मंत्री की टिप्पणी पर हाय तौबा मचाने वाले, इस आंचलिक पत्रकार की सुध कौन लेगा?

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एक तरफ राजधानी रांची के पत्रकार मंत्री सीपी सिंह की एक टिप्पणी को लेकर बड़े-बड़े दिग्गज पत्रकार हाय-तौबा मचाए हैं, वहीं आंचलिक पत्रकारों के हर जुल्म पर इनकी एक बकार तक नहीं निकल रही है।  पत्रकार कलब-संगठन  से पत्रकार सुरक्षा की बात करने वाले भी किस खोह में  दुबके हैं, यह  अलग शोध का विषय है ….”

राजनामा.कॉम। झारखंड के मुख्यमंत्री रघुवर दास के गृह जिले से सटे सरायकेला-खरसावां जिले के एक आंचलिक पत्रकार को मुखिया के खिलाफ खबर बनाना महंगा पड़ा है। मुखिया एक आदिवासी महिला है और उसने पुलिस के मेल से कानून में देय शक्तियों का पूरा-पूरा प्रयोग एक आंचलिक पत्रकार के खिलाफ करवाया है।

पत्रकार के खिलाफ मुखिया ने राजनगर थाने में गैर जमानती धाराओं की बौछार करते हुए आईपीसी की धारा 341, 323, 504, 506,, 345 (B), 3X, SC/ ST ACT के तहत मामला दर्ज कराया है।

घटना 25 सितंबर 2018 की है, जहां सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर थाना अंतर्गत बनकाटी गांव में  चौदहवें वित्त आयोग के तहत गोविंदपुर पंचायत के अंतर्गत बनकाटी गांव में बने एक सड़क का ग्रामीण विरोध कर रहे थे।

संयोग से एक टीवी न्यूज चैनल के पत्रकार वीरेंद्र मंडल का गांव भी वही है। जहां ग्रामीणों की सूचना पर वह न्यूज संकलन करने गया। इधर मुखिया के गुर्गे पत्रकार और उसे पिता पर टूट पड़े, इतना ही नहीं मुखिया के गुर्गे स्थानीय ग्रामीणों के साथ भी उलझ गए।

इधर मुखिया के गुर्गों ने खबर चलाए जाने पर जान से मारने की धमकी पत्रकार वीरेंद्र मंडल को दी। जिसके बाद पत्रकार वीरेंद्र मंडल ने  दिन  के करीब 10.30 बजे स्थानीय राजनगर थाने में लिखित शिकायत दर्ज कराई।

वहीं राजनगर थाना प्रभारी ने मामले को गंभीरता से नहीं लिया और पूरा दिन थाना नहीं पहुंचे। इधर पत्रकार अपने दैनिक कार्य में लग गया। उसके बाद शाम से शुरू हुआ मुखिया का प्रतिशोध और थाना प्रभारी से पहले सुलह कराने का संदेशा पत्रकार वीरेंद्र मंडल को भिजवाया।

वहीं जब पत्रकार वीरेंद्र मंडल ने सुलह करने से इंकार कर दिया तो मुखिया ने पत्रकार के खिलाफ इन संगीन धाराओं के तहत राजनगर थाने में मामला दर्ज कराया।

सूत्र बताते हैं कि इस पूरे प्रकरण के पीछे खेल कोई और ही खेल रहा था। यहां पत्रकारिता की प्रतिद्वंद्विता से इंकार नहीं किया जा सकता है। एक क्षेत्रीय न्यूज चैनल के रिपोर्टर-गैंग की संदिग्ध भूमिका सामने आई है।

वैसे पत्रकार वीरेंद्र मंडल के समर्थन में जमशेदपुर और सरायकेला के कुछ पत्रकारों ने सरायकेला एसडीपीओ अविनाश कुमार से मुलाकात कर मामले की निष्पक्ष जांच कर दोषी पर कार्रवाई करने का अनुरोध किया, जिसे उन्होंने मान लिया, लेकिन मुखिया ने कानून की बारीकियों और भारतीय संविधान में SC/ST ACT और महिलाओं के लिए देय शक्ति का प्रभाव दिखाते हुए इसका पूरा लाभ उठाया।

आज पत्रकार वीरेंद्र मंडल का पूरा परिवार सदमें में है, और जिले के एसपी, डीसी से लेकर हर प्रभावशाली लोगों से न्याय की गुहार लगाता फिर रहा है, लेकिन जिन धाराओं के तहर मुखिया द्वारा मामला दर्ज कराया गया है,  उसे देखते हुए न कोई अधिवक्ता, न कोई अधिकारी इस मामले में पड़ना चाह रहे हैं।

