मीडिया की ‘पाप-पंचायत’ और कठघरे में राजा भइया !

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     -: प्रभात रंजन दीन :-
Prabhat Ranjan Deenमीडिया में अपराधियों और माफियाओं की तरह गिरोहबंदी चल रही है। कोई धर्म के बहाने गिरोहबंदी चला रहा है तो कोई दल के बहाने। तो कोई दोनों का घालमेल-गिरोह चला रहा है। अखिलेश यादव की सरकार में राजा भैया को क्यों शामिल किया, इस पर मीडिया का एक खास स्खलित गिरोह कुछ ऐसे चिल्लपों मचाने लगा जैसे वह सीबीआई से ऊपर है, जैसे वह अदालत से ऊपर है, जैसे वह जन-अदालत से भी ऊपर है।

मीडिया का यह तबका खुदमुख्तारी की ऐसी खुमारी में है कि जैसे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव या समाजवादी पार्टी के अभिभावक मुलायम सिंह यादव उनसे ही पूछ कर सरकार में मंत्री का या पार्टी में पदाधिकारी का नाम तय करेंगे। राजा भैया अपराधी हैं या नहीं हैं, इसे तय करने वाली अदालत है या वह जन-अदालत जहां से जीत कर राजा भैया या राजा भैया जैसे कोई भी नेता विधानसभा तक पहुंचते हैं।

पश्चिम में चलने वाली खाप-पंचायतों की तर्ज पर उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मीडिया के कुछ खास घुटे हुए चेहरे ‘पाप-पंचायत’ चलाने की कोशिश कर रहे हैं और कुछ खास लोगों को वे पत्रकारिता के कंधे पर बंदूक रख कर निपटाने की कोशिशों में लगे हैं। वे पत्रकारिता नहीं, बल्कि सियासतदानों के साथ मिल कर कुछ और ही निकृष्ट वृत्ति में लगे हैं। इस स्खलित गिरोह में एक-दो विजुअल चैनल के कुछ खास पहचाने हुए चेहरे और एक-दो अखबार के कुछ खास पहचाने हुए नाम शामिल हैं। 

अब आप थोड़ा फ्लैशबैक में चलें। कुंडा के सीओ जियाउल हक की जब हत्या हुई तो खास चैनल और खास अखबार ने अपनी ‘पाप-पंचायत’ जमानी शुरू कर दी और बिल्कुल ऐलान ही कर दिया कि कुंडा के सीओ जियाउल हक की हत्या राजा भैया ने ही की है। इसके लिए किस्म-किस्म के हथकंडे अपनाए गए। खैर, उत्तर प्रदेश सरकार ने फौरन सीबीआई जांच की घोषणा कर दी और राजा भैया ने फौरन अपने मंत्री पद से इस्तीफा देने की घोषणा कर दी।

RAJA_CBIसीबीआई ने अपनी जांच शुरू की। सीबीआई की जांच में पाया गया कि मरहूम सीओ की पत्नी परवीन आजाद की जिस तहरीर पर सीबीआई जांच का आदेश हुआ था, वह तथ्यहीन है। सीबीआई की जांच में सीओ हत्याकांड की कुछ और ही वजहें सामने आईं और प्रमाणित भी हुईं। राजा भैया को सबूतों के आधार पर क्लीन चिट मिल गई। सीबीआई जांच के दायरे में केवल सीओ हत्याकांड की जांच शामिल थी, लिहाजा वह बात दब गई या दबा दी गई कि राजा भैया को फंसाने वाली तहरीर किसने लिखी थी और किसके इशारे पर लिखी गई थी। सीओ की विधवा परवीन आजाद ने सीबीआई के समक्ष बयान भी दिया कि तहरीर उन्होंने नहीं लिखी थी, किसी और ने लिखी थी।

सीबीआई को यह भी पता चला कि परवीन आजाद की जिस तहरीर पर राजा भैया का मंत्री पद गया और सीबीआई जांच हुई वह तहरीर कुंडा के पूर्व सीओ खलीकुर जमा ने लिखी थी, जिस पर परवीन आजाद ने आंख मूंद कर हस्ताक्षर कर दिए थे। परवीन ने सीबीआई के समक्ष यह बात स्वीकार की कि उन्होंने तहरीर पर बिना देखे-पढ़े हस्ताक्षर कर दिए थे। सीबीआई ने फर्जी तहरीर लिखने वाले सीओ का भी बयान दर्ज किया। खलीकुर जमा ने किसके इशारे पर झूठी तहरीर लिखी थी?

