बड़े मियां क्या,छोटे मियां भी सुभान अल्लाह

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बड़े मियां तो बड़े मियां..छोटे मियां भी सुभान अल्लाह। जी हां, झारखंड की मीडिया और सत्ता की सांठ-गांठ उक्त कहावत को खूब चरितार्थ करती है।  भाजपा के अर्जुन मुंडा ने तो सीएम की कुर्सी से जाते-जाते ऐसा कमाल कर गये कि बड़े मीडिया हाउस के समाचार पत्र-पत्रिकायें तो दूर कुकुरमुत्ता छाप उगे प्रायः जेबी समाचार पत्र-पत्रिकायें भी उनकी तरफ अपनी पलक उठाने की नैतिक साहस न कर सके।

हालिया मिली जानकारी के अनुसार झारखंड सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा वर्ष 2011-2012 में कुल 141 पत्रिकाओं  को विज्ञापन निर्गत किये गये हैं। वर्ष 2008-2009 में इसकी कुल संख्या 77 थी। वर्ष 2009-2010 में 102 पत्रिकाओं को विभागीय विज्ञापन से लाभान्वित किया गया। वर्ष 2010-2011 में इसकी संख्या घटकर 92 हो गई। लेकिन वर्ष 2011-2012 में इसकी संख्या बढ़ कर 141 हो गई और इन सभी 141 पत्रिकाओं को खुले दिल से विज्ञापन निर्गत किये गये।

झारखंड सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा लाभान्वित इन सभी 141 पत्रिकाओं का अध्ययन करने से साफ पता चलता है कि इनमें कुछेक को छोड़ कर मात्र सरकारी विज्ञापन हड़पने के उदेश्य ही प्रकाशित किये जा रहे हैं। बाजार या आम लोगों के हाथ में कहीं देखने को नहीं मिलता।  इनका संचालन प्रायः उन लोगों के हाथ में है, जो किसी न किसी मीडिया में नियोजित हैं या दूसरे पेशे में लगे हैं। कई पत्रिकाओं के संचालन-प्रकाशन में तो विभागीय आला अधिकारियों की परोक्ष-अपरोक्ष रुप से साझेदारी होने के तत्थ भी उभर कर सामने आये हैं। यहां फिफ्टी-फिटी के कमीशन का खुला खेल भी होता है।

निचे  झारखंड सूचना एवं जनसंपर्क विभाग द्वारा  हाल ही में उपलब्ध एक सूची के चित्र-आकड़े प्रस्तुत किये जा रहे हैं। हालांकि विभागी द्वारा उपलब्ध कराये गये इस सूची में कमियां यह है कि इनमें कई पत्रिकाओं के नाम छुपा लिये गये हैं, जिनके नाम पर विभाग के अधिकारियों की संलिप्ता से सरकारी विज्ञापन के नाम पर लूट का खुला खेला हुआ है। राजनामा.कॉम जल्द ही उन सभी सरकारी खजाने के लुटेरों को कान पकड़ अपने पाठकों की न्यायालय में प्रस्तुत करेगा।

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