भारत रत्न डॉ. अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम एक युग महापुरुष

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kalamभारत रत्न डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम का पूरा नाम अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम था। वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति रहे। एक गैरराजनीतिक व्यक्ति होने के बावजूद, विज्ञान की दुनिया में चमत्कारिक प्रदर्शन के कारण कलाम इतने लोकप्रिय हुए कि देश ने उन्हें सिर माथे पर उठा लिया तथा सर्वोच्च पद पर आसीन कर दिया। भारत को अंतरिक्ष में पहुंचाने तथा मिसाइल क्षमता प्रदान करने का श्रेय डॉ. कलाम को जाता है। उनके द्वारा सफलतापूर्वक विकसित अग्नि और पृथ्वी जैसी बैलिस्टिक मिसाइलों ने राष्ट्र की सुरक्षा को मजबूती प्रदान की है। डॉ. कलाम अविवाहित थे।

वेशभूषा, बोलचाल के लहजे, अच्छे-खासे सरकारी आवास को छोड़कर हॉस्टल का सादगीपूर्ण जीवन, ये बातें उनके संपर्क में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर एक सम्मोहक प्रभाव छोड़ती थीं। डॉ. कलाम एक बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, देश के विकास और युवा मस्तिष्कों को प्रज्ज्वलित करने में अपनी तल्लीनता के साथ साथ वे पर्यावरण की चिंता भी खूब करते थे, साहित्य में रुचि रखते थे, कविता लिखते थे, वीणा बजाते थे, तथा आध्यात्म से बहुत गहरे जुड़े हुए थे।

विशेष: सही मायने में ‘भारत रत्न’ थे डॉक्टर कलाम! भारत रत्न डॉ. ए पी जे अब्दुल कलाम का पूरा नाम अवुल पकीर जैनुलाबदीन अब्दुल कलाम था। वे भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति रहे।

डॉ. कलाम में अपने काम के प्रति जबर्दस्त दीवानगी थी। उनके लिए कोई भी समय काम का समय होता था। वह अपना अधिकांश समय कार्यालय में बिताते थे। देर शाम तक विभिन्न कार्यक्रमों में डॉ. कलाम की सक्रियता तथा स्फूर्ति काबिलेतारीफ थी। ऊर्जा का ऐसा प्रवाह केवल गहरी प्रतिबद्धता तथा समर्पण से ही आ सकता है।

उनके द्वारा लिखी गई पुस्तकें बहुत लोकप्रिय रही हैं। वे अपनी किताबों की रॉयल्टी का अधिकांश हिस्सा स्वयंसेवी संस्थाओं को मदद में दे देते थे। मदर टेरेसा द्वारा स्थापित ‘सिस्टर्स आफ चैरिटी’ उनमें से एक है।

APJ Abdul Kalamडॉ. कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम् कस्बे में एक मध्यमवर्गीय तमिल परिवार में हुआ था। इनके पिता जैनुलाबदीन की कोई बहुत अच्छी औपचारिक शिक्षा नहीं हुई थी, और न ही वे कोई बहुत धनी व्यक्ति थे। इसके बावजूद वे बुद्धिमान थे और उनमें उदारता की सच्ची भावना थी। इनकी माँ, आशियम्मा उनके जीवन की आदर्श थीं। वे लोग अपने पुश्तैनी घर में रहते थे, जो कि उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य बना था तथा रामेश्वरम् के प्रसिद्ध शिव मंदिर से महज दस मिनट की दूरी पर स्थित मस्जिदवाली गली में था। इनके पिताजी एक स्थानीय ठेकेदार के साथ मिलकर लकड़ी की नौकाएं बनाने का काम करते थे जो हिंदू तीर्थयात्रियों को रामेश्वरम् से धनुषकोटि ले जाती थीं। डॉ. कलाम को अपने पिताजी से विरासत के रूप में ईमानदारी और आत्मानुशासन, तथा माँ से ईश्वर में विश्वास और करुणा का भाव मिला।

उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा रामेश्वरम् के प्राइमरी स्कूल से प्राप्त की। इसके बाद आगे की स्कूली शिक्षा इन्होंने रामनाथपुरम् के श्वार्ट्ज हाई स्कूल से प्राप्त की। 1950 में इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए तिरुचिरापल्ली के सेंट जोसेफ कॉलेज में बीएससी में दाखिला ले लिया। फिर उन्होंने दक्षिण भारत में तकनीकी शिक्षा के लिए मशहूर एक विशेष संस्थान मद्रास इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी (एम.आई.टी.) में दाखिला ले लिया। एम.आई.टी. में उड़ान संबंधी मशीनों की विभिन्न कार्यप्रणालियों को समझाने के लिए नमूने के तौर पर रखे गए दो विमानों ने इन्हें काफी आकर्षित किया। इन्होंने पहला साल पूरा करने के बाद वैमानिकी यानी एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग को अपने विशेष विषय के रूप में चुना। स्नातक के बाद वे एम.आई.टी. से एक प्रशिक्षु के रूप में हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एच.ए.एल.), बैंगलौर चले गए।

apj पढ़ाई पूरी करने के बाद कलाम रक्षा मंत्रालय के तकनीकी विकास एवं उत्पादन निदेशालय में चुन लिए गए। 1958 में इन्होंने दो सौ पचास रुपये के मूल वेतन पर निदेशालय के तकनीकी केंद्र (उड्डयन) में वरिष्ठ वैज्ञानिक सहायक के पद पर काम संभाल लिया। निदेशालय में नौकरी के पहले साल के दौरान इन्होंने ऑफिसर-इंचार्ज आर. वरदराजन की मदद से एक अल्ट्रासोनिक लक्ष्यभेदी विमान का डिजाइन तैयार करने में सफलता हासिल कर ली। विमानों के रख-रखाव का अनुभव हासिल करने के लिए इन्हें एयरक्रॉफ्ट एण्ड आर्मामेंट टेस्टिंग यूनिट, कानपुर भेजा गया।

इसके बाद कलाम को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में रॉकेट इंजीनियर के पद पर उन्हें चुन लिया गया। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति में इनका काम टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च के कंप्यूटर केंद्र में काम शुरू किया।

सन् 1962 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति ने केरल में त्रिवेंद्रम के पास थुंबा नामक स्थान पर रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र स्थापित करने का फैसला किया। थुंबा को इस केंद्र के लिए सबसे उपयुक्त स्थान के रूप में चुना गया था, क्योंकि यह स्थान पृथ्वी के चुंबकीय अक्ष के सबसे करीब था। उसके बाद शीघ्र ही डॉ. कलाम को रॉकेट प्रक्षेपण से जुड़ी तकनीकी बातों का प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए अमेरिका में नेशनल एयरोनॉटिक्स एंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन यानी ‘नासा’ भेजा गया। यह प्रशिक्षण छह महीने का था।

जैसे ही डॉ. कलाम नासा से लौटे, 21 नवंबर, 1963 को भारत का ‘नाइक-अपाचे’ नाम का पहला रॉकेट छोड़ा गया। यह साउंडिंग रॉकेट नासा में ही बना था। डॉ. साराभाई ने राटो परियोजना के लिए डॉ. कलाम को प्रोजेक्ट लीडर नियुक्त किया। डॉ. कलाम ने विशेष वित्तीय शक्तियाँ हासिल की, प्रणाली विकसित की तथा 8 अक्टूबर 1972 को उत्तर प्रदेश में बरेली एयरफोर्स स्टेशन पर इस प्रणाली का सफलतापूर्वक परीक्षण किया गया।

उनके जीवन का अगला बड़ा अवसर तब आया जब डॉ. कलाम को भारत के सैटेलाइट लांच वीहिकल (एसएलवी) परियोजना का प्रबंधक बनाया गया। परियोजना प्रमुख के रूप में नामांकित करना एक सम्मान भी था और चुनौती भी थी। एस.एल.वी.-3 परियोजना का मुख्य उद्देश्य एक भरोसेमंद प्रमोचन यान विकसित करना था जो चालीस किलोग्राम के एक उपग्रह को पृथ्वी से 400 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में स्थापित कर सके। इसमें एक बड़ा काम था यान के चार चरणों के लिए एक रॉकेट मोटर सिस्टम का विकास। हाई एनर्जी प्रोपेलेंट के इस्तेमाल में सक्षम रॉकेट मोटर सिस्टम में इस्तेमाल के लिए 8.5 टन प्रोपेलेंट ग्रेन निर्मित किया जाना था।

