नारी की बद्दतर हालत का सबसे बड़ा कारण है लिंग भेद

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betiनारी शक्ति और महिलाओं के उत्थान के लिए वर्षों से लिखा जाता रहा है / बोला जाता रहा है। पर सचाई यह है की नारी की स्तिथि आज भी बेहतर नहीं हो पायी है।

इसका सबसे बड़ा कारण लिंग भेद है। और जब तक बेटा – बेटी में फर्क किया जाता रहेगा न ही भ्रूण हत्या रुकेगी और न ही हमारा देश विकाश की और बढ़ेगी।

आज की नारी बहुत ही दृढ इक्षा शक्ति के साथ पहले की अपेक्षा आगे बढ़ी हैं , पर पहले भी नारी की आत्मविश्वास में कोई कमी नहीं थी।

इस बात का उदाहरण ” झांसी की रानी ” जिसके बारे में कौन नहीं जानता की अपने साम्राज्य को बचाने के लिए अंग्रेजों  से किस बहुदरी से लड़ी थी।

भारत की लौह महिला ” इंदिरा गांधी ” , देश की पहली महिला प्रधानमंत्री जिसने पाक को  धूल चटाई और पुरे विश्व को दिखा दिया की भारत की नारी किसी से भी कम नहीं।

ऐसी अनेक महिलाएं हैं जिनका नाम भारत के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है और उनके योगदान के लिए उनको याद किया जाता है और याद किया जाता रहेगा।

जैसे – मदर टेरेसा , कल्पना चावला , बछेंद्री पाल , भारत की कोकिला के नाम से प्रसिद्ध सरोजनी नायडू इत्यादि ऐसे अनेक नाम हैं जो सिर्फ नारी ही नहीं बल्कि पुरुषों के लिए भी प्रेरणा श्रोत हैं।

भारत के महान नारियों की जब – जब चर्चा की जाएगी शूरों की देवी ” लता मंगेशकर ” के बारे में भी जिक्र होना अति आवश्यक है जिसने सभी को बतया ” मेरी आवाज ही पहचान है  …. ” लता दीदी के ये शब्द उनपर बिलकुल सटीक बैठता है।

बात अगर आज की नारी की भी की जायेगी तो आज भी नारी हर क्षेत्र में गौरव प्राप्त कर रही हैं / की हैं। जिनमें प्रमुख कुछ नाम हैं –  पहली महिला आईपीएस  किरण बेदी , बहुत ही कम उम्र में भारत का गौरव गर्व से ऊँचा करने वाली बैडमिंटन खिलाड़ी साइन नेहवाल , टेनिस की बहुत ही अच्छी खिलाड़ी सानिया मिर्जा , तीरंदाज झारखण्ड के बेटी दीपिका कुमारी , डांस के क्षेत्र में अपना लोहा साबित कर चुकी अलीशा ,  नौका से पूरे विश्व का चक्कर लगाने वाली भारतीय महिला -उज्ज्वला पाटिल , एवरेस्ट पर दो बार पहुंचने वाली प्रथम महिला -सन्तोष यादव। इत्यादि ऐसे अनेक सफल नाम है जो सफलता की ऊंचाई में खुद भी पहुंची हैं और बुलंद भारत देश का नाम भी बुलंदियों में पहुंचा दी हैं।

“ नारी तुम केवल श्रद्धा हो , विश्वास रजत नग पग तल में।

तुम पीयूष स्रोत सी बहा करो , जीवन के सुंदर समतल में । “

आज हमारे देश के नारी पुरुष प्रधान सोच वाली देश में हर क्षेत्र में बढ़ – चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं। और पुरुषों की तुलना बहुत ही अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं।

सर्वप्रथम बात शिक्षा जगत की ही कर लिया जाए ऊँचे से ऊँचे पद के लिए हो रही परीक्षाओं में लड़कियां बहुत ही अच्छा प्रदर्शन कर रही हैं।

