बर्बाद अखबारों में शुमार है स्वतंत्र भारत और पायनियर

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नहीं बताइए कि मनरेगा से भी कम मज़दूरी में, एक रिक्शा वाले से भी कम मेहनताने में काम कर रहे मीडिया-जनों की वायस आखिर है कोई उठाने वाला भला? मणिसाना की सिफ़ारिशें तक लागू करवा पाने में सरकारी मशीनरी का तेल निकल जाता है और लागू नहीं हो पाता। किसानों के हित में भी न्यूनतम मूल्य सरकार निर्धारित करती है उन की उपज के लिए। पर मीडियाजनों के लिए न्यूनतम मज़दूरी भी नहीं तय कर पाती यह सरकार या व्यवस्था। और ये मालिकान। मीडिया के नाम पर समाज के लिए जो लाक्षागृह रोज ही क्या हर क्षण बनाने में यह मीडिया अनवरत युद्धरत हैं। जो लगे हुए हैं फ़र्जी और अंधविश्वासी खबरों की खेप-दर-खेप ले कर, सांप और कुत्तों का व्याह आदि दिखा कर, अपराधों का नाट्य-रुपांतरण दिखा कर, अब यह देखिए और वह देखिए चिल्ला-चिल्ला कर, चीख-चीख कर, गोया दर्शक अंधे और बहरे हों, दो लाइन की खबर दो घंटे में किसी मदारी की तरह मजमा बांध कर खबरें दिखाने का जो टोटका इज़ाद किया है न और इस की आड़ में सरोकार की खबरों को मार दिया है, भ्रष्टाचार की खबरों को दफ़न किया है न, तिस पर फ़र्जी स्टिंग की खेती भी हरी की है न, इन सब अपराधों की ज़मानत इस मीडिया को कोई  समाज कैसे और क्यों देगा?  मीडिया का भी आखिर एक पर्यावरण होता है। क्या इस नष्ट होते जा रहे पर्यावरण को भी बचाने की ज़रुरत नहीं है? है और बिलकुल है। कारपोरेट और पूंजीवादी पत्रकारिता के खिलाफ़ पूरी ताकत से आज की तारीख में खडा होने की ज़रुरत है। प्रतिरोध की जो पत्रकारिता है उसे फिर से ज़िंदा करने की ज़रुरत है, डायल्यूट करने की नहीं।

अब तो हालत यहां तक आ गई है कि अखबार मालिक और उस का सो काल्ड प्रबंधन संपादकों  और संवाददाताओं से अब खबर नहीं बिजनेस डिसकस करते हैं। सब को बिजनेस टारगेट देते हैं। मतलब विज्ञापन का टारगेट। अजीब गोरखधंधा है। विज्ञापन के नाम पर सरकारी खजाना लूट लेने की जैसे होड मची हुई है अखबारों और चैनलों के बीच। अखबार अब चुनावों में ही नहीं बाकी दिनों में भी खबरों का रेट कार्ड छाप कर खबरें वसूल रहे हैं। खबरों के नाम पर पैसे वसूल रहे हैं। बदनाम बेचारे छोटे-मोटे संवाददाता हो रहे हैं। चैनलों तक में यही हाल है। व्यूरो नीलाम हो रहे हैं। वेतन तो नहीं ही मिलता सेक्यूरिटी मनी लाखों में जमा होती है। तब परिचय पत्र जारी होता है। मौखिक संदेश होता है कि खुद भी खाओ और हमें भी खिलाओ। और खा पी कर मूस की तरह मुटा कर यह अखबार या चैनल कब फ़रार हो जाएं कोई नहीं जानता। तो पत्रकारिता ऐसे हो रही है। संवाद सूत्रों की हालत और पतली है। दलितों और बंधुआ मज़दूरों से भी ज़्यादा शोषण इन का इतनी तरह से होता है कि बयान करना मुश्किल है। यह सिक्योरिटी मनी भी जमा करने की हैसियत में नहीं होते तो इन्हें परिचय-पत्र भी नहीं मिलता। कोई विवादास्पद स्थिति आ जाती है तो संबंधित संस्थान पल्ला झाड लेता है और बता देता है कि उस से उस का कोई मतलब नहीं है। और वह फर्जी पत्रकार घोषित हो जाता है। अगर हाथ पांव मज़बूत नहीं हैं तो हवालात और जेल भी हो जाती है। इन दिनों ऐसी खबरों की भरमार है समूचे देश में। राजेश विद्रोही का एक शेर है कि, ‘बहुत महीन है अखबार का मुलाजिम भी/ खुद खबर है पर दूसरों की लिखता है।’

