भारतीय संविधान में अधिकार, लेकिन झारखंड धर्म परिवर्तन विधेयक को मंजूरी!

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“झारखंड प्रदेश की सीएम रघुवर दास की अध्यक्षता में बैठक की गयी। मंत्री परिषद में 18 प्रस्तावों को मंजूरी दी। इसमें झारखंड स्वतंत्र विधेयक भी है। एससी/एसटी का धर्म परिवर्तन करवाने को 4 साल की सजा और 1 लाख रूपये तक का जुर्माना लगाने का प्रस्ताव है।इसे विधान सभा से पारित करवाना होगा।”

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद-25-28)

भारत एक बहुधार्मिक समाज है। यहाँ अनेक धार्मिक समूह रहते हैं, जिनकी जनसँख्या असमान है। जहाँ हिन्दू धर्म को मानने वाले लोग 82% हैं,वही अन्य अल्पसंख्यक समूह भी पाए जाते है। चुकि भारतीय समाज अभी भी धर्म पर आधारित है, और व्यक्ति समाज में ही विकास की प्रक्रिया से जुड़ता है, अतः व्यक्ति के व्यक्तित्व पर धर्म का प्रभाव निर्णायक होता है, इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार व्यक्ति के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है, अतः इसे मौलिक अधिकार के रूप में संविधान में शामिल कर जहाँ एक तरफ व्यक्ति के धार्मिक अधिकारों को राज्य द्वारा मान्यता प्रदान की गयी है; वही सभी धर्मों को समानता का दर्जा देकर भारतीय संविधान सभी धर्मों को समान रूप से प्रोत्साहन देने का कार्य करता है।

संविधान के अंतर्गत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य से सम्बंधित सभी प्रावधान मौजूद हैं। हालाँकि मूल संविधान के किसी भाग में इस शब्द का कोई जिक्र नही किया गया था; लेकिन हमारे संविधान निर्माता इस मुद्दे पर बहुत स्पष्ट थे कि भारत को किसी भी कीमत पर पाकिस्तान का हिन्दू रूपांतरण नही करना है। अतः उन्होंने बिना इस शब्द का जिक्र किये ही धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों के प्रति श्रद्धा व्यक्त की।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता की प्रकृति सभी धर्मों के प्रति तटस्थता और निष्पक्षता के साथ-साथ सभी धर्मों को समान प्रोत्साहन देना भी है। कोई भी पंथनिरपेक्ष राज्य इस विचार पर आधारित होता है कि राज्य का विषय केवल व्यक्ति और व्यक्ति के बीच सम्बन्ध से है व्यक्ति और ईश्वर के बीच सम्बन्ध नही है। संविधान के कई उपबंधों द्वारा सभी धर्मों के प्रति निष्पक्षता का दृष्टिकोण सुनिश्चित किया गया है।(अनुच्छेद-25-28)

एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के मुख्य लक्षण के अनुरूप भारत का भी कोई अपना राज्य-धर्म नही होगा। राज्य न तो अपने कोई धर्म की स्थापना करेगा और नही किसी विशिष्ट धर्म को विशेष सहायता प्रदान करेगा। संविधान के अंतर्गत सभी धर्म के लोगों के धार्मिक अधिकारों को समान रूप से रक्षित किया गया है- (बसु 2013:139)

राज्य किसी व्यक्ति या समूह से किसी धर्म को मानने या उसका प्रचार करने के एवज में किसी प्रकार का कोई कर नही वसूलेगा। लेकिन राज्य द्वारा पोषित किसी शिक्षा संस्था में किसी भी प्रकार की कोई धार्मिक शिक्षा नही दी जाएगी।(अनुच्छेद-27)

यदि अल्पसंख्यक या बहुसंख्यक द्वारा संचालित किसी संस्था को राज्य द्वारा सहायता दी भी जाती है; तो भी वह संस्था बिना सहमति के किसी भी छात्र पर किसी धार्मिक शिक्षा को ग्रहण करने या उसमें भाग लेने के लिए बाध्य नही कर सकता।(अनुच्छेद-28)

राज्य में निवास करने वाले प्रत्येक व्यक्ति और समूहों को बिना किसी दबाव के अपने अंतःकरण की स्वतंत्रता, और अपने धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रत्याभूत की गई है। लेकिन ये सभी सुविधाएँ लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के हित में राज्य द्वारा प्रतिबंधित की जा सकती हैं।

उपरोक्त परिसीमाओं के अधीन रहते हुए भारत में प्रत्येक व्यक्ति को न केवल धार्मिक विश्वास का, बल्कि ऐसे विश्वास से जुड़े हुए आचरण करने का और अपने विचारों का दूसरों को उपदेश करने का अधिकार है।(अनुच्छेद-25)

भारत के प्रत्येक नागरिक को धर्म के मानने, आचरण करने और प्रचार करने के अधिकार के साथ-साथ अपने पसंद अनुसार धार्मिक संस्थाओं की स्थापना करने, तथा उनके संपत्ति के प्रबंधन का अधिकार है।(अनुच्छेद-26)

अनुच्छेद 25-26  द्वारा प्रत्याभूत धार्मिक स्वतंत्रता के प्रावधानों को भारत के न्यायपालिका के न्यायिक निर्णयों द्वारा और विस्तृत कर दिया गया हैं। न्यायालय के अनुसार अनुच्छेद 25-26 में व्यक्ति को श्रद्धा और विश्वास को मानने और प्रचार करने का अधिकार तो है ही वह सब कर्मकांड या प्रथाएं मानने का अधिकार भी है जो उस संप्रदाय के अनुयायियों द्वारा धर्म का अंग समझी जाती हैं।

