बढ़ी एफडीआई से प्रिंट मालिक मायूस, वहीं न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स गदगद

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media fdiसरकार ने न्‍यूज एवं करेंट अफेयर चैनल्‍स (news and current affair channels), डीटीएच (DTH) और केबल ऑपरेटर्स (Cable Operators) में प्रत्‍यक्ष विदेशी निवेश (foreign direct investment) की सीमा बढ़ा दी है।

इसके तहत सरकार ने 15 सेक्‍टरों में एफडीआई के नियमों को आसान बना दिया है और डीटीएच व केबल नेटवर्क्‍स (MSOs and LCOs) में 100 प्रतिशत एफडीआई की अनुमति प्रदान कर दी है।

इसके अलावा न्‍यूज एवं करेंट अफेयर्स टीवी चैनल्‍स में एफडीआई की सीमा 26 प्रतिशत से बढ़ाकर 49 प्रतिशत कर दी है।

इस घोषणा ने जहां न्‍यूज ब्रॉडकास्‍टर्स को खुश कर दिया है वहीं प्रिंट मालिकों को मायूसी हाथ लगी है। हालांकि प्रिंट के बड़े खिलाड़ी एफडीआई के पक्ष में थे, इसके बावजूद इस क्षेत्र को छोड़ दिया गया।

द हिन्‍दू (The Hindu) के सीईओ और एमडी राजीव लोचन ने कहा, ‘मुझे लगता है कि न्‍यूज मीडिया संगठनों में ज्‍यादा निवेश की जरूरत है। हमें यह जानने की जरूरत है कि विदेशी निवेश इसमें कितना होगा। हालांकि पिछले दस-15 सालों में भारत में काफी विदेशी निवेश हुआ है और विदेशी निवेश से काफी फायदा भी हुआ है।

उदाहरण के लिए- ऑटो, इंश्‍योरेंस और कुछ अन्‍य सेक्‍टरों में इसका प्रभाव दिखाई देता है। सच्‍चाई यह है कि न्‍यूज मीडिया का क्षेत्र लोगों को जागरूक करना है न कि इससे पैसा कमाना। हमें तेजी से आगे बढ़ने के लिए काफी सावधानी बरतने की जरूरत है। इसके लिए काफी सजग और व्‍याव‍हारिक संतुलन की आवश्‍यकता है।’

सरकार के इस निर्णय पर जी ग्रुप (ZEE Group) के एमडी पुनीत गोयनका ने भी सवाल उठाया था। एक्‍सचेंज4मीडिया (exchange4media) से पहले हुई बातचीत में उन्‍होंने कहा, ‘‘मुझे यह समझ में नहीं आता है कि सरकार प्रिंट और ब्रॉडकास्टिंग के साथ समान रूप से व्‍यवहार क्‍यों नहीं कर रही है।’

वहीं इन सबके विचारों से अलग मातृभूमि (Mathrubhumi) के डायरेक्‍टर श्रेयमस कुमार का मानना है कि एफडीआई का स्‍वागत नहीं करना चाहिए। उन्‍होंने कहा, ‘प्रिंट और टीवी दोनों की महत्‍वपूर्ण भूमिका है और मैं इसे नैतिक नजरिये से देख रहा है, क्‍योंकि इन दोनों का उद्देश्‍य सिर्फ सेवा करना है। जब भी हम कोई अखबार अथवा न्‍यूज चैनल चलाते हैं तो हम सिर्फ इसे धन कमाने के नजरिये से नहीं देखते बल्कि देश का और नैतिकता का भी ध्‍यान रखते हैं।’

एक उदाहरण देते हुए श्रेयमस ने कहा, ‘यदि निवेशक न्‍यूयॉर्क का होगा तो वह वहां बैठकर सिर्फ बैलेंस शीट ही देखेगा और उसे भारतीय सांस्‍कृतिक मूल्‍यों से कोई सरोकार नहीं होगा।’

दैनिक भास्‍कर (Dainik Bhaskar) के प्रवक्‍ता ने कहा, ‘सबसे पहले मैं यह कहना चाहूंगा कि यह सही कदम है और पूरा मीडिया सेक्‍टर इससे संबंधित है। जैसा कि हम मानते हैं कि इसे न सिर्फ भावनाओं की बढ़ोतरी में सहायता मिलेगी बल्कि इससे उद्योग के वैश्‍वीकरण को भी बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा इससे वित्‍तीय मदद के साथ-साथ वैश्विक विशेषज्ञता भी आएगी।

प्रिंट मीडिया में अभी तक एफडीआई की सीमा 26 प्रतिशत है लेकिन हम इसे प्रिंट प्‍लेयर्स के लिए रुकावाट के रूप में नहीं देखते हैं। जैसा कि हम सब जानते हैं कि एफडीआई की सीमा में वृद्धि के परिणामस्‍वरूप पूरे सेक्‍टर के पूरे गतिरोध में महत्‍वपूर्ण कमी आएगी और इससे प्रतिस्‍पर्धा का माहौल बनेगा। हालांकि हम सब मानते हैं आगे बढ़ने के लिए प्रतिस्‍पर्धा बहुत जरूरी है लेकिन प्रिंट में एफडीआई बढ़ाने से इसके नैतिक मूल्‍यों में कमी आ सकती है।’

आखिर में उन्‍होंने कहा, ‘मैं फिर इस बात को दोहराना चाहूंगा कि प्रिंट में एफडीआई की सीमा बढ़ाना अच्‍छा कदम होगा और इससे पूरे मीडिया सेक्‍टर को मजबूती मिलेगी और हमारी जैसी मीडिया कंपनियां अपने पाठकों को और बेहतर सामग्री उपलब्‍ध करा सकेंगी।’

वहीं दैनिक प्रभात खबर  के एमडी केके गोयनका का मानना है कि प्रिंट में भी एफडीआई की सीमा बढ़ाई जानी चाहिए थी।

उन्‍होंने कहा, ‘सरकार को प्रिंट के बारे में भी जरूर सोचना चाहिए था लेकिन अभी भी हमें उम्‍मीद है कि जल्‍द ही या कुछ समय बाद प्रिंट को भी इसमें शामिल कर लिया जाएगा।

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