दरअसल पत्रकारिता के प्रोडक्ट में तब्दील होते जाने की यह यातना है। यह सब जो जल्दी नहीं रोका गया तो जानिए कि पानी नहीं मिलेगा। इस पतन को पाताल का पता भी नहीं मिलेगा। वास्तव में भड़ुआगिरी वाली पत्रकारिता की नींव इमरजेंसी में ही पड़ गई थी। बहुत कम कुलदीप नैय्यर तब खड़े हो पाए थे। पर सोचिए कि अगर रामनाथ गोयनका न चाहते तो कुलदीप नैय्यर क्या कर लेते? स्पष्ट है कि अगर अखबार या चैनल मालिक न चाहे तो सारी अभिव्यक्ति और उसके खतरे किसी पटवारी के खसरे खतौनी में बिला जाते हैं। जब जनता पार्टी की सरकार आई तो तबके सूचना प्रसारण मंत्री आडवाणी ने बयान दिया था कि इंदिरा गांधी ने इमरजेंसी में पत्रकारों से बैठने को कहा, पर वह तो लेट गए! पर दिक्कत यह थी कि जनता पार्टी सरकार भी पत्रकारों को लिटाने से बाज़ नहीं आई।

टाइम्स आफ़ इंडिया की एक कहानी की पत्रिका थी ‘सारिका’। कमलेश्वर जी उस के संपादक थे। सारिका कहानी की पत्रिका थी, राजनीति से उस का कोई सरोकार नहीं था। पर कहानियों का चूंकि समाज से सरोकार होता है और समाज बिना राजनीति के चलता नहीं सो, कमलेश्वर की ‘सारिका’ के भी सरोकार में तब राजनीति समा गई। इस राजनीति की कोख में भी कारण एक कहानी बनी। कहानी थी आलमशाह खान की ‘किराए की कोख’। डा. सुब्रहमण्यम स्वामी ने इस का विरोध किया कि यह ‘किराए की कोख’ देने वाली औरत हिदू ही क्यों है? इस के पहले भी डा. स्वामी और कमलेश्वर की भिड़ंत हो चुकी थी एक बार। उपन्यास ‘काली आंधी’ को ले कर। स्वामी ने कमलेश्वर को बधाई दी थी कि ‘काली आंधी’ में उन्हों ने इंदिरा गांधी का बहुत अच्छा चरित्र चित्रण किया है। कमलेश्वर ने उन्हें सूचित किया कि उन के उपन्यास में वह जिसे इंदिरा गांधी समझ रहे हैं, दरअसल वह विजयाराजे सिंधिया हैं। स्वामी भड़क गए थे। फिर बात ‘किराए की कोख’ पर उलझी। बात बढ़ती गई। जनता पार्टी की सरकार आ गई। टकराव बढ़ता गया। मैनेजमेंट का दबाव भी। कमलेश्वर ने ‘सारिका’ के एक संपादकीय में साफ़ लिखा कि यह देश किसी एक मोरार जी देसाई, किसी एक चरण सिंह, किसी एक जगजीवन राम भर का नहीं है। सारिका छप गई। पर यह अंक बाज़ार में नहीं आया। सारिका बंबई से दिल्ली आ गई। बाद में कमलेश्वर की सारिका से भी विदाई हो गई। यह एक लंबी कथा है। पर कमलेश्वर तब नहीं झुके। यह भी एक तथ्य है।