धर्म तो विश्वास का विषय है। यह आवश्यक नही है कि वह ईश्वरीय हो। भारत में सुप्रसिद्ध बौद्ध और जैन धर्म निरीश्वरवादी हैं। प्रत्येक धर्म में कुछ आस्थाएं और सिद्धांत होते हैं जिन्हें उस धर्म के अनुयायी अध्यात्मिक अभ्युदय के लिए सहायक मानते हैं। राज्य के कानून उन विषयों में हस्तक्षेप नही कर सकते जो सरवान रूप से धार्मिक हैं।

भारत में न्यायालय को यह निर्णय करने का अधिकार हैं कि कोई विशिष्ट कर्मकांड या पूजा पद्धति उस धर्म की मान्यताओं के अनुसार आवश्यक है या नही। यदि कोई विशिष्ट पद्धति लोक स्वास्थ्य या सदाचार के विरुद्ध है, किसी सामाजिक,आर्थिक या राजनीतिक विनियमन करने वाली पद्धति का उलंघन करती है तो न्यायालय हस्तक्षेप कर सकेगा।(बसु 2013 : 140)

धर्मनिरपेक्षता के अर्थ से सम्बंधित विविध व्याख्याओं और इससे सम्बंधित विरोधाभाषों को दूर करने के लिए भारतीय उच्चतम न्यायालय के नौ जजों की बेंच ने एस.आर. बोम्बई केस(1994) में अपने एक निर्णय में इससे सम्बंधित शंकाओं के निराकरण का प्रयास किया।

न्यायालय के अनुसार पंथनिरपेक्षता से सम्बंधित निम्नलिखित तथ्य हैं, जो भारतीय सन्दर्भ में प्रासंगिक हैं- धर्मनिरपेक्षता का यह अर्थ नही है कि राज्य का धर्म के प्रति शत्रुभाव है। अर्थ यह है कि राज्य को विभिन्न धर्मों के बीच तटस्थ रहना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपना धर्म मानने और उस पर आचरण करने की स्वतंत्रता है। यह तर्क मान्य नही है कि यदि कोई व्यक्ति निष्ठावान हिन्दू या निष्ठावान मुस्लिम है तो वह धर्मनिरपेक्ष नही रह जाता।

यदि धर्म का उपयोग राजनैतिक प्रयोजनों के लिए किया जाता है और राजनैतिक दल अपने राजनैतिक प्रयोजनों के लिए उसका आश्रय लेते हैं तो इससे राज्य की तटस्थता का उलंघन होगा। धर्म के आधार पर निर्वाचकों से अपील करना धर्मनिरपेक्षीय लोकतंत्र के विरुद्ध है। राजनीति और धर्म को मिलाया नही जाना चाहिए। यदि कोई राज्य सरकार ऐसा करती है तो उसके विरुद्ध संविधान के अनुच्छेद 356 के अधीन कार्रवाई उचित होगी। अतः इस अर्थ में धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूलभूत लक्षण होगी।  (बसु 2013:142)

भारतीय संविधान में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार निरपेक्ष अधिकार नही है। इसे सदाचार, स्वास्थ्य और लोक व्यवस्था बनाये रखने के लिए प्रतिबंधित किया जा सकता है। धार्मिक मुद्दे से जुड़े लौकिक विषयों के प्रबंध में भी राज्य का हस्तक्षेप हो सकता है। हिन्दू मंदिरों को सभी लोगों के लिए खोलने के लिए विधि का निर्माण किया जा सकता है। यह धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्गत सम्मिलित नही होगा।

अतः भारतीय संविधान निर्माताओं ने एक ओर अन्तःकरण और धर्म की स्वतंत्रता का पूर्ण समर्थन किया, तो दूसरी ओर सामाजिक सुधार और लोक व्यवस्था पर भी पर्याप्त बल दिया। मूल प्रश्न उठता है कि, धार्मिक स्वतंत्रता के अंतर्गत धर्म परिवर्तन भी सम्मिलित है या नही। वस्तुतः यह विवाद तब उत्पन्न हुआ जब मध्य प्रदेश और उड़ीसा की सरकारों ने एक विधि निर्मित करते हुए यह व्यवस्था की कि , लोभ, कपट और बल  के आधार पर धर्म परिवर्तन दंडनीय अपराध होगा, लेकिन कुछ लोगों ने इसे धर्म विशेष के प्रति विरोधी बताते हुए न्यायपालिका में चुनौती दी। ऐसे लोगों का तर्क था कि धार्मिक प्रचार में, धार्मिक परिवर्तन का अधिकार भी सम्मिलित है।

लेकिन न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि व्यक्तिगत रूप से कोई भी व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर सकता है, पर यदि लोभ, कपट और बल का प्रयोग करते हुए इसे जबरन करवाने का प्रयास किया जाता है तो यह दंडनीय होगा। इस प्रकार देश के धर्मनिरपेक्षता के स्वरुप को कायम रखते हुए संविधान भारत के सभी नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है, ताकि वे अपने धार्मिक उपासना की पद्धति और जीवन पद्धति का निर्धारण कर सकें।

इस प्रकार भारतीय संविधान जहाँ हर व्यक्ति के उपासना की पद्धति को सम्मान देता है; वही दूसरी तरफ यह सभी संस्थागत धर्मों को समान रूप से प्रोत्साहन देकर यह सकारात्मक धर्मनिरपेक्षता का उत्कृष्ट उदहारण प्रस्तुत करता है।

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