बिहारः नीतिश कुमार के आगे सब बौने

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nitish_bihar-:मुकेश भारतीय:- बिहार। आसन्न लोकसभा चुनाव में अब तक प्रायः सभी दलों  ने अपने  लड़ाकू मैदान में उतार दिये हैं। क्षेत्रवार समीकरण-मुद्दों के आलोक में जंग की जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह चौंकाने वाले परिणाम के संकेत दे रहे हैं।

कहा जा सकता है कि बिहार की चुनावी लड़ाई त्रिकोणात्मक अवस्था में है। एक तरफ है जदयू नीत थर्ड फ्रंट, दूसरी तरफ है भाजपा-लोजपा प्रेम और बीच में है राजद-कांग्रेस गठजोड़।

ऐसे में पिछले 9 वर्षों में ‘ 20 साल के लालू-राबड़ी राज’ पर अपनी विकास परक नीतियों के बल राज्य में सार्वाधिक लोकप्रिय जदयू नेता एवं मुख्यमंत्री  नीतीश कुमार की लोकप्रियता सबसे उपर है। यदि हम चुनावी समीकरणों की भी बात करें तो हर वर्ग का एक बड़ा तबका नीतिश के पक्ष में खड़ा नजर आता है।

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि भाजपा से अलग होने का असर जदयू के वोट के आकड़े को प्रभावित किया है लेकिन उतना नहीं, जितना कि कयास लगाये जा रहे हैं।

विश्लेषकों की राय में जदयू को भाजपा से सिंद्धातगत अलग होने के फैसले का नुकसान से अधिक फायदा होगा। भाजपा के कारण नीतिश सरकार के विकास कार्यों के बाबजूद दूरी बनाकर चल रहे मुस्लिम मतदाताओं को जदयू को सपोर्ट करने में अब कोई हिचकिचाहट नहीं है।

ऐसे भी बिहार में भाजपा के चुनाव पूर्व घोषित पीएम प्रत्याशी नरेन्द्र मोदी अपने रैलियों में जिस तरह की भाषा का प्रयोग किया है, उसका भी फायदा जदयू को ही अधिक मिलने की संभावना है।

नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषणों में “बिहार को आतंकियों का स्वर्ग, नीतिश को पीएम बनने का सपना देखने वाला सीएम, यदि मैं प्रधानमंत्री बना तो क्या नीतिश विशेष राज्य मदद नहीं लेगें” जैसे जुमलों का प्रयोग किया था। उनके लहजे में देश का सर्वमान्य सक्षम नेता होने का अहंकार साफ झलक रहा था।

सबसे बड़ी बात कि एक पत्रकार के कांग्रेस के संभावित पीए मैटेरियल राहुल गांधी और भाजपा के घोषित स्वंयभू नरेन्द्र मोदी से जुड़े सबाल के जबाव में नीतिश कुमार ने सिर्फ इतना ही कहा था कि एक को राज्य और दूसरे को केन्द्र का कोई अनुभव नहीं है जबकि उनके पास केन्द्र-राज्य दोनों का अनुभव है।

हालांकि साथ में ही उन्होंने यह भी स्पष्ट कर दिया था कि वे पीएम पद का स्वप्न नहीं देखते। फिलहाल उनकी चिंता सिर्फ बिहार तक ही सीमित है।

इसमें कोई शक नहीं है कि बिहार में 17 साल पुरानी भाजपा-जदयू गठबंधन टूटने के लिये अधिक दोषी भाजपा ही है। लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया में मुद्दों पर आधारित गठबंधन से जुड़े किसी भी दल को अपना पीएम प्रत्याशी घोषित कर लेना अत्यंत खतरनाक नीति है।

यह कोई जरुरी नहीं है कि एक दल के चहेता दूसरे दल का भी दुलरुआ बन जाये। खासकर नेता जब नरेन्द्र मोदी सा विवादित और राष्ट्रीय स्तर पर अपरिपक्व हो। किसी राज्य में लगातार 3-4 बार चुनाव जीत जाने का अर्थ देश का नेता बनने का प्रमाण पत्र नहीं है।

देश में ऐसे कई पूर्व-वर्तमान मुख्यमंत्री हैं, जो नरेन्द्र मोदी से खासे सफल और लोकप्रिय माने जाते हैं। हालांकि यह दीगर बात है कि वे अपने मुंह मियां मिठ्ठू बनने के परहेजी हैं।

बिहार की राजनीति में एक सच यह भी उभर कर सामने आया है कि तमाम विरोधियों खासकर भाजपा के हर सबाल का जबाव जदयू के पास है, लेकिन नीतिश के प्रश्नों का उत्तर किसी के पास नहीं है।

आखिर जदयू संग 8 साल सत्ता-सुख भोगने वाली भाजपा की नजर में मुख्यमंत्री राज्य का विनाशक कैसे हो गये। विकासपुरुष के कसीदे गढ़ने वाले भाजपा के आसमानी दिग्गज अपने भाषणों में कुछ भी कह के निकल लें लेकिन, आम जनता के बीच उनके जमीनी कार्यकर्ता वेशक निरुत्तर साबित होगें।

अब रही बात भाजपा के लोजपा संग गलबहियां डालने की तो दोनों दल के पास इसके जबाव नहीं है कि गोधरा कांड और गुजरात दंगों पर नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधते हुये   तात्कालीन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार की मंत्रिपरिषद से इस्तीफा देने वाले लोजपा के क्षत्रप पुनः एनडीए में किस लालसा में शामिल हो गये? वह भी मोदी को ही पीएम बनाने की हुंकार लेकर।

दूसरी तरफ चंद दिनों तक भाजपा को घोर सांप्रदायिक व उसके पीएम उम्मीदवार नरेन्द्र मोदी  को नरपिचाश की संज्ञा देने वाले राजद के प्रधान महासचिव रामकृपाल यादव में हनुमान की सुरत कैसे नजर आने लगी?

बिहार के लोग भलिभांति जानते हैं कि हाशिये पर पहुंचे रामविलास पासवान का मकसद किसी तरह अपनी डूबती नैया पार लगाना मात्र है वहीं, रामकृपाल यादव पाटलिपुत्र क्षेत्र से टिकट कटने की बौखलाहट में नमो-नमो का जाप करने लगे। इन दोनों का कोई हृदय परिवर्तन नहीं, अपितु लाचारगी रही है।     

बहरहाल अब तक के तमाम जमीनी सर्वेक्षणों के आधार पर कहा जा सकता है कि बिहार में नीतीश कुमार की जदयू के पक्ष में जो समीकरण बनते दिख रहे हैं, वह काफी चौंकाने वाले होगें। विश्लेषकों का साफ मानना है कि नीतिश की अगुआई में बिहार में जदयू 40 सीटों में 20 से 30 सीटें बटोर कर देश को चौंका सकती है। (राजनामा.कॉम)

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