बिहार स्वास्थ्य विभाग का यह विज्ञापन नहीं, आम जन के प्रति है बड़ा अपराध

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”  एक  मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देती है …एक खटमल पूरी रात को अपाहिज बना देता है …क्योंकि आत्मा और अंदर का इंसान मर चुका है… जीने के लिए घिनौने समझौते कर चुका है …साला एक मच्छर आदमी को हिजड़ा बना देता है…”

 -: राज़नामा.कॉम /मुकेश भारतीय :-

लेकिन..यदि आज हम बिहार के समाचार पत्रों में प्रकाशित एक विज्ञापन की बात करें तो साफ स्पष्ट होता है कि नाना पाटेकर अभिनित फिल्म यशवंत की  मशहूर उक्त गीत-डॉयलोग के विपरित एक मच्छर ने  पूरे स्वास्थ्य विभाग-तंत्र को हिजड़ा बना दिया है।

स्वास्थ्य सेवाएं, बिहार के निदेशक प्रमुख के स्तर से समाचार पत्रों में एक विज्ञापन पीआर नं. 1101 (हेल्थ) 2018-19 प्रकाशित करवाई गई है।

इस विज्ञापन में मूलतः उल्लेख है कि…

श्री सृस्टि राज सिन्हा, एसडीओ सहरसा की मुत्यू डेंगु से नहीं हुई है। स्वास्थ्य विभाग समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों का श्री सिन्हा की असमायिक मृत्यु पर खेद प्रकट करते हुए खंडन करती है।

विज्ञापन के अनुसार संबंधित निजी अस्पताल, जहां श्री सिन्हा दिनांक 20.10.2018 को पहली बार भर्ती हुए, उसी दिन 7.25 अपराह्न में डिस्चार्ज कर दिये गए। पुनः दिनांक 29.10.2018 को उसी अस्पताल में भर्ती हुए।

उन कागजात के अध्ययन करने पश्चात ज्ञात हुआ कि दिनांक 31.10.2018 को श्री सिन्हा की मृत्यु हुई। चिकित्सीय रिपोर्ट में श्री सिन्हा डेंगू ऋणात्मक पाए गए। मृत्यु के कारणों के संबंध में संदर्भित निजी अस्पताल द्वारा अभी मृत्यु प्रमाण पत्र निर्गत नहीं किया गया है।

विज्ञापन में आरोप लगाया गया है कि कतिपय समाचार पत्रों द्वारा इस संबंध में प्रकाशित समाचार भ्रामक है तथा इस प्रकार का समाचार आम जनों में डेंगू के संबंध में भ्रांति फैलाने का कार्य कर रहा है।

दिवंगत एसडीएम सृस्टि राज सिन्हा की फाइल फोटो……

दरअसल स्वास्थ्य विभाग का यह विज्ञापन ही बड़ा भ्रामक है। स्वास्थ्य विभाग के निदेशक प्रमुख को यह भी पता नहीं है कि सृस्टि राज सिन्हा को हिलसा (नालंदा) के एसडीओ से स्थानान्तरित कर सहरसा का वरीय उप समाहर्ता बनाया गया था, न कि सहरसा का एसडीओ।

सबसे बड़ी बात कि परिजनों के अनुसार उन्हें प्रारंभिक तौर पर ही पारस अस्पताल द्वारा डेंगु होने की बात कही गई। उसी का ईलाज हुआ। अगर डेंगू से सृस्टि राज सिन्हा की मौत नहीं हुई तो फिर फीवर के साथ अचानक मौत कैसे हो गई। क्या बिना मृत्यु प्रमाण पत्र के कोई अस्पताल किसी का शव परिजनों को सौंप सकती है?

जिस मानसिकता से स्वास्थ्य विभाग मीडिया की खबरों का खंडन कर रही है, वह काफी शर्मनाक है। विज्ञापन में एक प्रशासनिक अफसर की मौत के कारणों का भी उल्लेख किया जाना चाहिए। लेकिन उसे यह कह कर छुपा लिया गया है कि अस्पताल से अभी मृत्यु प्रमाण पत्र निर्गत नहीं हुआ है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि पारस अस्पताल सरीखे बड़े बड़े निजी अस्पताल सरकारी सांठगांठ से अधिक पनपते हैं। यह अलग बात है। लेकिन डेंगू को लेकर इस तरह के विज्ञापन आम जन में भ्रम पैदा करने वाले हैं।

दिवंगत एसडीएम सृस्टि राज सिन्हा को मुखाग्नि देते उनके 6 वर्षीय पुत्र…

यह विभागीय निकम्मापन और सरकार की लापरवाही ही है कि एक तरफ राज्य में डेंगू जैसे जानलेवा रोग के वायरस तेजी से फैल रहे हैं, वहीं उसे लेकर भ्रामक संदेश जिम्मेवार लोग ही दे रहे हैं। क्या विभाग या सरकार यह मानती है कि बिहार में डेंगु का प्रकोप नहीं है और उससे कोई मौत नहीं हुई है?

यह सब जानते हैं कि सूबे में सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं की हालत क्या है। कहीं लगता ही नहीं है कि विभागीय मंत्री पद भी कोई है। ऐसे भी सरकार खुद की कथित सुशासन की छवि से इस कदर ग्रस्त हो चुकी है कि वे आयना देखने को तैयार ही नहीं होती।

अगर किसी भ्रामक समाचार का खंडन ही करना है या फिर अपनी लापरवाहियों को ढंकना ही है तो विभागीय निदेशक प्रमुख या मंत्री या फिर अस्पताल को मीडिया के सामने खुलकर प्रेस कांफ्रेस करनी चाहिये थी, चोरी छुपे विज्ञापन के जरिये अपनी बात कहने की क्या जरुरत पड़ गई? छुपाने से काली दाल सफेद नहीं हो जाती।

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