स्कूल – कॉलेज में होने वाली परिक्षों में भी आज की लड़कियां लड़कों  से बेहतर अंक प्राप्त करके अव्वल स्थान प्राप्त कर रही हैं।

खेल जगत , फिल्म जगत या हो  राजनीति आज की नारी पुरुषों पर  है भारी। पर सबसे ज्यादा ख़ुशी की बात देश के सुरक्षा की जिम्मा  भी आज की नारी अपने हाथों में संभाली हुई है सेना में जाकर ।

इस देश में नारी को श्रद्धा , देवी , अबला जैसे संबोधनों से संबोधित करने की पंरपरा अत्यंत प्राचीन है । नारी के साथ इस प्रकार के संबोधन या विशेषण जोड़कर या तो उसे देवी मानकर पूजा जाता है या फिर अबला मानकर उसे सिर्फ भोग्या या विलास की वस्तु मानी जाती रही है ,

लेकिन इस बात को भुला दिया जाता है कि नारी का एक रूप शक्ति का भी रूप है । जिसका स्मरण हम औपचारिकता वश कभी-कभी ही किया जाता रहा है ।

नारी मातृ सत्ता का नाम है जो हमें जन्म देकर पालती पोसती और इस योग्य बनाती है कि हम जीवन में कुछ महत्तवपूर्ण कार्य कर सके ,

फिर आज तो महिलाएं , पुरूषों के समान अधिकार सक्षम होकर जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में अपनी प्रतिभा औऱ कार्यक्षमता का लोहा मनवा रही है । जैसा की मैं अपने लेख में भी ऊपर इस बात को स्पष्ट की हूँ।

कभी एक बात आपने गौर की है कि बारह-पंद्रह साल की किसी लड़की को घर से अकेले जाने में कई दफा सोचना पडता है ।

कई बार तो उसके साथ आठ-नौं साल के अबोध बच्चों के साथ उन्हें घर से जाने की इज़ाजत दी जाती है यह जानते हुए भी रास्तें में होने वाली किसी घटना में वह मासूम चाह के भी कुछ नहीं कर पायेगा ,

( इस बात को आप स्वयं अपने परिवार में भी महसूस करते होंगे । )

और रही बात घर के भीतर की तो आज घरेलु महिलाओं को इस बात की इज़ाजत नहीं वे अपने मन से कुछ बना सके आज भी महिलाएं खाना बनाने से पहले यह पूछती हैं कि आज क्या बनाना है ?

क्या खाना चाहते हैं घर के मुखिया महिला आरक्षण विधेयक आज भी लंबे समय से हाशिये पर पड़ा है । नारियों की सामाजिक और आर्थिक स्वतंत्रता देखकर तो दुखद रूप से स्वीकार करना पड़ेगा कि देश का और कथित प्रगतिशील पुरूष समाज अभी तक नारी के प्रति अपना परंपरागत दृष्टिकोण पूर्णतया बदल नहीं पाया है ।

अवसर पाकर उसकी कोमलता से अनुचित लाभ उठाने की दिशा में सचेष्ट रहता है । यह तो पूर्ण रूप से सच ही है की नारी अपने सभी ख्वाहिशों को संदूक में बंद कर दी है , और उस संदूक का चाभी पुरुष प्रधान देश के लगभग सभी पुरुष अपने जेब में ले कर घुमते हैं । यह एक कड़वा सच है जो मुझे स्वीकार करनी ही पड़ेगी।

आवश्यकता इस बात की है कि अपनी इस मानसिकता से छुटकारा पाकर वह नारी को निर्भय और मुक्त भाव से काम करने का अवसर प्रदान करें ।

अब सवाल ये उठता है की औरत , देवी भी है औरत वेश्या भी है और औरत माँ भी है तो सबसे महान कौन ? तो मैं बताना चाहूंगी “ऐसी है वेश्या की जिंदगी ” जाहिर सी बात है ,

