बिहारः बारह टकिया ‘लाइनर’ और ‘स्ट्रिंजर’ कहलाते हैं पत्रकार !

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राजनामा.कॉम/जयप्रकाश नवीन  “बिहार के  प्रखंडों, अनुमंडलो तथा जिला मुख्यालय में  जो लोग पत्रकार कहें जाते हैं, इनमें से अधिकांश …दस टकिया या फिर बारह टकिया रिपोर्टर होते हैं। जिनके पास अपने परिचय के लिए न तो संबंधित समाचार पत्र का कोई  प्रेस कार्ड होता है,  और न ही पत्रकारिता की कोई डिग्री।

बिहार की पत्रकारिता के एक बड़े सचे को अपनी लेखनी से उकेरते आलेखक-पत्रकार जयप्रकाश नवीन...

बिहार में इस प्रकार के समाचार पत्रों की भरमार है। इस कारण नन मैट्रिक पास भी पत्रकार होते हैं। एक मरे दो घायल, आपसी विवाद में मारपीट, एक घायल बाइक दुर्घटना में दो घायल या फिर अवैध शराब के साथ धंधेबाज धराया की खबरें इसलिए प्रकाशित करते हैं कि हर खबर पर दस से बारह रूपये आसानी से मिल जाते हैं। क्या सचमुच यही पत्रकारिता है?”

समाचारों को सूंघने, खोदने, गढ़ने और लिखने वाला सक्षम एवं उत्साही व्यक्ति संवाददाता कहलाता है। यह समाचार प्रस्तुत करता है। जबकि संपादक उसका शोधन करता है। गवेषणात्मक प्रतिभा संपन्न संवाददाताओं को लार्ड नार्थ क्लिफ ने  “सृजनात्मक और मौलिक साहित्यकार” कहा था। कारण कि पूरे पत्र का शिल्पी संवाददाता ही होता है।

संवाददाता समाचार पत्र रूपी  शरीर का आंख, कान, नाक और मुख होता है। घटनाओं के प्रत्यक्षदर्शी होने के नाते वह आंख है। गली , सड़क, मंच एवं सभागार की विभिन्न गतिविधियों को सुन-सुनकर उसे अपने मस्तिष्क में संजोते रहता है। अतः वह पत्र का कान होता है।

घ्राण शक्ति के बल पर संवाददाता समाचार को सूंघता रहता है, फलतः वह नाक है। सशक्त लेखनी से समाचार को एक विशिष्ट रूप देकर उसे जनता के सामने सुनाने का कार्य संवाददाता का है,इस कारण वह मुख है।

लेकिन बिहार में संवाददाताओं  की परिभाषा अलग है। जिसे आप जानकर हैरान हो जाएंगे। यहां आंचलिक संवाददाताओं की पत्रकारिता क्या है? आप भी जानकर दंग रह जाएंगे।

बिहार में जिस तरह चालीस साल से वित रहित शिक्षा नीति ने शिक्षकों की आर्थिक स्थिति को बदहाल कर रखा है। उसी प्रकार बिहार के पत्रकारों की स्थिति भी काफी बदतर है। जान जोखिम में डालकर संवाद संकलन करने के एवज में उन्हें मिलता क्या है?

बिहार में दस टकिया और बारह टकिया ‘लाइनर’ और ‘स्ट्रिंजर’ पत्रकार कहलाते हैं। अर्थात छोटे कस्बे से समाचार प्रेषित करने वाला लाइनर या स्ट्रिंजर जो प्रकाशित संवादों की पंक्तियों के अनुसार पारिश्रमिक पाता है। या फिर समाचार पत्र द्वारा इसे निश्चित रकम प्रतिमास प्राप्त होती है। कुछ लोग इसे ‘रिटेनर’ भी कहते हैं। कुछ समाचार पत्र तो ऐसे संवाददाताओं को फूटी कौडी भी नहीं देती है।

अपने बीस साल के सक्रिय पत्रकारिता में मुझे भी ऐसे कई कडवे अनुभव से गुजरना पड़ा है। 1998 में लगभग इसी महीने में मैंने इंदौर से प्रकाशित एक साप्ताहिक से अपने पत्रकारिता की शुरूआत की थीं ।

मुझे बचपन से अखबारों से बड़ा प्यार रहा। स्कूल के दिनों में अखबार पढ़ने के लिए एक दोस्त के घर चला जाता था। या फिर किसी के बंद दुकान की शटर से अखबार निकाल कर पढ़कर फिर से शटर के अंदर फेंक देना आज भी मुझे याद है।

25 साल पहले संपादक के नाम पत्र लिखने का भी जुनून छा गया था। तब आर्यावर्त, दैनिक जनशक्ति में कई बार मेरे पत्र प्रकाशित हुए । जिसे मैं स्कूल और कॉलेज के दोस्तों को पढ़ाता था।

