न्यूज पोर्टलो में निष्पक्षता का अभाव

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अखबार और टीवी चैनलो की तो पोल खुल चुकी है । अधिकांश पढे-लिखे लोगो का मानना है कि ये दोनों माध्यम अपने स्वार्थ को सर्वोपरि रखकर कोई भी समाचार प्रकाशित करते है। निष्पक्षता की बात बेमानी है। इनके कंटेट, समाचार से यह साफ़ झलकता है। एक दुसरे की प्रशंसा ये नही कर सकते क्योंकि व्यवसायिक प्रतिद्वंदिता है। एक दुसरे के खिलाफ़ भी खुलकर नही लिखते सिवाय नंबर एक वाले सर्वेक्षण के जो ग्राहक यानी विग्यापनदाता को फंसाने के लिये होता है।

इन दोनो माध्यमो की असलियत को सामने लाने एवं विश्वसनियता को समाप्त करने मे मास मीडिया यानी व्यापक स्तर पर अपनी पहचान बना चुके ब्लाग और न्यूज पोर्टलो का बहुत बडा हाथ है या यो कहे कि ब्लाग एवं न्यूज पोर्टलो ने हीं इनसे लड़ाई लड़ी।

 जिसका परिणाम हुआ कि ये दोनो माध्यम भी खुद नई मीडिया का सहारा लेने को बाध्य हो गये परन्तु इसके साथ हीं एक और खतरा पैदा हो गया है वह है न्यूज पोर्टलो मे भ्रष्ट और चमचो की घुसपैठ।

खासकर बिहार मे यह कुछ ज्यादा दिख रहा है। बिहार मे बहुत सारे न्यूज पोर्टल पैदा हो गये हैं। कुछ तो आर्थिक भार न सहन कर सकने के कारण बंद हो गये और बाकियों ने अखबार तथा टीवी की राह पकड ली ।

बहुत सोच विचार करने के बाद इस तरह के बिहारी चैनलों की असलिअयत खोलने का निश्चय किया है ताकि विश्वसनीय बन चुकी नई मीडिया की साख बच सके। बिहार के न्यूज पोर्टलो मे कोई भी निष्पक्ष नही है।

कुछ जातीय दुर्भावना से लिखते है। उन्हें हर समाचार, घटना के पिछे अगड़ावाद-पिछ्ड़ावाद दिखता है। कुछ नौकरशाही पर लगाम लगाने का दावा करते हैं, लेकिन वास्तव मे वे नौकशाहो के बचाव मे लिखते है।

 जिस तरह के चैनल की कार्यशैली बहुत मजेदार है। पहले वे किसी घटना , समाचार को खुब उछालेंगें। उसके बाद माल फ़रियाकर धिरे धिरे उस विषय पर लिखना बंद कर देंगे । इनका स्टाईल भी कम प्रभावकारी नही है।

 कभी नौकशाहों के पैसे से सेमिनार या वर्कशाला का आयोजन करना कभी उन्हें सदी का महानतम इमानदार घोषित कर देना। खुद को बुद्धिजीवी दिखलाने के लिये रंगे सियार की तर्ज पर शेर की खाल पहने नजर आयेंगे।

 फ़िलहाल स्थानीय न्यूज पोर्टलो के बीच रांची से संचालित मुकेश भारतीय का पोर्टल राजनामा डाट कॉम (www.raznama.com) मुझे निष्पक्ष लगा। आर्थिक मार झेल रहे और बंदी के कगार पर पहुच चुके इस पोर्टल को चलाने एवं मौत से बचाने के लिये प्रतिमाह कम से कम दस हजार रुपये प्रतिमाह की दरकार है। मैनें अपने सीमित साधन से एक हजार रुपया प्रतिमाह तब तक इस पोर्टल को देने का निश्चय किया है जब तक यह निष्पक्ष रहता है और आर्थिक रुप से सक्षम नही हो जाता । मैंने मुकेश भारतीय को सलाह दी है कि आम आवाम को जोड़े।  पचास रुपया सौ रुपया भी मदद के रुप मे मिले तो उसे स्वीकार करे।  आभार माने देने वाले का। हां समझौता न करे।

मैंने जार्ज से आम आवाम को जोडने का तरीका सिखा था जब वे नितिश के शुरुआती काल मे गया आये थे। चंदा देकर प्रचार की व्यवस्था की थी। नीतीश उस समय भाजपा के साथ नही थे। मानपुर मे उनकी सभा हुई थी । गया के छोटे से मैदान आजाद पार्क मे जार्ज आये थे। स्टेज का जिम्मा था मेरा।  सभा के बाद उसी मंच से दस रुपया लोगों से वसूला था जार्ज ने।

 शुरुआती दौर था चमचे थे नही, चार घंटे गया के सर्किट हाउस मे जार्ज के साथ बिहार की राजनीति पर चर्चा करता रहा था।  मात्र दो-तीन आदमी थे । आज फ़िर वह दौर और जार्ज याद आ रहे है।

मेरा निवेदन होगा सियार न्यूज पोर्टलो से बचें,  बिहार के किसी भी न्यूज पोर्टल पर विश्वास न करे। इस पोस्ट के आने पर देखियेगा सियार कैसे शेर की तरह डराने का प्रयास करेंगे।  लेकिन है तो वे सियार हीं। जब निकलेगी हुआं हुआं, दहाड नही ।

……वरिष्ठ अधिवक्ता पत्रकार मदन तिवारी अपने फेसबुक वाल पर

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