कमलेश्वर को यह संपादकीय पढ़ाने के लिए एक नई पत्रिका निकालनी पड़ी।कथा-यात्रा। खैर, बात आगे बढ़ी। बाद के दिनों में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई। चुनाव में पूरे देश में इंदिरा लहर ही नहीं, आंधी चली। पर तब के प्रधानमंत्री राजीव गांधी और उन के मैनेजरों यथा अरूण नेहरू जैसों को फिर भी यकीन नहीं था अमेठी की जनता पर। बूथ कैपचरिंग पर यकीन था। करवाया भी। यह चुनाव कवर करने लखनऊ से भी कुछ पत्रकार गए थे। आज से अजय कुमार, जागरण से वीरेंद्र सक्सेना और पायनियर से विजय शर्मा। बूथ कैपचरिंग की रिपोर्ट करने के चक्कर में सभी पिटे। फ़ोटोग्राफ़र के कैमरे से रील निकाल ली गई। वगैरह-वगैरह। जो-जो होता है ऐसे मौकों पर वह सब हुआ। हालांकि फ़ोटोग्राफ़र ने पहले ही तड़ लिया था कि रील निकाली जा सकती है। कैमरा छीना जा सकता है। सो वह फ़ोटो खींचते जाते थे और रील झाड़ियों में फेंकते जाते थे। और अंतत: हुआ वही। पिटाई-सिटाई के बाद उन्हों ने रील बटोर लिया। आए सभी लखनऊ। पिटने का एहसास बड़ी खबर पा लेने के गुमान में धुल गया था। पर जब अपने-अपने आफ़िस पहुंचे ये पत्रकार सीना फ़ुलाए तो वहां भी उन की धुलाई हो गई। डांटा गया कि आप लोग वहां खबर कवर करने गए थे कि झगड़ा करने? असल में तब तक सभी अखबारों के दफ़्तर में अरूण नेहरू का धमकी भरा फ़ोन आ चुका था। सभी लोगों को कहा गया कि बूथ कैपचरिंग भूल जाइए, प्लेन-सी खबर लिखिए। ‘आज’ अखबार के अजय कुमार तब लगभग रोते हुए बताते थे कि अमेठी में पिटने का बिलकुल मलाल नहीं था। दिल में तसल्ली थी कि पिटे तो क्या, खबर तो है! पर जब दफ़्तर में भी आ कर डांट खानी पड़ी तो हम टूट गए।

बाद में जनसत्ता के तब के संवाददाता जयप्रकाश शाही को उस फ़ोटोग्राफ़र ने बताया कि उस के पास फ़ोटो है। शाही ने फ़ोटो ली और खबर लिखी। छपी भी तब जनसत्ता में। पर बाद में वह फ़ोटोग्राफ़र, साफ़ कहूं तो बिक गए। और बता दिया कि वह फ़ोटो फ़र्ज़ी है और ऐसी कोई फ़ोटो उन्हों ने नहीं खींची। खैर।

बोफ़ोर्स की याद है आप सब को? तब जिस तरह कुछ अखबार मालिकों ने लगभग पार्टी बंदी कर अखबारों का इस्तेमाल किया, यह भी याद है ना? फिर तो अखबारों को हथियार बना लिया गया। जब जिस की सत्ता तब तिस के अखबार।