फिर जब घर पर अखबार आने लगा तो सबसे पहले अखबार लपक कर उसे एक घंटे में पूरे अखबार को पढ़ लिया करता था। उस समय अखबार में पन्ने भी कम हुआ करता था, लेकिन इधर तीन चार सालों से अखबार से विरक्ति सी आ गई है।

खैर मैं अपनी बात पर आता हूँ। अप्रैल 2000 से पहले बिहार में दैनिक “हिन्दुस्तान” का एकछत्र राज था। उसे चुनौती देने के लिए बिहार में बड़े जोर शोर के साथ “दैनिक जागरण” का आगाज होता है।

एक साप्ताहिक से मुझे एक दैनिक समाचार पत्र में काम करने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मैं अपने आप को एक नामी मीडिया हाउस से जुड़कर गौरवान्वित महसूस करने लगा।

मुझे काम करते हुए चार माह हो गए थे। एक दिन हमारे कार्यालय प्रभारी श्रद्धेय रमाशंकर प्रसाद जी ने कहा कार्यालय में बिल जमा कर देना। संवाद प्रेषण के चार महीने की फैक्स का बिल लेकर उनके पास गया। उन्होंने उक्त बिल पर अपने हस्ताक्षर किए। मैं उन बिलों को लेकर दैनिक जागरण के पटना कार्यालय में अकाउंट विभाग में गया। जहाँ मुझे दस रूपये के हिसाब से राशि भुगतान की गई।

मैंने लगभग तीन साल उक्त समाचार पत्र में काम किया। कुछ महीने तक का बिल भुगतान हुआ। लेकिन बाद के साल का बिल भुगतान होने से रह गया।

बाद में मैंने दैनिक “राष्ट्रीय सहारा” का दामन थामा। यहाँ भी कुछ महीने काम किया। लेकिन यहाँ वे दस रूपये भी देखने को नही मिला। उपर से विज्ञापन का दबाव। मैंने उस अखबार को भी अलविदा कह दिया।

इस दौरान जमशेदपुर से प्रकाशित मासिक “वार्तालाप मेल” और दिल्ली से “अमर भारती” के लिए नालंदा से लिखना शुरू किया। उक्त दोनों पत्रों ने मुझे खबर के बदले सम्मान जनक राशि प्रेषित की। जिसका अनुमान मैंने नहीं किया था ।

नवम्बर 2003 में मैंने हिंदी दैनिक “आज”  के लिए लिखना शुरू किया। इस अखबार में मुझे खबरों की आजादी मिली। अपने मन के मुताबिक मुझे खबर लिखने का मौका मिला। मैंने इस अखबार में काफी जमकर लिखा।

लगभग 12-13 साल मैंने इस अखबार में गुजार दिए। लेकिन इस अखबार ने मुझे पहचान तो दिया लेकिन एक फूटी कौडी भी नहीं मिली। जब कि 13 साल तक मैं संवाद प्रेषण का खर्च स्वयं वहन किया।

इस अखबार में काम करते हुए मुझे दिल्ली से प्रकाशित “पंजाब केसरी” में छह माह तक अंशकालिक संवाददाता के रूप में काम करने का मौका मिला।

पंजाब केसरी छोड़ने के बाद मुझे संवाद प्रेषण की खर्च की राशि और खबरों के अनुसार पूरी रकम  चेक के माध्यम से मुझे मिल गई थीं।

यह कहानी सिर्फ़ मेरी नहीं है। बिहार के प्रखंडों, अनुमंडलो और जिला मुख्यालय में काम करने वाले हर संवाददाता की है।

मीडिया संस्थानों के लिए आंचलिक  पत्रकार ‘यूज एण्ड थ्रो’ है। अखबारों  में  प्रवेश का न कोई नियुक्ति पत्र और  न निकास का इस्तीफा। बस धड़ाधड़ पत्रकार बनाओ, अखबार बिकवाओ, विज्ञापन वसूली कराओ जो विज्ञापन से न लाकर दें, उसे अखबार से हटाने की धमकी आम हो गई है।

आज जिसके पास बाइक हो, कैमरा हो वही पत्रकार बना फिरता है। भले ही पत्रकारिता की एबीसीडी उसे न , लेकिन अगर विज्ञापन मिल रहा हो तो वह उस अखबार के लिए प्रिय बना रहता है।

आजकल अखबार के कार्यालय से अब आंचलिक पत्रकारों पर विज्ञापन और प्रसार के लिए बहुत दबाव रहता है। जो गलत कार्यों में संलिप्त हैं,  मित्रता कर अखबार का प्रसार बढ़ाने में लगा रहता है, विज्ञापन लाता है, तभी वह  सच्चा पत्रकार कहलाता है।

आंचलिक संवाददाताओं को परिचय पत्र तक नहीं दिया जाता, जिस अखबार के लिए वह काम कर रहे हैं। उसके अधिकृत व्यक्ति हैं भी या नहीं इसका पता लगाने के लिए ब्यूरो चीफ से सम्पर्क कर ही जाना जा सकता है।

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