Former Presidentएक अन्य कार्य था नियंत्रण तथा मार्गदर्शन। यह एक बड़ी परियोजना थी जिसमें दो सौ पचास उप-भाग और चालीस बड़ी उपप्रणालियाँ शामिल थीं। सभी गतिविधियों में तालमेल बैठाना और टीम का कुशल नेतृत्व करना डॉ. कलाम के लिए एक चुनौती थी। अंततः कड़ी मेहनत के बाद 18 जुलाई, 1980 को सुबह आठ बजकर तीन मिनट पर श्रीहरिकोटा रॉकेट प्रक्षेपण केंद्र से एस.एल.वी.-3 ने सफल उड़ान भरी। इस परियोजना की सफलता ने डॉ. कलाम को राष्ट्रीय पहचान दी। इस उपलब्धि के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा 26 जनवरी 1981 को ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया।

उन दिनों रक्षा अनुसंधान तथा विकास प्रयोगशाला में एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत थी जो कार्य को गति प्रदान कर सके तथा मिसाइलों के विकास का काम तेजी से आगे बढ़ा सके। प्रो. राजा रामन्ना ने डॉ. कलाम के सामने गाइडेड मिसाइल डेवेलपमेंट प्रोग्राम को अपने हाथ में लेने का प्रस्ताव रखा। इस चुनौतीपूर्ण प्रस्ताव को डॉ. कलाम ने सहर्ष स्वीकार किया। फरवरी 1982 में डॉ. कलाम को डी.आर.डी.एल का निदेशक नियुक्त किया गया। उसी समय अन्ना विश्वविद्यालय, मद्रास ने इन्हें ‘डॉक्टर आफ साइंस’ की मानक उपाधि से सम्मानित किया।

एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग में डिग्री हासिल करने के करीब बीस साल बाद यह मानद उपाधि डॉ. कलाम को प्राप्त हुई। डॉ. कलाम ने रक्षामंत्री के तत्कालीन वैज्ञानिक सलाहकार डॉ. वी. एस. अरूणाचलम के मार्गदर्शन में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (आई.जी.एम.डी.पी.) का प्रस्ताव तैयार किया। स्वदेशी मिसाइलों के विकास के लिए एक स्पष्ट और सुपरिभाषित मिसाइल कार्यक्रम तैयार करने के उद्देश्य से डॉ. कलाम की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई गई।

इस परियोजना के प्रथम चरण में एक नीची ऊंचाई पर तुरंत मार करनेवाली टैक्टिकल कोर वेहिकल मिसाइल और जमीन से जमीन पर मध्यम दूरी तक मार सकने वाली मिसाइल के विकास एवं उत्पादन पर जोर था। दूसरे चरण में जमीन से हवा में मार सकने वाली मिसाइल, तीसरी पीढ़ी की टैंकभेदी गाइडेड मिसाइल और डॉ. कलाम के सपने रि-एंट्री एक्सपेरिमेंट लान्च वेहिकल (रेक्स) का प्रस्ताव रखा गया था। जमीन से जमीन पर मार करने वाली मिसाइल प्रणाली को ‘पृथ्वी’ और टैक्टिकल कोर वेहिकल मिसाइल को ‘त्रिशूल’ नाम दिया गया। जमीन से हवा में मार करने वाली रक्षा प्रणाली को ‘आकाश’ और टैंकरोधी मिसाइल परियोजना को ‘नाग’ नाम दिया गया।

डॉ. कलाम ने अपने मन में संजोए रेक्स के बहुप्रतीक्षित सपने को ‘अग्नि’ नाम दिया। 27 जुलाई, 1983 को आई.जी.एम.डी.पी. की औपचारिक रूप से शुरूआत की गई। मिसाइल कार्यक्रम के अंतर्गत पहली मिसाइल का प्रक्षेपण 16 सितंबर, 1985 को किया गया। इस दिन श्रीहरिकोटा स्थित परीक्षण रेंज से ‘त्रिशूल’ को छोड़ा गया। यह एक तेज प्रतिक्रिया प्रणाली है जिसे नीची उड़ान भरने वाले विमानों, हेलीकॉप्टरों तथा विमानभेदी मिसाइलों के खिलाफ इस्तेमाल किया जा सकता है।