यह तथ्य रहस्य के घेरे में उन लोगों के लिए है जो केवल स्क्रीन (परदा) के ऊपर देखते हैं। जो परदे के पीछे की गतिविधियां जानते हैं उनके लिए यह रहस्य नहीं कि झूठी तहरीर किसके इशारे पर लिखी गई थी और ‘मीडिया-प्लेयर’ किसके इशारे पर पत्रकारिता के मापदंडों और मर्यादा की धज्जियां उड़ाने की कबड्डी खेल रहे थे। सरकार को इसकी भी जांच करानी चाहिए। लेकिन इसकी जांच नहीं होगी क्योंकि सरकार को सब पता है, मीडिया के बारे में भी और उस सूत्रधार नेता के बारे में भी। 

Raja-Bhaiyaअब इस मीडिया गिरोह का खेल देखते चलें… राजा भैया जब-जब मंत्री बनते हैं तो उन पर दर्ज आठ आपराधिक मामले उन्हें याद आ जाते हैं। अब टीवी और अखबार पर उन आठ मामलों का जिक्र करते हुए तमाम विद्वत बहसें चलने लगती हैं। ये बहसें उन चैनलों पर ज्यादा मारक तरीके से चलती हैं जिनके पुरोधा पत्रकार और पत्रकारा सत्ता के गलियारे में दलाली करते शरमाते नहीं और जिनकी करतूतें राष्ट्र का आधिकारिक दस्तावेज बन चुकी हैं। लेकिन बहस सुनें तो सम्पूर्ण राष्ट्र की चिंता राजा भैया को मंत्री बनाने की चिंता में ही निहित दिखाई देने लगती हैं।

इस गिरोह को प्रदेश सरकार में राज्य मंत्री महबूब अली पर दर्ज 15 आपराधिक मामले कभी दिखाई नहीं पड़ते। आपने कभी टीवी पर सुना? या कभी उस खास अखबार में खबर देखी? राजनीति में अपराधियों की बढ़ती संख्या इन ठेकेदार-पत्रकारों के लिए चिंता का विषय नहीं। क्योंकि इनमें से कई इनके आका हैं, जिनमें से कुछ जेल में हैं और कुछ मंत्री के पद पर तो कुछ विपक्ष में हैं

Raja-Bhaiya2राजनीति में अपराधियों की आमद के खिलाफ समग्र हमला होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का फैसला हमें रौशनी भी दे रहा है और रास्ता भी दे रहा है। लेकिन हमें इस ईमानदार रौशनी या ईमानदार रास्ते से तो कोई मतलब है नहीं। यह राजा भैया के आठ बनाम महबूब अली के पंद्रह आपराधिक मामलों का जो भारी फर्क है, वह गिरोहबाज पत्रकारों को दिखाई नहीं पड़ता। इन्हें यह भी दिखाई नहीं पड़ता कि महबूब अली के खिलाफ दर्ज हत्या-प्रयास (धारा-307) का मामला पिछले तेरह साल से लम्बित क्यों पड़ा है! राज्य मंत्री रामकरण आर्य के खिलाफ दर्ज हत्या का मुकदमा पिछले सत्रह वर्षों से क्यों लम्बित है, इसकी खोज खबर ये पत्रकार क्यों नहीं लेते?

अखिलेश सरकार से यह मांग क्यों नहीं होती कि जितने भी ऐसे मंत्री हैं जिनके खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं, उन्हें बाहर का रास्ता दिखाएं? चुनाव आयोग के दस्तावेज बताते हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार के जिन मंत्रियों के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं उनमें महबूब अली टॉप पर हैं। उनके खिलाफ विभिन्न अपराध के 15 मामले दर्ज हैं। रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया पर आठ मामले दर्ज हैं। विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह पर तीन, राजेंद्र सिंह राणा पर तीन, अरविंद कुमार सिंह पर तीन, मनोज कुमार पारस पर दो और रामकरण आर्य, जगदीश और भगवत शरण पर एक-एक आपराधिक मामले दर्ज हैं। …फिर अकेले राजा भैया का मसला क्यों उठाया जाता है?

यह क्या आम लोगों को समझ में नहीं आ रहा? पाठकों और दर्शकों को बेवकूफ समझने का समय गया। अब वह समय सामने आ रहा है जब देश-प्रदेश का आम नागरिक मीडिया से सीधे पूछेगा कि खबर लिखने और दिखाने के पीछे की मंशा सार्वजनिक तौर पर स्पष्ट करें। मुझसे भी और उनसे भी…

 

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