असम में खतरा बने बांग्लादेशी

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इन दिनों असम कई मामलों को लेकर सुर्खियों में है। संयोग कहिए या साजिश इन सारे मामलों में प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से बांग्लादेशी मुसलमानों का हाथ बताया जा रहा है। पहली घटना एक महिला विधायक का है, जिसने अपनी राजनीति की शुरूआत भारतीय जनता पार्टी से की फिर कांग्रेस मे चली गयी। असम के राजनीतिक प्रेक्षकों का तो यहां तक कहना हैं कि उक्त महिला विधायक का भाजपा के एक प्रभावशाली नेता के साथ अंतरंग संबध रहे हैं। भाजपा का वह नेता कई वर्षो तक पूर्वोतर का काम सम्भालता रहा है। उस नेता पर आज भी पार्टी की महत्वपूर्ण जिम्मेवारी है। महिला विधायक की घटना ने केवल असम को ही नहीं पूरे देश को हिलाकर रख दिया। विधायक के मामले में भी हिंसा को बडे सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया। फिर एक लड़की के साथ गुवाहटी में छेड-छाड की घटना हुई। उस घटना में जिन लोगों ने छेड-छाड की वे तो अपनी जगह है, लेकिन उस घटना में दो ऐसे लोगों का नाम आ रहा है, जो दूरदर्शनवाहिनी का संवाददाता हैं, गोया लडकी से छेड-छाड करने के लिए पत्रकारों ने कुछ टपोरियों को उकसाया। तीसरी घटना जो सबसे ज्यादा भयावह है, वह है वोडो और बांग्लादेशी मुसलमानों की आपसी लडाई। इस घटना में अबतक 42 लोग मारे गये है। निःसंदेह इसमें वोडो तो मारे ही गये है, कुछ मुसलमान भी मारे गये होंगे। अभी तक दो लाख लोग अपना घर छोड चुके है। इस घटना की सबसे बडी विडम्बना यह है कि अधिकतर लोगों का घर जला दिया गया है। अपने-अपने प्रभुत्व वाले इलाकों में दोनों समुदाय के लोगों ने तांडव किया है। इस घटना से पुरे देश में एक बार फिर से बांग्लादेषी मुस्लमानो के खिलाफ माहौल बना है।

आंकडे बताते हैं कि देश में लगभग पांच करोड बांग्लादेशी मुसलमान रह रहे है। इन आंकडों में से तीन करोड को वैध बना दिया गया है और शेष अवैध रूप से यहां बसे है। दिल्ली-मुम्बई जैसे महानगरों में तो 75 प्रतिशत असामाजिक कृत्य एवं अपराधों में बांग्लादेशियों की भूमिका सामने आई है। हालांकि असम की वर्तमान घटना में केवल वोडो को ही नुकसान नहीं हुआ है, जान-माल की हानि बांग्लादेशियों को भी हुई है, लेकिन ऐसी नौबन आखिर आई क्यों ? यह सवाल बडा महत्व का है जिसपर गंभीर मंथन की जरूरत है।

असम की असम की 32 प्रतिशत जनसंख्या मुस्लमानों की है। इन मुस्लमानें को संगठित रूप से बांग्लादेश का समर्थन प्राप्त है। यही नहीं पाकिस्तान की गुप्तचर संस्था आई0एस0आई भी असम के अतिवाद को सहयोग करता रहा है। असम में बांग्लादेशी मुस्लमानों का संगठन हो या असम का अन्य पृथकतावादी समूह, दोनों को बांग्लादेश संरक्षण देता रहा है। हालांकि शेख हसीना की सरकार को भारत से बहुत कुछ प्राप्त करना है, इसलिए आजकल पूर्वोतर के आतंकियों को बांग्लादेश हल्के हाथ सहयोग कर रहा है। आज भी चाहे वोडो हो या उल्फा बांग्ला उनका सबसे बडा सहयोगी है। दूसरी ओर असम की कांग्रेस सरकार में प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में न केवल वोडो, उल्फा अतिवादी शमिल है, अपितु बांग्लादेशी मुस्लमान भी शामिल है। सामान्य रूप में कहा जाये तो असम की कांग्रेस सरकार तीन पृथकतवादी और बांग्लादेशीपरस्त आंतकी समूह के सहयोग से चल रही है। असम-प्रशासन में राष्ट्रवादी शक्तियों की भूमिका सीमित है। इस परिस्थिति में विभिन्न सांस्कृतिक खेमों में अहम और स्वार्थों की टकराहत स्वाभाविक है। जिन इलाकों में आज दंगा फसाद हो रहा है, उन इलाकों में ऐसा पहले भी होता रहा है। वोडो का मुस्लामानों के साथ संभवतः यह नई घटना हैं, लेकिन कोकराझार वाले इलाके में वोडो के साथ संथालों की लडाई पुरानी है। बडे मजे की बात यह है कि जब वोडो की संथाल आदिवासियों से लडाई होती थी तो बांग्लादेषी वोडो का साथ देते थे। धीरे-धीरे गरीब संथाल आदिवासी, बंगाली और हिन्दी भाषी अपने मूल स्थान की ओर पलायन कर गये। अब चाय के बागानों में आदिवासियों और बंगलियों की संख्या सीमित है। वोडो-संथाल युद्ध में असम की सरकार स्थानीय वोडो का पक्ष लेती रही है। संथालों के संरक्षण के लिए असम सरकार ने कुछ भी नहीं किया, लेकिन वोडो क्षेत्र में बांग्लादेषी मुस्लमानों को आदिवासी भगाव अभियान में बढ-चढ कर हिस्सा लेने कि लिए जबरदस्त पुरस्कार दिया गया। वोडो क्षेत्र में वोडो के अलावा बांग्लादेशी मुस्लमान अब जमीन के मालिक भी हो सकते है। इस अधिकार ने वोडो जनजातियों को हिलाकर रख दिया है। अब वोडो खुद के अस्तित्व पर संकट मान रहे हैं। वोडो वाहुल्य चार जिलों में अब बांग्लादेशियों के निशाने पर वोडो हैं।