 हमारी नजरो मे सबसे महान वो वेश्या ही होगी जो जानती है कि ये जहर है इसके बाद भी वो जहर का घूंट पी लेती है । पी के विष का प्याला दिया अमृत उसने सबको ,

बिकी पैसो कि खातिर लुटा तन अपना । फिर भी हममें और हमारे समाज में इतनी हिम्मत कहां उसको महान कहने की। जिस दिन भी हम एक वेश्या को महान या देवी का रूप दे देंगे , उस दिन वाकई मे हमारा देश महान हो जायेगा ।

क्या किसी ने भी , कभी ये जानने की कोशशि की कि .. बाजार मे बैठी ये औरत जो चंद रुपयों की खातिर जिस्म का धंधा करती है , उसकी मज़बूरी क्या होगी … आखिर क्यूँ ?

व्यक्ति से समाज बना है और इस आदर्श समाज की संरचना भी हमने ही की है। क्या किसी ने सोचा है कि लोग चंद रूपए फ़ेंक कर उस औरत के जिस्म को नहीं रौंदते बल्कि उसकी भावनाओ को रौंदते है , एक माँ को , एक बहन को और एक पत्नी को समाप्त करते हैं। सिर्फ अपनी वासना की खातिर ।

कहते हैं कि स्वाभिमान की जिन्दगी हर इन्सान जीना चाहता है तो क्या एक वेश्या इंसान नहीं होती या क्या वो भी एक प्यार करने वाला दिल नहीं चाहती ? क्या वो भी किसी घर की शोभा नहीं बनाना चाहती ?

मगर समाज के कुछ भूखे लोग , अपनी नजरो से , अपनी हरकतों से उसकी भावनाओं को सुन्न कर देते हैं । माँ ….. कितन मीठा , कितना अपना , कितना गहरा और कितना खूबसूरत शब्द है।

समूचि पृथ्वी पर बस यही एक पावन रिश्ता है , जिसमें कोई कपट नहीं होता। कोई प्रदूषण नहीं होता , इस रिश्ते में निहित है छलछलाता ममता का सागर। शीतल और सुगन्धित बयार का कोमल अहसास , इस रिश्ते को गुदगुदाती गोद में ऐसी अव्यक्त अनुभूति छिपी है , जैसे हरी , ठंडी और कोमल दूब। संसार की हर माँ अपने बच्चों का ख्याल रखती है।

नारी का महत्व लोग इस बात से भी समझ सकते हैं , कुछ लोग समझते हैं और कुछ लोगों का जमीर तो तब मर जाता है जब वो वासना में इतने अंधे हो जाते हैं कि बालात्कार जैसा घिनौना कुकर्म कर देता है। वो क्यों नहीं सोचता अपनी भूख की खातिर मैंने किसी के स्त्रित्वा को छीन लिया , जिसकी स्त्रित्वा छीनी जाती है वो भी नारी है उसको जन्म देने वाली माँ भी नारी  है।

इतनी सरल बात आखिर लोग कब समझेंगे ? कहते हैं कि …

लकड़ी जल कोयला बनी , कोयला जल बनी राख ।

अभागिन ऐसी जली , कोयला बनी न राख ।

क्या यही गलती थी उस बेचारी की ,

किसी दरिंदा की जमीर हो गयी थी खाख।

आखीर कब समझेंगे लोग  – वो हमेशा हमारे साथ है , कभी माँ बनकर लोरिया सुनाती है , कभी बहन बनकर हमारी शरारतों पे पर्दा डालती है , कभी प्रेमिका बनकर जिंदगी में रंग भरती है , कभी पत्नी बनकर हमारा घर संवारती है।

कभी बेटी बनकर हमारी सेवा करती है , कभी बहु बनकर हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए सुख का आश्वासन देती है । – वो नारी ही तो है , जो इस संसार की सबसे बड़ी शक्ति है।