2 जून 1995 को लखनऊ में मुलायम सिंह ने सुबह-सुबह जिस तरह अपने गुंडों को मायावती पर हमले के लिए भेजा था, मुख्यमंत्री रहते हुए भी, वह तो अश्लील था ही, अपने पत्रकारों ने उस से भी ज़्यादा अश्लीलता बरती। पी.टी.आई ने इतनी बड़ी घटना को सिर्फ़ दो टेक में निपटा दिया तो टाइम्स आफ़ इंडिया ने शार्ट डी.सी. अंडरप्ले कर के दिया। बाद में इस के कारणों की पड़ताल की तब के जनसत्ता के संवाददाता हेमंत शर्मा ने। तो पाया कि ऐसा इस लिए हुआ क्यों कि पी.टी.आई के व्यूरो चीफ़ खान और टाइम्स के तत्कालीन रेज़ीडेंट एडीटर अंबिकानंद सहाय ने मुलायम शासनकाल में विवेकाधीन कोष से लाखों रुपए खाए हुए थे। तमाम और पत्रकारों ने भी लाखों रुपए खाए थे। और वो जो कहते हैं कि राजा का बाजा बजा! तो भैय्या लोगों ने राजा का बाजा बजाया। आज भी बजा रहे हैं। खैर, हेमंत शर्मा ने जब इस बाबत खबर लिखी तो टाइम्स आफ़ इंडिया के तत्कालीन रेज़ीडेंट एडीटर अंबिकानंद सहाय ने हेमंत को नौकरी ले लेने की धमकी दी।

पर न हेमंत बदले न बाजा बजाने वाले। आज भी बजा रहे हैं। बस राजा बदलते रहते है, भय्या लोग बाजा बजाते रहते हैं।
सो राजा लोगों का दिमाग खराब हो जाता है। अब जैसे अखबार या चैनल प्रोड्क्ट में तब्दील हैं, वैसे ही अपने नेता भी राजा में तब्दील हैं। सामंती आचरण में लथ-पथ हैं। वो चाहे ममता बनर्जी ही क्यों न हों? ममता बनर्जी को कोई यह बताने वाला नहीं है कि सिर्फ़ हवाई चप्पल और सूती साड़ी पहनने या कुछ कविताएं या लेख लिखने, कुछ इंटेलेक्चुअल्स के साथ बैठ लेने भर से या गरीबों की बात या मुद्दे भर उठा लेने से कोई प्रजातांत्रिक नहीं हो जाता, जब तक वह व्यवहार में भी न दिखे। नहीं तो वज़ह क्या है कि दबे कुचलों की बात करने वाले तमाम नेता आज सरेआम तानाशाही और सामंती रौबदाब में आकंठ डूबते-उतराते दिखते हैं। वह चाहे ममता बनर्जी हों, मायावती हों, जयललिता हों, करूणानिधि हों, लालू या मुलायम, पासवान हों। शालीनता या शिष्टता से जैसे इन सबका कोई सरोकार ही नहीं दीखता!

तो शायद इसलिए कि भडुआगिरी में न्यस्त हमारी पत्रकारिता राजा का बाजा बजाने में न्यस्त भी है और ध्वस्त भी। हमारी एक समस्या यह भी है कि हम पैकेजिंग में सजी दुकानों में पत्रकारिता नाम के आदर्श का खिलौना ढूंढ रहे हैं। जब कि हम जानते हैं कि यह नहीं होना है अब किसी भी सूरत में। पर हमारी ज़िद है कि – मैया मैं तो चंद्र खिलौना लैहों। किसी बंधु को मिले यह चंद्र खिलौना तो भैय्या हमें भी बताना। दूध भात लेकर आ जाऊंगा।

 इस आंच में पत्रकारों का जीते जी मर जाना, कैरियर का मर जाना, इस की यातना, इस की मार को हम में से बहुतेरे जानते हैं। कह नहीं पाते, कहते नहीं। दोनों बातें हैं। लेकिन हैं कौन लोग जो यह यातना की पोटली हमें थमा देते हैं कि लो और भुगतो। क्या सिर्फ़ अखबार मालिक और पूंजीपति? जी नहीं। यह दीमक हमारे भीतर से ही निकलते हैं। ये कुकुरमुत्ते हमारे ही घूरे से निकलते हैं और गुलाब बन कर इतराने लगते हैं। और अचानक एक दिन ये इतने बडे़ हो जाते हैं कि हमारे दैनंदिन जीवन में हमारे लिए रश्क का सबब बन बैठते हैं। हमारे भाग्य विधाता बन जाते हैं।

