न सरकार न पुलिस, सिर्फ दैनिक जागरण

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राज़नामा.कॉम (मुकेश भारतीय)। बिहार हो या झारखंड। पटना हो या रांची। महिला हो या हरिजन। थाना से लेकर मुख्यालय तक। हर जगह एक ही नज़ारा। न कहीं बिहार-झारखंड पुलिस और न कहीं बिहार-झारखंड सरकार का नाम! सिर्फ और सिर्फ दैनिक जागरण का नाम। अब आप इसे क्या कहेगें? क्या सरकार या उसके पुलिस विभाग के पास अपना नामाकंरण करने के पैसे नहीं है या अखबार के सामने उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम है। जबकि आम नागरिक के एक बड़ी आबादी पर इसका कुप्रभाव यह पड़ रहा है कि वे इस अखबार से जुड़े एक अदद संवाददाता/कर्मी को पुलिस विभाग से सीधा जुड़ा महसुस करता है और उसके धौंस का शिकार हो जाता है।

अत्यंत आश्चर्य की बात तो यह है कि इस संबध में न पुलिस, न अखबार और न सरकार के नुमायंदे ही अपनी मुंह खोलने को तैयार हैं।

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