बर्खास्त रिपोर्टर को लेकर खामोश क्यों है पत्रकार संघ और परिषद

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मि. सुभाष चंद्रा गोयल जी न्यूज चैनल के मालिक हैं। राज्य सभा के भाजपा सदस्य भी हैं। इंक गेट के कारण चर्चा में रहे। उनकी कंपनी ने सरकार से कोई ठेका भी ले रखा है।

अब हिसार में उनके चैनल के रिपोर्टर महेंद्र सिंह ने मुख्यमंत्री मनोहर लाल से मामूली सा सवाल क्या पूछ लिया कि मनोहर गुस्से से लाल हो गए। सवाल था कि आपने कहा कि नोटों के लिए लाइन में लगे लोग धंधेबाज हैं। एक सवाल यह था कि आप सतलुज युमना नहर के लिए राष्ट्रपति से तो मिलते हो,  प्रधानमंत्री से क्यों नहीं।

वेशक सवाल जायज था। राष्ट्रपति तो ऑर्नामेंटल हेड हैं। प्रधानमंत्री से मिलें और वे कोई वायदा करें तो पंजाब चुनाव में नुकसान। वायदा न करें तो तो खट्टर की किरकिरी। इसलिए सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे। राष्ट्रपति से मिलकर खानापूरी कर लो।

सवाल पूछने वाले बिचारे रिपोर्टर को अड़तालीस घंटे में ही इस्तीफ़ा देने का तुगलकी फरमान जारी कर दिया गया। मामूली से सवाल पर खट्टर साहिब भड़क गए। यदि कोई पत्रकार उनसे गुरुग्राम में हो रहे अरबों रुपया के घपले के बारे पूछेगा तो न जाने वे क्या करेंगे।

सीएम खट्टर को मीडिया सलाहकारों ने उन्हें गलत सलाह दी है। यह तो ठीक है कि मीडिया मैनेज्ड है लेकिन, अभी सब ख़त्म नहीं हुआ है। हरियाणा में नेताओं के अखबार और चैनल खतरे की घंटी हैं। बिटौड़ा फोड़ेंगे तो उसमें उपले ही निकलेंगे। उपलों से तो चूल्हा जलता है लेकिन इन अखबारों के मालिक तो उपलों से भी गए गुजरे हैं।

रिपोर्ट महेंद्र से पहले स्वतंत्र सक्सेना भी नेता और अखबार मालिक का शिकार हो चुके हैं। जनाब पंडित जी के अख़बार में सम्पादक थे। अभय चौटाला की प्रेस कांफ्रेंस जिसमें उसने तत्कालीन मुख्यमंत्री  भूपिंदर हूडा पर आरोप लगाए थे, छाप दिया। अब पंडित जी को हूडा ने आंखे दिखाई। नतीजा सबके सामने था। हूडा का कुम्हारी यानि चौटाला पर तो बस नहीं चला है, गधे के कान ऐंठ दिए।

प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया को महेंद्र सिंह की नौकरी से बर्खास्तगी के मामले का खुद संज्ञान लेना चाहिए। एडिटर्स गिल्ड को जाँच करनी चाहिए। पत्रकार यूनियंस को चंद्रा को लानत भेजते हुए चिठ्ठी लिखनी चाहिए। प्रभाष जोशी, जितेंद्र बजाज और ओम थानवी के मार्गदर्शन में मैंने जनसत्ता में काम किया है। देवीलाल, भजन लाल और बंसी लाल ने मेरी शिकायतें की लेकिन इन माननीय संपादकों ने कभी मुझे काम करने से नहीं रोका। अब ऐसे सम्पादक कहां रहे। (पवन कुमार बंसल, वरिष्ठ पत्रकार)

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