ज़्यादा नहीं एक दशक पहले अखबारों में डी.टी.पी. आपरेटर हुआ करते थे। कहां गए अब? अब सब-एडीटर कंपोज भी कर रहा है, पेज़ भी बना रहा है। अखबारों से भाषा का स्वाद बिसर गया तो क्या हुआ? गलतियां हो रही हैं, खबर कहीं से कहीं कट पेस्ट हुई जा रही है तो पूछता कौन है? अखबार मालिक का तो पैसा बच गया न ! चार आदमी के काम को एक आदमी कर रहा है। और क्या चाहिए? अखबार नष्ट हो रहा है तो क्या हुआ?

अखबार में विज्ञापन कम हो रहा था, तो यह ऐडवोटोरियल की बुद्धि अखबार मालिकों को किसने दी? फिर खुल्लमखुल्ला पैसे ले कर खबरें छापने का पैकेज भी किस ने बताया अखबार मालिकों को? मंदी नहीं थी अखबारों में फिर भी मंदी के नाम पर आप के पैसे कम करने, और जो आप भन्नाएं तो आप को ट्रांसफ़र करने या निकाल देने की बुद्धि भी किसने दी अखबार मालिकों को?

अरे भाई, अभी भी नहीं समझे आप? आप जान भी नहीं पाए? अच्छा जब हमारी सेलरी लाखों में पहुंची, लग्ज़री कारों में हम चलने लगे, आकाशीय उड़ानें भरने लगे बातों में भी और यात्राओं में भी। और ये देखिए आप तो हमारे पैर भी छूने लगे, हमारे तलवे भी चाटने लगे और फिर भी नहीं जान पाए? अभी भी नहीं जान पाए? अरे मेरे भाइयों, हमी ने दी। ये तमाम संवाद सूत्रों की फ़ौज़ भी हमीं ने खड़ी की। अब हम भी क्या करें, हमारे ऊपर भी प्रबंधन का दबाव था, है ही, लगातार। तो भैया हम बन गए बडे़ वाले अल्सेसियन और आप को बना दिया गलियों वाला कुता। बंधुआ कुत्ता। जो भूंक भी नहीं सकता। भूख लगने पर। खुद बधिया बने तो आप को भी बंधुआ बनाया।

अब तो स्वतंत्र भारत और पायनियर बरबाद अखबारों में शुमार हैं। और कि अलग-अलग हैं। पहले के दिनों में पायनियर लिमिटेड के अखबार थे ये दोनों। जयपुरिया परिवार का स्वामित्व था। और कि कहने में अच्छा लगता है कि तब यह दोनों अखबार उत्तर प्रदेश के सबसे बडे़ अखबार के रूप मे शुमार थे। हर लिहाज़ से। सर्कुलेशन में तो थे ही, बेस्ट पे मास्टर भी थे। पालेकर, बछावत लागू थे। बिना किसी इफ़-बट के। लखनऊ और बनारस से दोनों अखबार छपते थे। बाद में मुरादाबाद और कानपुर से भी छपे।