वैसे अधिकारी की अगर हम बात करें तो पीड़ित पत्रकार घटना के बाद जिले के पुलिस कप्तान के पास भी न्याय की फरियाद लगाने पहुंचा था, लेकिन साहब आंचलिक पत्रकार से बात करना भी मुनासिब नहीं समझे और तीन दिनों की छुट्टी पर चले गए। और जबतक वापस लौटे तबतक मामला काफी उलझ चुका था।

इधर मामले में पत्रकारों की एकजुटता की बातें करनेवाले भी किनारा कर गए। वैसे इक्के दुक्के पत्रकार वीरेंद्र मंडल के साथ जरूर हैं, लेकिन कानूनी पचड़े में वे पड़ने से बचते नजर आ रहे हैं।

हालांकि मामले में आरोपी पत्रकार की ओर से जो दलीलें दी गई उसमें उसके द्वारा मुखिया अथवा उनसे गुर्गों से हाथापाई से साफ इंकार किया गया, हां उसने इतना जरूर कहा कि जब मुखिया के गुर्गे उन्हें खबर करने से रोक रहे थे और जान से मारने की धमकी दे रहे थे, तो  उसने भी जवाब में गालियां दी।

लेकिन उस वक्त जब मुखिया के गुर्गों ने पत्रकार के पिता के साथ हाथापाई शुरू कर दी तब। तो क्या एक पत्रकार अपने या अपने परिवार के बचाव में इतना भी नहीं कर सकता…। क्यों नहीं राजनगर थाना पुलिस मामले में सुबह ही पत्रकार के आवेदन के आधार पर कार्रवाई की….। आखिर पूरा दिन राजनगर थाने में क्या खिचड़ी पकी., कि शाम को अचानक थाना प्रभारी ने पैंतरा बदलते हुए पूरे मामले को संवेदनशील बना दिया। क्या पत्रकार का समाज में कोई इज्जत नहीं…।

क्या पत्रकार के लिए कोई कानून नहीं….। क्या कोई जब चाहे इन संगीन धाराओं के तहत खबरों का संकलन कर रहे पत्रकारों पर मामला दर्ज करा सकता है….। क्या यह कानून में प्रदत्त शक्तियों का दुरूपयोग नहीं…।

क्या SC/ ST ACT का दुरूपयोग नहीं….।  वैसे इस प्रकार तो पत्रकारिता और लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहे जानेवाले इस  स्तंभ  की नींव कमजोर हो जाएगी।

वहीं मुखिया और राजनगर थाना के इस रवैये के खिलाफ  नाराज ग्रामीणों ने घटना के अगले ही दिन राजनगर थाना का घेराव किया, लेकिन थाना प्रभारी पूरा दिन फिर से थाने से गायब रहे।

उसके बाद नाराज ग्रामीण राजनगर प्रखंड कार्यालय पहुंचे और राजनगर बीडीओ से मुखिया के खिलाफ शिकायत करते हुए मुखिया फंड की योजनाओं का जांच कराए जाने की मांग संबंधी आवेदन भी दिया, जिसे बीडीओ द्वारा गौण कर दिया गया। कुल मिलाकर कह सकते हैं कि एक आंचलिक पत्रकार को फंसाने मे पूरा प्रशासनिक महकमा लग गया।

वहीं झारखंड के सरायकेला में मुखिया ने जिस प्रकार से एक पत्रकार के खिलाफ इन धाराओं की बौछार करते हुए मामला दर्ज कराया है, वो लोकतंत्र के लिए काफी खतरनाक साबित हो सकता है।

पत्रकार सुरक्षा कानून भी होनी चाहिए, जिससे पत्रकारों पर हो रहे हमले और इन कानूनों के तहत मामले दर्ज करने से पहले निष्पक्ष और सही जांच के बाद ही आरोप तय होने चाहिए। अन्यथा लोकतंत्र का चौथा स्तंभ का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा और पत्राकों की नई पौध फलने- फूलने से पहले ही दम तोड़ देगी। ऐसे मामलों में वरीय अधिकारियों को संवेदनशीलता दिखाने की जरूरत है।

साथ ही हाउस में बैठे मंत्रियों, सांसदों विधायकों को एक ठोस कानून बनाने के लिए पहल करने की आवश्यकता है। पत्रकार केवल अच्छाई दिखाने के लिए ही नही समाज के सभी वर्गों को उसका आईना दिखाने का काम करता है।

वहीं संस्थानों को भी अपने पत्रकारों का ऐसे वक्त में साथ देने की सख्त जरूरत है। साथ ही पत्रकारों के हितों की बात करनेवाले संगठनों और दिनरात एक साथ काम करनेवाले पत्रकार साथियों को भी ऐसे वक्त में एकता दिखाने की जरूरत है।

देखिये घटना के दिन का वीडियो……

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