बदलाव की आंधी में उड़े या खुद को नहीं आंक पाये सुदेश ?

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sudesh silliराज़नामा.कॉम (मुकेश भारतीय)।  विकास पर बदलाव भारी पड़ा या राजनीति पर कूटनीति। यह सबाल झामुमो प्रत्याशी अमित कुमार के हाथों उनके पराजय के साथ शुरु हो गया है। क्योंकि सिल्ली के वोटरों के फैसले ने सबको चौंका कर रख दिया है। अमित को सुदेश के खिलाफ जनता ने एकतरफा जीत दी है।

सुदेश लगातार तीन बार से चुनाव जीत रहे थे। 2009 के विधानसभा चुनाव में उन्हें अमित ने कड़ी टक्कर दी थी। झारखंड गठन के बाद सुदेश महतो कुछ समय को छोड़ लगातार सरकार में मंत्री रहे।

मंत्री होने का लाभ उठाते हुए उन्होंने क्षेत्र का काफी विकास किया। विकास के मामले में सिल्ली को अव्वल माना जाता है। वे जनता से भी जुड़े रहे। लेकिन सिल्ली की जनता इन सब चीजों को दरकिनार कर वह नए चेहरे को एक अवसर देते हुये अमित कुमार पर भरोसा जताना अधिक बेहतर समझा ।

हालांकि, 9 दिसंबर को संपन्न हुए चुनाव के बाद से ही यह चर्चा तेज थी कि इस बार वोटिंग सुदेश महतो के पक्ष में अच्छी नहीं है। कई लोग उसी दिन से हार की कयास लगा  रहे थे। उनकी हार-जीत पर सट्टेबाजी तक शुरु हो चुके थे।

silliइसके कई कारण भी थे। सुदेश महतो के लिये लोकसभा चुनाव लड़ना भी राजनीतिक दृष्टिकोण काफी महंगा पड़ा । कहते हैं कि उनके खिलाफ गोलबंदी की शुरूआत यहीं से शुरू हो गई।

तब सिल्ली के वोटरों के बीच भाजपा सांसद रामटहल चौधरी को लेकर गलत संदेश गया। लोग यहां तक कहने लगे थे कि सुदेश महतो ने रामटहल चौधरी के चिरप्रतिद्वंदी कांग्रेस प्रत्याशी सुबोधकांत सहाय की राह आसान करने के लिये चुनाव मैदान में उतरे थे।

हालांकि, सुदेश महतो का कहना रहा कि दो दशक से रांची लोकसभा सीट की नुमांदगी करने वाले दोनों परस्पर विरोधी द्वय का विकल्प बनना चाहते थे। क्योकिं सहाय हों या चौधरी, दोनों ने यहां विकास के नाम कोई काम नहीं किये।

इसके पूर्व सुदेश महतो परोक्ष-अपरोक्ष रुप से रामटहल चौधरी के साथ एक दूसरे की मदद करते रहे थे।

दूसरी बात, सुदेश महतो ने अमित महतो की उम्मीदवारी को इस बार विधानसभा चुनाव में गंभीरता से नहीं लिया। भाजपा के साथ गठबंधन होने के बाद वह अपनी जीत को लेकर काफी ओवर कांडिफेंस में थे।

शायद इसलिये कि अमित महतो ऐन लोकसभा चुनाव के वक्त भाजपा में शामिल हुय़े थे और रामटहल चौधरी के पक्ष में जम कर काम किये। रामटहल चौधरी ने यह भरोसा दिलाया था कि उन्हें टिकट न मिलने की दशा में वे किसी हद तक जा सकते हैं।

इधर विधानसभा चुनाव के ठीक पहले सुदेश ने आजसू का भाजपा के साथ गठबंधन कर अमित के टिकट पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया। 

श्री चौधरी ने भाजपा-आजसू गठबंधन का मुखर विरोध करते हुये यहां तक कह दिया था कि गठबंधन के खिलाफ वे सड़क पर उतरेगें। यह दीगर बात है कि वह सब उनकी गीदड़ भभकी ही रह गया और पार्टी हाईकमान के निर्देश पर अगले दिन से चुप्पी तो ठान ली।  लेकिन साथ हीं सुदेश महतो के खिलाफ असहयोग व भीतरघात की सफल रणनीति के  हथियार की धार बढ़ाने में जुट गये।

amit mahtoयही कारण है कि इस विधानसभा चुनाव में उन्होंने पार्टी लाइन से इतर सुदेश महतो को हराने और झामुमो प्रत्याशी अमित महतो को जिताने में अपनी पूरी ताकत झोंक दी।    

यह सब जानते हैं कि सुदेश महतो ने अपनी पार्टी आजसू का चुनावी गठबंधन भाजपा की शर्तो पर किया था। उन्होंने नवीन जायसवाल वाली सिटिंग हटिया सीट तक छोड़ दी। अमित कुमार  भी टिकट की लालसा में ही भाजपा में शामिल हुए थे। जब उन्हें भाजपा से टिकट न मिलने की आशंका प्रबल दिखी तो वो पुनः झामुमो का दामन थाम कर मैदान में उतरे और जीतने में कामयाब रहे।

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