बिहार का ‘डीएनए’ ही ऐसा है कि विश्व नेता को जिला नेता भी न रहने दिया

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pm narendra modiबिहार में भाजपा की हार नरेंद्र मोदी की हार है। ऐसा इसलिए है कि पूरे चुनाव में भाजपा कहीं थी नहीं। सारी सभाओं, पोस्टरों, बोर्डों, अखबारों और टीवी चैनलों पर अगर कोई था तो बस नरेंद्र मोदी था।

भाजपा में मोदी से कहीं बेहतर वक्ता हैं− सुषमा स्वराज की तरह और जनता से जुड़े बेहतर नेता हैं− राजनाथसिंह की तरह लेकिन कहीं आपने उनकी आवाज़ सुनी? बस मोदी और अमित शाह। इस संकरी गली में कोई तीसरा घुस ही नहीं सकता था।

एक ने अपने आप को प्रधानमंत्री से प्रचारमंत्री बना लिया और दूसरे ने खुद को पार्टी अध्यक्ष से अचार मंत्री बना लिया। बिहार में भाजपा का अचार निकल गया। मुझे 60 सीटों का अंदाज़ था। इतनी भी नहीं मिलीं।

भाषणों में प्रधानमंत्री पद की गरिमा भी खटाई में पड़ती रही। प्रचारमंत्री और अचारमंत्री ने मिलकर भाजपा के लिए देश में खटाई ही खटाई फैला दी।

मोदी को यह गलतफहमी हो गई है कि वे देश के महान नेता हैं। वे भूल गए कि लोगों ने उन्हें इसलिए चुना था कि वे कांग्रेस के भ्रष्टाचार से तंग आ चुके थे। वे एक साफ−सुथरी सरकार चाहते थे।

मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी की चादर पर कोई दाग नहीं था। इसीलिए लोगों ने उनकी पीठ ठोकी और उन्हें स्पष्ट बहुमत मिला। विकास का उनका नारा निरर्थक था। गुजरात में उन्होंने कोई चमत्कारी काम नहीं किया था।

वे वहां राजधर्म का निर्वाह भी नहीं कर सके थे। भारत के लोगों ने उनकी ‘मौत के सौदागर’ की छवि को भी दरकिनार कर दिया था।

ये बात अलग है कि चुनाव जीतने की चिंता में उन्होंने ही जनता को अनाप−शनाप सब्जबाग दिखा दिए थे। ये सब्जबाग ही उनको ले बैठे।

शुरू−शुरू में जिन राज्यों में चुनाव हुए, उनमें आम−चुनाव की हवा का फायदा मोदी को मिला लेकिन दिल्ली के चुनाव ने साफ संकेत दे दिए थे कि हवा तेजी से निकल रही है। गाड़ी पंचर होने को है।

फिर भी प्रधानमंत्रीजी ने कोई सबक नहीं लिया। वे बंडियां बदल−बदलकर बंडल मारते रहे। बिहार ने पूरी हवा ही निकाल दी।

बिहार के इस चुनाव में लालू ने मोदी को लल्लू बना दिया, क्योंकि बिहार के नेताओं के खिलाफ वे एक भी बिहारी नेता खड़ा नहीं कर सके। खुद ही खड़े हो गए।

मेरे बराबर कोई नहीं और मेरे अलावा कोई नहीं। न सुशील मोदी न शत्रुघ्न सिंहा, न यशवंत सिंहा। बस मैं और मेरा भाय। दोनों पीते रह गए चाय।। चाय की प्याली, ‘अति पिछड़े’ वाली भी घुमाई, लेकिन उसे भी किसी ने नहीं छुआ।

उनका तर्क यह था कि मैं बाहरी कैसे? क्या बिहार भारत में नहीं है? और क्या भारत का नेता मैं नहीं हूं। मैं तो विश्व−नेता हूं। अमेरिकी राष्ट्रपति को मैं बराक−बराक कहकर बुलाने की हैसियत रखता हूं।

मैं और शी याने चीन के राष्ट्रपति साथ−साथ झूला झूलते हैं। भला, नीतीश और लालू की मेरे आगे औकात क्या है? मैं दो−तिहाई मत से जीतूंगा।

अब आप एक−चौथाई भी नहीं रह गए। बिहार का ‘डीएनए’ ही ऐसा है कि उसने विश्व−नेता को जिला नेता भी नहीं रहने दिया।

…वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी जी अपने फेसबुक वाल पर डॉ. वेदप्रताप वैदिक के ताजा लेख का मुख्य अंश

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