अविश्वास और उत्पीड़न का पर्याय है झारखंड पुलिस

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जब किसी भी सिस्टम का फिल्टर खराब हो जाये, तब अविश्वास और उत्पीड़न जन्म लेता है। आज हम बात करते हैं पुलिस फिल्टर सिस्टम की। इसमें कोई शक नहीं कि पुलिस नेताओं खास कर सत्ता पर कुंडली मार कर बैठे व्यूरोकेट्स के इशारे पर नाचती है। एक आम आदमी के दुःख-दर्द और उसकी सच्चाई कोई मायने नहीं रखती। एक चौकीदार-कांस्टेवल से लेकर पुलिस सिस्टम का हर महकमा अधिक से अधिक काली कमाई करने पर उतारु है। हम यह नहीं कहते कि इस सिस्टम से जुड़े हर लोग निकम्मे और भ्रष्ट हैं। लेकिन इतना तो सत्य है कि इस सिस्टम में अगर कुछ लोग ईमानदार हैं तो उनकी कहीं कोई रोल नजर नहीं आता।

पिछले माह मुझे भगवान बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागृह में 13 दिनों तक एक बंदी के तौर पर रहने का अवसर मिला। वहां पर मैंनें जिस कैदी की भी आत्मा झकझोरने की कोशिश की…बस एक ही टीस उभरी कि पुलिस ने अपना काम सही से नहीं किया। नतीजतन वे वर्षों से बंदी हैं। एक कैदी के रुप में सजा काट रहे हैं। उनकी या उनके परिवार की माली हालत ऐसी नहीं है कि मंहगी न्यायायिक व्यवस्था में उच्चतम न्यायालय तो दूर स्थानीय नीचली अदालत की प्रक्रिया भी झेल सके।

भगवान बिरसा मुंडा केन्द्रीय कारागृह के  ऐसे कई बंदियों- कैदियों की रोंगटे खड़े कर देने वाली दास्तां आपके सामने रखेगें, जो आपको चीख-चीख कर बतायेगी कि उसमें तोंद फुलाये पुलिस कर्मियों की फौज कितने बड़े अपराधी  हैं। लोकधन के साथ काली कमाई के बल अपने बीबी-बच्चों के साथ ऐश-मौज कर रहे इन लोगों की कृपा से झारखंड में निरीह  लोग भी कैसे नक्सली और अपराधी बना दिये गये हैं। 

बहरहाल, सबसे पहले मैं  खुद को सामने रखना चाहूंगा। ताकि यह पता चल सके कि मेरा व्यक्तिगत अनुभव कैसा रहा। गांव में एक कहावत भी है कि जेकर पैर में फटे बिबाई, उही जाने दर्द मेरे भाई। विगत 31 जून को मैं  अपने मकान के दूसरी मंजिल के छत पर अपने परिवार के साथ सोया था कि अचानक करीब 12:15 बजे 3 पुलिसकर्मी  अपना बन्दुक तान मुझे नाम लेकर उठाया और नीचे उतर बाहर चलने को कहा।  जब मैंनें परिचय पूछा और साथ चलने का कारण जानना चाहा तो सीधा जबाब मिला कि चुपचाप नीचे चलो, नहीं तो गोली मार देगें। सच पुछिये तो , मैं उस वक्त समझ नहीं पा रहा था कि ये कौन लोग हैं। अपराधी हैं। नक्सली हैं। मेरे बीबी-बच्चे भी काफी भयभीत होकर कांप रहे थे। 

फिर भी मैं किसी तरह नीचे उतरा और गेट खोल कर बाहर निकला। मगर ये क्या ! सामने पुलिस की चार गाड़ी। मेरे मकान के चारो ओर पुलिस। मैं दंग था वह नजारा देख कर। समझ नहीं पा रहा था कि आखिर माजरा क्या है। इसी बीच सामने स्थानीय थाना के प्रभारी ने कहा कि आपके वेबसाइट राजनामा डॉट कॉम पर प्रकाशित एक समाचार के संबंध में पूछताछ के लिये सदर डीएसपी के पास अभी चलना है। जब मैंने कहा-  इतनी रात को ? प्रभारी साहब का कहना था- उन्हें कुछ मालूम नहीं,उपर से आदेश है।  उस समय मैं लुंगी-गंजी में था। इसे देख थाना प्रभारी ने कहा कि ड्रेस चेंज कर लीजिये। जब मैं ड्रेस चेंज करने अपने कमरे में गया तो  पुलिसकर्मियों ने मेरा लैपटौप,मोबाईल और मोडम भी साथ उठाते चले।