25 फरवरी, 1988 को दिन में ग्यारह बजकर तेईस मिनट पर ‘पृथ्वी’ मिसाइल को छोड़ा गया। यह देश में रॉकेट विज्ञान के इतिहास में एक युगांतरकारी घटना थी। 22 मई, 1989 को ‘अग्नि’ का प्रक्षेपण किया गया। डॉ. कलाम की पहल पर भारत द्वारा एक रूसी कंपनी के सहयोग से सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल बनाने पर काम शुरू किया गया। फरवरी 1998 में भारत और रूस के बीच समझौते के अनुसार भारत में ब्रह्मोस प्राइवेट लिमिटेड की स्थापना की गई।

kalam-10वर्ष 1990 के गणतंत्र दिवस के अवसर पर राष्ट्र ने अपने मिसाइल कार्यक्रम की सफलता पर खुशी मनाई। डॉ. कलाम और डॉ. अरूणाचलम को भारत सरकार द्वारा ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया गया। अक्टूबर, 1992 से दिसंबर 1999 तक रक्षा मंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार, और डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट आर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ) के महानिदेशक के रूप में डॉ. कलाम को अनुसंधान व विकास में सभी प्रयोगशालाओं का मार्गदर्शन करने और फलदायी संभाव्यतावाली परियोजनाओं की प्रगति पर निगरानी रखने का संपूर्ण दायित्व प्राप्त हुआ।

भारत ने 11 तथा 13 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में दूसरी बार कुल 5 सफल परमाणु परीक्षण किए। इसके पहले 18 मई, 1974 को पोखरण में भारत ने पहला प्रायोगिक परमाणु परीक्षण किया था। ऑपरेशन शक्ति के अंतर्गत 1998 में किए गए परीक्षणों के बाद भारत में खुद को परमाणुशक्ति संपन्न राष्ट्र घोषित किया। इन परीक्षणों में परमाणु ऊर्जा विभाग तथा रक्षा अनुसंधान तथा विकास संगठन की सामूहिक भूमिका था। इसमें डॉ. कलाम की बड़ी ही अहम भूमिका थी।

डॉ. कलाम ने अपनी समस्त ऊर्जा को राष्ट्र-निर्माण की दिशा में लगाने के लिए दिसंबर 1999 में डीआरडीओ को छोड़ने का फैसला किया क्योंकि पद की सीमाएं उन्हें रोकती थीं। परंतु सरकार उन्हें छोड़ना नहीं चाहती थी। उन्हें ‘इंडिया मिलेनियम मिशन’ नामक परियोजना में अपने विजन 2020 को कार्यान्वित करने के लिए कहा गया। उन्हें भारत सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया गया और भारत सरकार के प्रमुख वैज्ञानिक सलाहकार का पद दिया गया। वे 2001 तक इस पद पर रहे।

18 जुलाई, 2002 को संपन्न हुए चुनाव में डॉ. कलाम नब्बे प्रतिशत मतों के भारी बहुमत से भारत के ग्यारहवें राष्ट्रपति चुने गए। उनका कार्यकाल 25 जुलाई 2007 को समाप्त हुआ।

apj kalamडॉ. कलाम ने ‘विंग्स आफ फायर’, ‘इग्नाइटेड माइंड्स’, जैसी कई सुप्रसिद्ध पुस्तकें लिखीं। डॉ. कलाम को अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले जिनमें शामिल हैं- इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स का नेशनल डिजाइन अवार्ड; एरोनॉटिकल सोसाइटी आफ इंडिया का डॉ. बिरेन रॉय स्पेस अवार्ड; एस्ट्रोनॉटिकल सोसाइटी ऑफ इंडिया का आर्यभट्ट पुरस्कार, विज्ञान के लिए जीएम मोदी पुरस्कार, राष्ट्रीय एकता के लिए इंदिरा गांधी पुरस्कार। 1997 में उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया।

83 वर्ष की उम्र में भी उनकी अकादमिक सक्रियता देखने लायक थी। यहां तक की उन्होंने अंतिम सांस भी आईआईएम में व्याख्यान देते समय ली। भारत अपने इस प्रिय ‘रत्न’ और मिसाइल मैन को कभी नहीं भुला सकेगा। राजनामा.कॉम की डॉक्टर कलाम को विनम्र श्रद्धांजलि।

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