भुमिहारों को बेवकूफ़ बना रही है भाजपा

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राजनामा.कॉम (नवल कुमार)। बिहार में भुमिहार समाज को ऐसे समाज के रुप में मान्यता प्राप्त है, जो हमेशा सत्ता का हिस्सेदार बने रहना चाहता है। चूंकि बिहार के पहले मुख्यमंत्री भुमिहार थे इसलिए राजनीतिक तौर पर उनमें सबसे अधिक जागरुकता आयी।

लेकिन अब कहा जा सकता है कि राजनीतिक रुप से चालाक कहे जाने वाले भुमिहार समाज में भी बौद्धिकता खत्म होती जा रही है। इसका एक प्रमाण यह है कि सत्ता के लिए भाजपा उन्हें बेवकूफ़ बनाये जा रही है और सबसे दिलचस्प बात यह है कि वे बेवकूफ़ बन भी रहे हैं।

modi bhumihar_bjpक्या कोई यकीन करेगा कि भाजपा भुमिहारों के आदर्श कहे जाने वाले रामधारी सिंह दिनकर को अपमानित कर रही है और भुमिहार अपना पुरुषार्थ भूल ताली बजा रहे हैं। एक प्रमाण यह कि भाजपा ने राष्ट्रीय स्तर पर रामधारी सिंह दिनकर के सम्मान में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। बिहार में इसे खूब बढा चढाकर पेश किया जा रहा है।

पेश करने वालों में सुशील कुमार मोदी भी हैं, जिनके एक परिजन ने राजेन्द्र नगर, पटना में अवस्थित रामधारी सिंह दिनकर के मकान पर अवैध तरीके से कब्जा करने की कोशिश की।

तब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के बाद दिनकर आवास पर मोदी परिवार के अवैध कब्जे को समाप्त किया गया था।

खैर बात यही खत्म नहीं होती है। दिनकर के नाम पर भुमिहारों को बेवकूफ़ बनाने की दिशा में दो कदम आगे बढते हुए भाजपा ने उनकी दो रचनाये “संस्कृति के चार अध्याय” और “परशुराम की प्रतीक्षा” की स्वर्ण जयंती मना रही है।

सबसे दिलचस्प यह है कि “संस्कृति के चार अध्याय” वर्ष 1956 में प्रकाशित हुई थी और इस लिहाज से अब इसके 58 वर्ष बीत चुके हैं। एक और दिलचस्प जानकारी यह कि “संस्कृति के चार अध्याय” की प्रस्तावना किसी और ने नहीं बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने लिखी थी।

वहीं “परशुराम की प्रतीक्षा” का प्रकाशन वर्ष 1963 में हुआ था और इसके भी 52 वर्ष बीत चुके हैं। दिनकर ने यह रचना चीन के हाथों भारत के पराजित होने पर लिखी थी और उसमें उन्होंने जातिगत तौर पर समाज के बंटे होने को पराजय का मुख्य कारण माना था।

खैर सामान्य तौर पर सवर्ण जयंती पचास वर्ष पूरे होने पर मनाया जाता है। इस लिहाज से यदि भाजपा रामधारी सिंह दिनकर का इतना ही सम्मान करती है तो उसे यह आयोजन पहले ही कर लेना चाहिए था। जाहिर तौर पर चुनावी मौसम में दिनकर को झुठे फ़ूल चढाकर वह बिहार के भुमिहारों को बेवकूफ़ बना रही है।

बहरहाल राजनीति में सब जायज है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि दिल्ली में दिनकर के नाम पर भुमिहारों को बेवकूफ़ बनाते समय नरेंद्र मोदी ने कहा था कि जातिपरक राजनीति को तिलांजलि देने की आवश्यकता है। जबकि वही भाजपा बिहार में आये दिन जातिगत सम्मेलन करवा रही है ताकि वह सूबे में सत्तासीन हो सके।

वैसे सबसे बड़ा सवाल भुमिहार समाज के समक्ष है और यह एक चुनौती भी है उनके लिये कि क्या उन्हें बेवकूफ़ बनाया जा सकता है?

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………….. लेखकः नवल कुमार अपना बिहार के संपादक हैं।

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