बाज गइल डंका: लग गइल डंक

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लेखक-निर्देशक : रवि भूषण। गीतकार : प्यारेलाल यादव, रवि भूषण । संगीतकार : मधुकर आनन्द। छायांकन : आर आर प्रिंस। निर्माता : संजय कुमार मिश्रा

dankaमुम्बई के सिनेमाघरों में इस सप्ताह रिलीज होनेवाली भोजपुरी फिल्म का नाम है ‘बाज गइल डंका’. लेखक हैं रवि भूषण, जो इस फिल्म के निर्देशक भी हैं. लेखक-निर्देशक को इस बात के लिए धन्यवाद कि इस फिल्म को उन्होंने वल्गरिटी से बाहर रखा है. फिल्म में न तो द्विअर्थी बोलों वाले गीत हैं और न ही संवाद. आइटम साँग भी एक ही है और उसमें पिक्चराइजेशन के समय कैमरे का फोकस आइटम डांसर की देह पर नहीं है, जैसा कि आम तौर पर भोजपुरी फिल्मों में हुआ करता है.

किंतु कहानी कहने में रवि भूषण उलझ गये हैं. यह किसकी कहानी है, पता ही नहीं चलता. लेखक कहना क्या चाहता है यह भी स्पष्ट नहीं है. जब कहानी की दिशा और कथ्य ही अस्पष्ट है, तो जाहिर है पटकथा भी इधर-उधर भटक जाएगी.

लेखक समझ ही नहीं पाया है कि वह कैसी फिल्म लिख रहा है. हल्की-फुल्की कॉमेडी से फिल्म शुरुआत होती है, फिर फिल्म अचानक अपराध की तरफ मुड़ जाती है, यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन अपराधियों के इतने लेयर बना दिए गए हैं कि उससे निकलना लेखक को भारी पड़ गया और फिल्म बेमतलब के फाइट सिक्वेंस और अभिनेताओं को स्पेस देने में उलझकर रह गई.

वास्तव में लेखक हिट होने के सभी मसाले कहानी में भरने के चक्कर में हिन्दी की हिट फिल्मों के तत्व की नकल तो करता है, मगर वह न तो नकल कर पाने में सफल हो पाता है और न ही वह मौलिक कहानी लिख पाता है, नतीजा फिल्म चूँ चूँ का मुरब्बा बनकर रह जाती है.

भोजपुरी फिल्म लेखकों की बड़ी समस्या यह है कि ज्यादातर लेखक फिल्म लेखन के बेसिक शिल्प से सर्वथा अनभिज्ञ हैं. कहानी का मुख्य नायक कौन है, नायक का ल्क्ष्य क्या है और नायक उस लक्ष्य तक कैसे पहुँचता है, किसी भी फिल्म की कहानी के ये आवश्यक और मूल प्रश्न हैं, जिसका स्पष्ट उत्तर होने के बाद ही लेखक अपनी कहानी सही तरीके से कह सकता है.

दुख की बात यह है कि लगभग भोजपुरी फिल्मों की कहानी में ये तत्व नदारद होते हैं. इसकी मूल वजह है भोजपुरी फिल्म लेखकों का स्किल्ड न होना. चिंता की बात यह है कि निर्माता-निर्देशक भी स्किल्ड लेखक की तलाश नहीं करते. यह भारतीय फिल्म इंडस्ट्री की अजीब त्रासदी है कि फिल्मकार का ध्यान लेखन पर सबसे कम होता है, सबसे ज्यादा ध्यान स्टार कास्टिंग़ पर होता है.

भोजपुरी फिल्मों में भी यह बीमारी है. पवन सिंह आदि स्टारों को निर्माता 30 से 40 लाख रुपए तक दे देते हैं. किंतु स्क्रिप्ट लेखन पर 3 से 4 लाख खर्च करना भी उन्हें गवारा नहीं है. आम भोजपुरी लेखकों को पूरी फिल्म लिखने के लिए 50 से 75 रुपए दिए जाते हैं. नतीजा होता है, ऎसे लेखक हिन्दी फिल्मों की जैसे-तैसे नकल कर स्क्रिप्ट तैयार कर देते हैं. इसमें स्टार कलाकारों का भी भारी योगदान होता है. रही सही कसर निर्माता पूरी कर देते हैं. अब समझ लीजिए कितनी अच्छी फिल्म बनेगी !

हाल के वर्षों में भोजपुरी फिल्मों के हीरो पर सलमान खान की तरह दिखने और एक्शन करने का भूत भी खूब जोर से चढ़ा है, इसलिए साउथ की फिल्मों की तरह खूब एक्शन दृश्य होते हैं. इनमें से ज्यादातर बेमतलब और अर्थहीन होते हैं. एक्शन दृश्यों की भी एक कहानी कंसीव करनी होती है, जो कि साउथ की फिल्मों में दिखती है, मगर भोजपुरी फिल्मों में यह पूरी तरह गायब रहती है. इस फिल्म में भी यह स्थिति है, नतीजा है भारी भरकम एक्शन मनोरंजन के बजाय सरदर्द पैदा करता है. निर्देशक एक्शन में इस कदर उलझ गया है कि इमोशन के लिए दृश्य गढ़ने का उसे समय ही नहीं मिल पाया है.

फिल्म का संगीत पक्ष बेहतर है, खर्च दिखता है, लेकिन गड़बड़ पटकथा की वजह से संगीत फिल्म को मनोरंजक बनाने में सहयोग नहीं कर पाता. सूफी गीत के तौर पर बनाए दोनों गीत भी प्रभाव नहीं छोड़ पाते हैं. पीपली लाइव से प्रेरित गीत “महँगाई सौतिन भइल बिया डाइन” लिखा और गाया तो गया अच्छा है, लेकिन उसका ऑर्क्रेस्टाइजेशन गड़बड़ है, गवंई संगीत के साथ गीत प्रस्तुत होता तो ज्यादा अच्छा लगता.

पवन सिंह और विराज भट्ट दोनों बस कहने को एक्टर हैं. हीरोइन के लिए भी कुछ खास नहीं है. विलेन अवधेश मिश्रा और अजय कुमार सिन्हा ‘मिंटु’ में मिंटु ज्यादा संतुलित हैं. अच्छे अभिनेता हैं मिंटु. भावाभिव्यक्तियों पर नियंत्रण है. अवधेश स्टीरियोटाइप और लाउड हैं, जबकि दीपक सिन्हा और आनंद मोहन और माया यादव जैसे एक्टर को वेस्ट किया गया है.

 dhananjay

समीक्षकः Dhananjay Kumar is a Writer of Bhojpuri & Hindi (Films and TV Show).

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