बहुत कठिन है सहिष्णु होना श्रीमान

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indiaदरअसल अर्धसत्य और सन्दर्भ से काट कर बयान पेश करने की ‘अश्वत्थामा हतो, नरो वा किन्नरों वा’ की प्राचीन परंपरा में ही नया नमूना है, आमिर पर उठा विवाद. आमिर की आलोचना करने के पहले उनके पूरे बयान को सुनें.

मैंने भी सन्दर्भ से नोचे गए एक हिस्से को न्यूज चैनल पर पढ़ कर उनकी आलोचना की, लेकिन जब पूरा सुना तो पाया कि वे भी यही कह रहे हैं कि असहिष्णुता हमेशा रही है और असुरक्षा की भावना तो उनकी पत्नी में भी है (जो हिन्दू हैं). ये भावना सिर्फ धार्मिक कारणों से नहीं है. माहौल में है.

असहिष्णुता बढ़ नहीं रही है. हमेशा से रही है.

आरा में जब मैं स्कूल में था, वहां सैकड़ो सिख परिवार थे, सबसे संपन्न व्यापारी. उनमे कई मेरे दोस्त थे. एक था जसविंदर सिंह मोंगा, उसने अपने बेटे का नाम मेरे नाम पर गुंजन रखा था. १९८४ के दंगों के बाद लगभग सारे सिख आरा से गायब हो गए.

मेरा दोस्त जसविंदर कहाँ चला गया पता नहीं. सरदारों के बाजारों पर अब स्थानीय लोगों का कब्ज़ा है. लेकिन वह पंजाबियों वाली रौनक आरा से हमेशा के लिए चली गई. ऐसा ही पूरे बिहार में हुआ. दिल्ली में भी हुआ.

पहले सरदार यहाँ भरे हुए थे. अब कहीं नजर नहीं आते. पूरे बिहार, झारखण्ड, दिल्ली से बिजनेस समेट कर अधिकांश सरदार पंजाब या विदेश चले गए. बहुत से सरदारों ने अपनी पगड़ियाँ हटा दीं ताकि पहचान में न आयें. लेकिन आप कहते हैं असहिष्णुता नहीं है, या अब बढ़ रही है.

कश्मीर से लाखों पंडित घर बार छोड़ कर दिल्ली और दूसरे शहरों में शरणार्थियों की जिन्दगी बिता रहे हैं. लेकिन कोई असहिष्णुता नहीं है !

बिहारियों को मुंबई से राज ठाकरे के गुंडे मार कर भगा देते हैं और मराठी नहीं बोलने वालों की रोजी रोटी हराम किये हुए हैं.

अमिताभ बच्चन को बाल ठाकरे से माफ़ी मंगनी पड़ती है. लेकिन आप कहते हैं कि कोई असहिष्णुता कहाँ है?

नेल्ली में १५०० लोगों को एक दिन में काट दिया गया – वह तो एक आइसोलेटेड घटना थी न?

बिहार के कई शहरों में बंगालियों की संपत्ति पर लोकल गुंडों से कब्ज़ा कर लिया और हजारो बंगाली परिवार बिहार छोड़ कर चले गए.

भूराबाल साफ करो – का मतलब क्या था? क्या कभी ऐसी आशंकाएं थीं किन्ही वर्गों में? और क्या वे आशंकाएं और डर फिर से नही लौटी हैं? कोई सर्वे कर सकेंगे आप कि कथित सवर्ण और दलित महादलित जातियों के लोग कितनी बड़ी संख्या में बिहार छोड़ कर बाहर पलायन कर रहे हैं? कारण असहिष्णुता नही है?

असहिष्णुता कब नहीं रही हमारे अन्दर?

क्या यह भारत की वह महान सहिष्णुता ही थी जिसके चलते देश का बंटवारा हुआ ? विवेकानंद को फिर से पढ़िए जब वो हिन्दू जातियों के बीच सदियों पुरानी आपसी असहिष्णुता पर बार बार अपना गुस्सा प्रकट करते हैं. लेकिन आप उन्हें पढ़ते नहीं सिर्फ उन पर माल्यार्पण करते हैं.

‘वैष्णव जन तो तेण कहिये जे पीर पराई जाणे रे’ लेकिन ये कहने की जरुरत क्यों पड़ती है ? क्योंकि आप पराई पीर नही जानते. जैन और बौद्ध धर्मों का जन्म भारतीयों की हिंसक असहिष्णुता की प्रतिक्रिया ही था.

gunjan

…….वरिष्ठ पत्रकार गुंजन सिन्हा अपने फेसबुक वाल पर

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