भूल कर पुरानी बातें…आईये भरें उड़ान

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वर्ष 2014 मेरे लिये काफी चुनौतीपूर्ण और प्रेरणादायक तो था लेकिन एक ठहराव भरा।  व्यक्ति से लेकर व्यवस्था तक, सबकी आंखों में टिमटिमाती उम्मीद की किरणों का ही प्रतिफल है कि  मेरा भी विश्वास बिखरने से बच गया।

raznamaसमय बहुत बलवान होता है। समय के साथ सब कुछ बदल जाता है। अगर विश्वास को अहंकार की श्रेणी से अगल कर के देखें तो आपको झारखंड विधानसभा चुनाव के दौरान अपने इस वेबसाइट पर  किसी से क्या उम्मीद की जाए…. शीर्षक से मेरी बात स्तंभ में मैंने एक पीडा लिखी थी। कसक व्यवस्था को लेकर थी।

संयोग देखिये या कहिये उपर वाले का न्याय कि उस स्तंभ में जिन राजनीतिक महानुभावों का जिक्र किया था, वे सारे लोग अपने व्यवस्था में ही खेत रहे। आगे भी अगर ऐसे लोग व्यवस्था को पूंजीपतियों,लुटेरों, आतताईयों के कोठे की रखैल बनाने से बाज नहीं आये तो इनकी और मिट्टीपलीद होनी तय मानिये। इनके आने वाली पीढ़ियों पर लोग थूकने से भी कतरायेगें। क्योंकि एक आम आदमी की हाय से व्यवस्था के नुमाइंदों का बचने का सबाल ही नहीं हैं।

 

व्यवस्था की बात इसलिये कर रहा हूं कि 31मई,2012 की काली रात से धन-बल-छल और साम-दंड-भेद के पाटों की पिसाई से निकलने में मुझे काफी वक्त लग गये। शारीरिक, मानसिक और आर्थिक तौर पर बिल्कुल तोड़-मरोड़ कर रख दिया गया। मेरे सारे जन संपर्क इस कदर कुचलने के प्रयास किये गये कि मैं अपनी छाया से भी डरने लगूं।

खैर, जाको राखे साईंया,मार सके न कोय। किसी तरह खुद को बचाये रखा।  मन में सिर्फ एक ही विश्वास रहता कि हर रात की स्याह के बाद सुबह जरुर होगी, आशाओं से लवरेज किरणें अवश्य निकलेगी।

वेशक , वर्ष 2014  के शुरुआती दौर जीवन जीने के साधनों पर निर्णय लेने और बाद का दौर उसकी व्यवस्था करने में लग गये। आज खुशी है कि वर्ष 2015 की अहले सुबह अब कोई अनिर्णय की स्थिति नहीं हैं।

क्योंकि वर्ष 2015 की सतरंगी किरणें नव उर्जा प्रदान करने वाली है। वेहतर है कि अब कल की बातों को भूल कर नई कहानी लिखने की डगर पर चल निकलेँ।

हां, लेकिन चलते-चलते सटीक मंजिल पाने के लिये जरुरी है कि पुरानी गलतियों-लापरवाहियों को न दोहराएं और उससे सार्थक सबक लें। जय मां भारती।

27092011968

…………….मुकेश भारतीय, राजनामा.कॉम

 

 

 

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