बीबीसी की नजर में बलात्कार पर फांसी वनाम दोषी

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पिछले समय में ऐसे आसान रास्ते कई बार चुने गए हैं। दिसंबर 2012 में जब यौन हिंसा के ख़िलाफ़ बने क़ानून को कड़ा करने की कवायद शुरू हुई तो वो फांसी की सज़ा पर आकर सिमट गई।

nirbhaya_rapeमहिला आंदोलनकारी जो दशकों से क़ानून में बदलाव की मांग कर रहे थे, उन्होंने कहा कि फांसी जैसी कड़ी सज़ा बलात्कार की रोकथाम का इलाज नहीं है और ये समझ दुनियाभर के अनुभव से बनी है।

साथ ही उन्होंने मांग की कि नए क़ानून में बलात्कार को सिर्फ़ सड़क पर एक अजनबी द्वारा की गई हिंसा से आगे बढ़कर समझा जाए और उसी मुताबिक क़ानून में प्रावधान लाए जाएं।

पर शादी में बलात्कार के लिए सज़ा, और बलात्कार के मामलों में सेना को आफ़्स्पा (जो सेना को विशेषाधिकार देता है) क़ानून की सुरक्षा ना दी जाने की उनकी मांगें, नहीं मानी गईं।

ये मौजूदा समझ को चुनौती देने वाले ख़्याल थे, नई सोच थी, नज़रिया बदलने की दरकार कर रही थी, नई बहस को जन्म देने का माद्दा रखती थी. पर ये भी फांसी की सज़ा की मांग के शोर में गुम गई।

बलात्कार के ख़िलाफ़ क़ानून कड़ा करने के लिए फांसी का प्रावधान लाना, निर्भया पर बनी फ़िल्म के कुछ अंश की जानकारी पर ही फ़ैसला सुनाना या लेखक वेन्डी डॉनिगर की हिन्दुओं पर लिखी किताब पर रोक लगाना।

क्या अलग नज़रिए को समझने की सहनशीलता कम हो रही है? या ठहरकर मुद्दों पर समझ बनाने की बजाय तेज़ी से विचारों को सामने रखने की चाह बढ़ रही है?

leslee_udwin‘इंडियाज़ डॉटर’ बनाने वाली फ़िल्मकार लेस्ली उड्विन, ख़ुद बलात्कार का शिकार हो चुकी हैं। फिर भी इस फ़िल्म में बलात्कार के दोषी व्यक्ति के विचार सामने रखना उन्होंने सही और ज़रूरी समझा।

वहीं अमरीका में बलात्कार और जान से मारने की कोशिश से उबरी एक महिला ने तय किया कि वो अपने बलात्कारी का नाम मीडिया में नहीं आने देंगी। उनके लिए उसके पक्ष से ज़्यादा ज़रूरी उस घटना के बाद बलात्कार पीड़ितों के साथ किया जा रहे उनके अपने काम की चर्चा है।

ज़ाहिर है महिलाओं की सुरक्षा पर नज़र बहुतों की है, बस नज़रिया अलग है। ये आवाज़े जुड़ जाएं तो शोर में भी आगे का रास्ता साफ़ सुनाई पड़ेगा। (बीबीसी)

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