इसके बाद मुझे राइफल धारी जवानों के बीच एक पुलिस जीप में बैठा कर गोंदा थाना ले जाया गया, जो झारखंड विधान सभा के अध्यक्ष के आवास के ठीक सामने और मुख्यमंत्री  अर्जुन मुंडा के आवास के बगल में है। उस थाना के एक कमरे में मुझे ले जाया गया। वहां मुझे  पुलिस के जवानों ने चारो ओर से घेरे लिया। कमरे की लाइट बुझा दी गई। इसके बाद कोई एक शख्स ( अभी तक नहीं जान पाया हूं कि वह शख्स कौन था )आया और पहले तो सभी पत्रकारों  को ( सीधे मुझे नहीं ) दलाल,ब्लैकमेलर ढेर सारी भद्दी-भद्दी गालियां देने के बाद  मुझसे पूछा कि तुमने पबन बजाज के घर जाकर  15 लाख की रंगदारी मांगी है ? मैं उस शख्स के इस सबाल पर दंग था। कौन पवन बजाज ? फिर मुझे याद आया कि   कहीं वो बिल्डर पवन बजाज तो नहीं, जो अंग्रेजी दैनिक पायोनियर का रांची में कथित फ्रेंचाइजी बना है और जिसे लेकर कुछ दिन पहले मैंने अपने वेबसाइट पर दो खबरें प्रसारित की है।  इसके बाद मैंने उस शख्स के सामने यह स्पष्ट कर दिया कि मैं पवन बजाज को आज तक देखा तक नहीं हूं, उसे लेकर खबरें प्रसारित की है।

इतना सुनने के बाद वह शख्स उठ कर चला गया और फिर कमरे की लाइट जला दी गई। फिर गोंदा थाना के पुलिस प्रभारी ने करीब रात के 1:30 बजे मुझे थाने के एक कमरे में बंद करने का निर्देश देकर चले गये। उसके बाद मैं रात भर खुली खिड़की के रड पकड़ खड़ा रहा और सोचता रहा कि यह सब क्या हो रहा है ?  सुबह करीब  सात बजे से  मेरे चिरपरिचित कुछ युवा पत्रकार साथी थाना पहुंचने लगे और करीब 10 बजे तक जमे रहे। इस संबध में उन लोगों ने रांची के एसएसपी साकेत कुमार सिंह से मिल कर बात की। एसएसपी ने यह कह कर हाथ अपना दोनों हाथ खड़े कर दिये कि उपर का आदेश है और ये मीडिया की बात है। इस मामले में वे कुछ नहीं कर सकते। 

इसके बाद करीब 10:30 बजे सदर डीएसपी राकेश मोहन सिन्हा पहुंचे। तब मुझे बंद कमरे से निकाल कर उनके सामने पेश किया गया। उन्होंने कहा कि तुम बड़े-बड़े लोगों के खिलाफ लिखते हो। वे मेरे एक समाचार के मौज-मस्ती शब्द की व्याख्या मस्ती कंपनी के कंडोम से करने लगे। इस मुद्दे पर उनसे एक अखबार की नौकरी छोड़ चुके वरिष्ठ पत्रकार किसलय जी से बहस भी हुई। बाद में डीएसपी साहब ने सीएम हाउस का आदेश बता कर मुझे करीब 11:00 बजे जेल भेजने का निर्देश देकर चलते बने।

इस संवंध में जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के रिपोर्टरों ने गोंदा थाना प्रभारी से पुछा तो उन्होंने स्पष्ट तौर पर बताया कि उन्होंने इस मामले में कोई छानबीन नहीं की है और गिरफ्तारी की सारी कार्रवाई डीएपी के आदेश पर हुई है। 

इस पुरे मामले का रोचक पहलु यह है कि मुझे जेल भेजने के मात्र आधा घंटा पहले ही पवन बजाज की लिखित शिकायत सूचना थाना पहूंची और आनन-फानन में 15 लाख की रंगदारी मांगने, हत्या के मामले में फंसाने समेत आइटी एक्ट की धारायें युक्त मामला दर्ज किया गया। ….…………… मुकेश भारतीय

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One comment

  1. क्या हम आपातकाल मे रह रहे हैं ? अजीब बात है , सता के पास सिवाय झुठे मुकदमे करने के और कोई काम नही बचा है ? सिस्टम के इसी तरह की हरकतो के कारण नक्सलवाद पनप रहा है । कभी एक दो जिलों तक सिमित नक्सलवाद की चपेट मे देश के ३० प्रतिशत से ज्यादा हिस्से आ चुके हैं उसके बाद भी सिस्टम मे बदलाव का कोई संकेत नही दिखता । जिसे सिस्टम ने कोने तक पहुंचा दिया वह हथियार लेकर नक्सलवादी बन गया , जो अभी तक व्यव्स्था से न्याय की उम्मीद लगाये बैठे हैं , जैसे हमलोग , उन्हे भी व्यवस्था बाध्य कर रही है अन्य विकल्प की तलाश के लिए .

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