बेटी – बेटा में फर्क क्यों करती है समाज ? जबकि बेटी एक ऐसा शब्द है जिसे सुनते ही बहुत से अहसास मन में उभरने लगते हैं। कुछ दर्द , कुछ ममता , कुछ चिन्ता , कुछ डर , कुछ गर्व …. अगर बेटी शादीशुदा है और ससुराल में है , चाहे कितनी भी सुखी और संपन्न क्यों न हो।

फिर भी माँ बाप की ममता का छोर भीगा ही रहता है ,  जब बेटी पास होती है तब कुछ कहा नही जाता। जब दूर चली जाती है तो बहुत कुछ कहने को मन तरसता है। कितना अनोखा है ये रिश्ता , वैसे सभी रिश्ते ह्रदय से जुड़े होते है पर शायद ये रिश्ता दर्द से जुड़ा हुआ है।

आज समय कुछ बदल रहा है … अधिकतर लड़कियां अपने पैरों पर खड़ी है और कंधे से कंधा मिला कर अपने कार्य क्षेत्र में निरंतर आगे बढ़ रही हैं।

आज कई घरों में बेटी बेटा बन अपने बूढे़ माँ बाप और पूरे परिवार की देख भाल भी कर रही है। लेकिन बेटी तो बेटी है ,

उसे विवाह के बाद हर हाल में बाबुल को छोड़ कर जाना ही है। जैसा कि हमारे शास्त्रों के अनुसार विवाह मंडप में माता पिता अपनी बेटी का कन्या दान कर उसे दान कर देते हैं , और दान दी हुई वस्तु पर फिर कोई हक नही रह जाता । इसी लिए बेटी को पराया धन कहा जाता है ।

विवाह के बाद बेटी का ससुराल अपना और मायका पराया बन जाता है … और एक मेहमान की तरह ही मायके में उसका आना जाना होता है ………

कितना अजीब सा लगता है न ! जिस घर में बचपन बीता , जिस आँगन में खेली , क्षण भर में ही वो बेगाना बन जाता है। एक ही पल में एक नन्हीं सी जान चिड़िया की तरह कब फुर से उड़ जाती हैं , पता ही नहीं चलता बस रह जाती है दर्द भरी यादें … कैसा अद्भुत है ये दर्द का रिश्ता , जिसे हर बेटी के माँ बाप को सहना पड़ता है शायद मेरे माता – पिता भी सहते हैं।

अंत में मैं एक बात कहना चाहूंगी –

अनमोल धरोहर एवं समाज की नींव हैं बेटियां ,प्रकृति का पुरुष को ये सबसे बड़ा दान हैं। स्नेह की प्रतिमूर्ति हैं ये लाज हैं सम्मान हैं ,धैर्य की गंगा हैं ये कुलों का अभिमान हैं। प्रेम का प्रकाश हैं ये कोमल अरमान हैं ,जननी मातृशक्ति हैं ये हैं तो खानदान हैं , समर्पण हैं त्याग हैं ये सभ्यता की शान हैं। बेटियाँ हैं तो हम हैं ये हमारी प्राण हैं , सृष्टि का आधार हैं ये बेटियाँ वरदान हैं। आओ इन्हें लगा लें गले जीवन धन्य हम करें , हर घर में एक बेटी हो, पावन संकल्प हम करें। घर-घर में दीप खुशी के जलाती हैं बेटियां , धनवान हैं वे जिनके घर आती हैं बेटियां।

बेटी है तो सृष्टि है –

नसीबों का खेल नहीं , कुदरत की देन नहीं।

जो मिले वही सही , एक बात याद रखें ,

नारी नहीं तो आप नहीं मैं  नहीं।

urmila” उर्मिला कुमारी   “

बाबा पथ , नियर – आनंद बिहार , हुरहरु, हजारीबाग

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