मीडिया मालिकों के कालाधन पर क्यों नहीं पड़ा छापा : आलोक मेहता  

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नई दिल्ली। कई ऐसे मीडिया मालिक हैं, जिनके पास कालाधन है लेकिन, उन पर छापा नहीं पड़ा। मीडिया का काम है कि वह समस्याओं को सामने लाए लेकिन, वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो।  उक्त बातें नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) और दिल्ली पत्रकार संघ द्वारा कांस्टीट्यूशन क्लब में ‘नोटबंदी का सच और मीडिया की भूमिका’ विषय पर  आयोजित सेमीनार की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं आऊटलुक हिंदी के संपादक आलोक मेहता ने कही।

श्री मेहता ने कहा कि मीडिया आलोचना करे लेकिन वह पूर्वाग्रह से ग्रस्त न हो। यदि मीडिया पूर्वाग्रह से समाचार को दिखाएगी या प्रस्तुत करेगी तो इसकी विष्वसनीयता कम होगी। उन्होंने कहा कि मीडिया की भूमिका तभी अच्छी होगी जब वह स्वतंत्र ढंग से काम करे। उन्होंने मीडिया पर भी सर्जिकल स्ट्राइक की जरूरत बताते हुए कहा कि कई ऐसे मीडिया मालिक हैं जिनके पास कालाधन है लेकिन उन पर छापा नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि मीडिया संजय की भूमिका निभाए लेकिन धृतराष्ट्र जैसा कोई शासक न हो।

कार्यक्रम के प्रारंभ में नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रासबिहारी ने स्वागत भाषण दिया। संचालन वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद सैनी और दिल्ली पत्रकार संघ के अध्यक्ष अनिल पांडेय ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

भाजपा के राष्ट्रीय सचिव एवं सांसद महेश गिरी ने कहा कि देश की अवस्था तभी सुधर सकती है जब व्यवस्था ठीक हो। नोटबंदी का फैसला देश को स्वस्थ करने का फैसला है।

डीडी न्यूज के वरिष्ठ संपादकीय सलाहकार विजय क्रांति ने कहा कि मीडिया आज कौरव और पांडव में बंटा हुआ है। एक खास नजरिए से अखबार का दुरुपयोग हो रहा है। मीडिया का काम संजय का था जो कि वह नहीं कर रहा है।

उन्होंने कहा कि मीडिया उस भारतीय को इज्जत देना भूल गया जो लाइन में लगने और दिक्कतों के बावजूद भी किसी बैंक का शीशा नहीं तोड़ा।

भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक के.जी. सुरेश ने कहा कि नोटबंदी पर मीडिया की वही भूमिका रही जो रहती आई है। मीडिया ध्रुवों में बंट गया। राजनीतिक झुकाव दिखा। समाचार और संपादकीय में अंतर नहीं दिखा। स्टूडियो बहस पर जोर रहा। सनसनी फैलाई गई। हैदराबाद के एक नेता ने कहा कि समुदाय विषेश के साथ भेदभाव हो रहा है तो इसको तवज्जो देना अनुचित लगा। उ

न्होंने मीडिया की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि कश्मीर में पत्थरबाज चुप हो गए, आतंकी और नक्सली हमले नहीं हो रहे, मीडिया में इस पर क्यों नहीं बात की गई। उन्होंने कहा कि हमें मध्यम मार्ग की तरफ जाने की जरूरत है।

अखिल भारतीय मतदाता संगठन के अध्यक्ष रिखब चंद जैन ने कहा कि सब सुधारों से पहले चुनाव सुधार होना चाहिए। नोटबंदी पर देषभर में चर्चा हुई लेकिन संसद में चर्चा नहीं हो सकी। जब सही जनप्रतिनिधि चुने जाएंगे तब समस्याएं सुधरेंगी।

उर्दू दैनिक हमारा समाज के मुख्य संपादक खालिद अनवर ने कहा कि नोटबंदी भ्रश्टाचार और आतंकवाद के खिलाफ एक कदम है लेकिन पिछले 40 दिनों में आम आदमी और मजदूरों के काम छिन गए हैं, यह चिंताजनक है।

नेशनल आर्गनाइजेशन आफ बैंक वर्कर्स के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष अश्वनी राणा ने बैंक कर्मचारियों की निष्ठा पर सवाल उठाने को अनुचित बताते हुए कहा कि रिजर्व बैंक से जितने पैसे आने चाहिए, वह नहीं आए। हम काम कर रहे हैं और गाली भी खा रहे हैं, यह ठीक नहीं है, ऐसा होने से अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा।

इंडियन वोमेन प्रेस कोर की महासचिव अरुणा सिंह ने कहा कि देष के हालात ऐसे नहीं थे और न ही हमारी अर्थव्यवस्था ध्वस्त हो रही थी कि नोटबंदी की जाए। मीडिया ने पहले इसका स्वागत किया और जब तीन दिन बाद ही इसकी पोल खुलनी शुरू हुई तब आलोचना शुरू की।

राष्ट्रीय विचार मंच के अध्यक्ष सुनील वशिष्ठ ने कहा कि प्रधानमंत्री ने नोटबंदी का साहसिक कदम उठाकर दूरदर्शिता का परिचय दिया है।

इस सेमीनार में नेशनल यूनियन आफ जर्नलिस्ट्स (इंडिया) के पूर्व अध्यक्ष डा. नंदकिषोर त्रिखा एवं श्री राजेंद्र प्रभु के अलावा वरिष्ठ पत्रकारों मे मनोज मिश्र, दधिबल यादव, मनोज वर्मा, राकेश आर्य, कुमार राकेश, उषा पाहवा, शिवानी पांडे, सजीव सिन्हा, अशोक किंकर, राकेश थपलियाल, संजीव सिन्हा, संदीप देव, राजकमल चैधरी, प्रमोद सैनी, राजेन्द्र स्वामी, अनुराग पुनेठा सहित बड़ी संख्या पत्रकारों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।

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