बांग्लादेशियों ने बडे सुनियोजित तरीके से पहले बांगालियों को भगाया, फिर हिन्दी भाषियों को भागा दिया, इसके बाद संथालों को खदेड दिया और अब वोडो को भगाने का अभियान चलाया जा रहा है। हालांकि यह थोडा कठिन है, लेकिन जिस प्रकार केन्द्र की संप्रग सरकार और राज्य की कांग्रेस सरकार बांग्लादेशी मुस्लमानों के प्रति नरमी और सहानुभुति दिखा रही है, उससे तो लगता है कि आने वाले मात्र 10 सालों के अंदर असम से मूल असमियों को खदेड बांग्लादेशी वहां एक नया बांग्लादेश बना लेंगे। याद रहे असम में मुस्लमानों की संख्या कुल 32 प्रतिशत है। इसमें से 75 प्रतिशत जनसंख्या बांग्लादेशी मुस्लमानों की है।

कुल मिलाकर देखें तो असम के वर्तमान समस्या की जड में बांग्लादेश है। उस जड में पानी और खाद डालने का काम असम के स्थानीय जनता का अलंबरदार कहने वाली पार्टी कांग्रेस है। कांग्रेस यह अच्छी तरह जानती है कि मुस्लिम संगठनों का सहयोग और नियंत्रण पृथक्तावादी शक्तियों के हाथ में है बावजूद कांग्रेस असम में मुस्लिम संगठनों का समर्थन लेकर सरकार चला रही है। यही नहीं असम की कांग्रेस सरकार ने असम में चरंमपंथियों को नकेल डालने के बदले चरमपंथियों को खुलकर खेलने का मौका भी दे रही है। अब जब असम का पूरा चित्र बदल गया है और सरकार के हाथ से नियंत्रण जाता रहा तो तरूण गोगोई, केन्द्र सरकार को सेना भेजने के लिए कह रहे हैं। कर रहे हैं। केन्द्र की सेना जानी भी चाहिए, लेकिन यह असम की समस्या का अस्थाई समाधान होगा क्या? प्रेक्षकों की मानें तो आज भी असम की समस्या नियंत्रण के दायरे में है। इसे सम्भाला जा सकता है। लेकिन जबतक प्रशासन पर राजनीति हावी रहेगा और महज सत्ता की मलाई खाने के लिए स्थानीय जनता एवं राष्ट्रहित की बली चढाई जाती रहेगी, तबतक असम में अमन की सम्भावना कल्पना से भी परे है। असम को संभालना है तो प्रशासन और प्रशासनिक ढाचों को बिना किसी राजनीतिक और समाजिक आर्थिक पूर्वोग्रहों के मजबूम करना होगा। लेकिन यह करना तो तरूण गोगोई सरकार को ही है। केन्द्र या अन्य कोई शक्तियां आंशिक और क्षणिक सहयोग कर सकती है। सम्पूर्ण असम को ठीक करने के लिए दूरगामी नीति और स्पष्ट निर्णय की जरूरत है। अन्यथा असम में अमन की संभावना संभव नहीं है। हो सकता है असम पूर्वोतर का कश्‍मीर बन जाये। हालांकि कश्‍मीर वाला पेंच असम में नहीं है, यहां पाकिस्तान के अलावे अन्य किसी देश का हस्तक्षेप सीमित है। लेकिन भारत को कमजोर होता दुनिया का हर एक प्रभावशाली राष्ट्र देखना चाहता है। इसलिए असम को संभालना जरूरी है। इस दायित्व से केन्द्र सरकार भी भाग नहीं सकती है…………..

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