था. कुमार सौवीर जी प्रयास करे खुद में सुधार की, मै उन लोगो में से नहीं हु जो अपमान के भय से आपकी गलत हरकतों का विरोध नहीं करते. शराब पिने-पिलाने के लिए दसो मित्र और प्रस्तावक के लिए एक भी नहीं ? जहा ठहरा था उसके मालिक राजेशा चतुर्वेदी से बात हुई आने के समय, उन्होंने कहा भैया अगर एक बार भी हरेन्द्र शुक्ला ने कहा होता तो या आपने कहा होता तो दस –बीस जितने चाहिए थे बुला देता. एक व्यक्ति ने कहां “ ये रात को पीकर सारा जहा खरीद लेने वाले लोग है “ हरेन्द्र शुक्ला जी पंद्रह हजार का हिसाब दे दीजिएगा.

मेरा तकरीबन 80 हजार खर्च हुआ उसमे से पचीस हजार एक मित्र ने मदद की थी जो फेसबुक परा नहीं है. किसी फेसबुक फ्रेंड से कोई मदद नहीं ली . सोचा था लेने के लिए लेकिन नामांकन के बाद . कुछ मित्रो ने आफर किया था उन सबको को धन्यवाद . जिन्होंने आफर किया था उनका नाम नहीं दे रहा हु क्योकि कल को फेसबुक के माध्यम से चन्दा मांगने वाले उनका जीना हराम कर देंगे. 22 अप्रैल को ही मै बहुत कुछ समझ गया था और दो लाइन की पोस्ट की थी ” आज वाराणसी पहुँच गया हु. देर से आने के कारण नोमिनेशन पत्र आज नहीं खरीद पाया . कल लूंगा . दुनिया अजीब है और दुनिया के रंग अजीब है.”  

….. गया के वरिष्ठ अधिवक्ता पत्रकार मदन तिवारी अपने फेसबुक वाल पर

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