तो कानपुर स्वतंत्र भारत में सत्यप्रकाश त्रिपाठी आए। कानपुर के ही रहने वाले थे। कानपुर जागरण से जनसत्ता, दिल्ली गए थे। वाया जनसत्ता स्वतंत्र भारत कानपुर आए रेज़ीडेंट एडीटर बन कर। लखनऊ और बनारस में वेज़बोर्ड के हिसाब से सब को वेतन मिलता था। पर सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने यहां नई कंपनी बनाने की तज़वीज़ दी जयपुरिया को। ज्ञानोदय प्रकाशन। और सहयोगियों को कंसोलिडेटेड वेतन पर रखा। किसी को वेतनमान नहीं। तब पालेकर का ज़माना था। तो जितना लखनऊ में एक सब एडीटर को मिलता था लगभग उसी के आस-पास वहां भी मिला। पर पी.एफ़, ग्रेच्युटी आदि सुविधाओं से वंचित। जल्दी ही बछावत लागू हो गया। अब कानपुर के सहयोगियों का हक मारा गया। बेचारे बहुत पीछे रह गए। औने-पौने में। खुद जयपुरिया को यह बुद्धि देने वाले सत्यप्रकाश त्रिपाठी भी लखनऊ के चीफ़ सब से भी कम वेतन पर हो गए। साथ में वह जनसत्ता से अमित प्रकाश सिंह को भी ले आए थे समाचार संपादक बना कर। सब से पहले उन का ही मोहभंग हुआ। वह जनसत्ता से अपना वेतन जोड़ते, नफ़ा नुकसान जोड़ते और सत्यप्रकाश त्रिपाठी की ऐसी तैसी करते। वह जल्दी ही वापस जनसत्ता चले गए। कुछ और साथी भी इधर उधर हो गए। बाद के दिनों में स्वतंत्र भारत पर थापर ग्रुप का स्वामित्व हो गया। अंतत: सत्यप्रकाश त्रिपाठी को भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। हालांकि उन्हों ने प्रबंधन के आगे लेटने की इक्सरसाइज़ भी बहुत की। पर बात बनी नहीं।

जाते समय एक बार वह लखनऊ आए और वह भी अपना पी.एफ़ ग्रेच्युटी वगैरह अमित प्रकाश सिंह की तरह जनसत्ता से तुलनात्मक ढंग से जोड़ने लगे और कहने लगे कि मेरा तो इतना नुकसान हो गया। जब यह बात उन्हों ने कई बार दुहराई तो मुझ से रहा नहीं गया। उन से पूछा कि यह बताइए कि जयपुरिया को यह बुद्धि किस ने दी थी? और फिर आप सिर्फ़ अपने को ही क्यों जोड़ रहे हैं? अपने उन साथियों को क्यों भूल जा रहे है? आप ने तो संपादक बनने की साध पूरी कर ली, पर वह सब बिचारे? उन का क्या कुसूर था? उन सब को जिन को आप ने छला? और तो और एक गलत परंपरा की शुरुआत कर दी सो अलग !
वह चुप रह गए।

सत्यप्रकाश त्रिपाठी का अंतर्विरोध देखिए कि वह कई बार प्रभाष जोशी बनने का स्वांग करते। जोशी जी की ही तरह लिखने की कोशिश करते। फ्रंट पेज़ एडीटॊरियल लिखने का जैसे उन्हें मीनिया सा था। भले ही कानपुर रेलवे स्टेशन की गंदगी पर वह लिख रहे हों पर जोशी जी की तरह उस में ‘अपन’ शब्द ज़रूर ठोंक देते। जब कि कानपुर का ‘अपन’ शब्द से कोई लेना-देना नहीं था। वह तो जोशी जी के मध्य प्रदेश से आता है। उन के इस फ़्रंट पेज़ एडीटोरियल मीनिया पर लखनऊ के साक्षर संपादक राजनाथ सिंह जो तब लायजनिंग की काबिलियत पर संपादक बनवाए गए थे, एक जातिवादी मुख्यमंत्री की सिफ़ारिश पर, अक्सर उन्हें नोटिस भेज देते थे। अंतत: वह एडीटोरियल की जगह बाटम लिखने लगे। खैर, जोशी जी बनने का मीनिया पालने वाले सत्यप्रकाश त्रिपाठी जोशी जी की उदारता नहीं सीख पाए, न उन के जैसा कद बना पाए| पर हां, जयपुरिया की आंखों में चढ़ने के लिए अपने साथियों का अहित ज़रूर कर गए। अपना तो कर ही गए। जोशी जी ने गोयनका की आंखों में चढ़ने के लिए सहयोगियों का कभी वेतन नहीं कम किया। हां, एक बार अपना बढ़ा हुआ वेतन, सुनता हूं कि ज़रूर लेने से इंकार किया।
यहीं कमलेश्वर भी याद आ रहे हैं। एक संस्थान में एक महाप्रबंधक ने उन से कुछ सहयोगियों को हटाने के लिए कहा। पर कमलेश्वर जी टाल गए। पर जब दुबारा उस महाप्रबंधक ने सहयोगियों को फिर से हटाने के लिए कहा तो कमलेश्वर जी ने खुद इस्तीफ़ा दे दिया। पर सहयोगियों पर आंच नहीं आने दी। पर बाद में स्थितियां बद से बदतर हो गईं। रक्षक ही भक्षक बनने लगे।
पत्रकारों के एक मसीहा हुए हैं सुरेंद्र प्रताप सिंह। रविवार के उन के कार्यकाल पर तो उन्हें जितना सलाम किया जाए, कम है। पर नवभारत टाइम्स में उन्हों ने क्या-क्या किया? विद्यानिवास मिश्र जैसे विद्वान को उन्हों ने सहयोगियों को भड़का-भड़का कर गालियां दिलवाईं। उन को वह प्रधान संपादक स्वीकार ही नहीं पाए। चलिए आगे सुनिए। समीर जैन को खुश करने के लिए उसी नवभारत टाइम्स में इन्हीं सुरेंद्र प्रताप सिंह ने पंद्रह सौ से दो हज़ार रुपए में स्ट्रिंगर रखे, खबर लिखने के लिए। तब जब वहां विशेष संवाददाता को उस समय दो हज़ार रुपए कनवेंस एलाऊंस मिलता था। वरिष्ठों की खबरें काट-काट कर फेंक देते, उन्हें अपमानित करते, इन स्ट्रिंगर्स की खबर उछाल कर छापते। इन्हीं उठापटक और राजनीति में नवभारत टाइम्स लखनऊ बंद हो गया। और भी ऐसे कई काम इन एस.पी. ने किए जो सहयोगियों के हित में नहीं थे। लेकिन वह लगातार करते रहे। और अंतत: जब अपने पर बन आई तो उसी टाइम्स प्रबंधन के खिलाफ संसद में सवाल उठवाने लग गए। यह वही सुरेंद्र प्रताप सिंह थे जिन का प्रताप उन दिनों इतना था कि वह अकसर दिल्ली से लखनऊ सिर्फ़ शराब पीने आते थे राजकीय विमान से। रात नौ बजे आते और बारह बजे तक लौट भी जाते। 45 मिनट की फ़्लाइट होती थी। और तब के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से दोस्ती भी निभ जाती थी। वे दिन मंडल की पैरोकारी के दिन थे उन के। सो चांदी कट रही थी। और गरीबों की बात भी हो रही थी। वाया राजकीय विमान और शराब। और कि देखिए न, उन के चेले भी आजकल क्या-क्या नहीं कर रहे हैं?

खैर, चाहे पत्रकारों के मसीहा एस.पी. हों या छुट्भैय्या सत्यप्रकाश त्रिपाठी हों, इन प्रजातियों की अखबार मालिकानों को सहयोगियों के हितों के खिलाफ बुद्धि देने वालों की संख्या में बेतहाशा वृद्धि हुई है। अनुपात वही यहां भी है जो देश में गरीबों और अमीरों के बीच है। जैसे देश के ज़्यादतर लोग बीस रुपए भी नहीं कमा पाते रोज और खरबपतियों की संख्या बढती जाती है। ठीक वैसे ही संवाद सूत्रों की संख्या बढ़ती जाती है और दूसरी तरफ अपने अल्सेसियंस की भी। नहीं समझे? अरे बुद्धि देने वालों की भाई। ….. दयानंद पाण्येय

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