बंद हो आरोपियों की मीडिया ट्रायलः चीफ जस्टिस

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Altamas-Kabirसुप्रीम कोर्ट के माननीय मुख्य न्यायाधीश अल्तमस कबीर ने मीडिया ट्रायल  चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि ऐसे ट्रायल से अभियुक्त के खिलाफ पूर्वाग्रह से ग्रसित होने की धारणा बनती है। माननीय कबीर  पूर्वी क्षेत्र न्यायिक सम्मेलन में भाग लेने पटना आए थे।

उन्होंने मीडिया ट्रायल के कारण अदालतों के निर्णयों पर पड़ने वाले प्रभाव पर पत्रकारों  से कि मेरा व्यक्तिगत विचार भी सभी लोगों जैसा है। सभी लोगों का कहना है कि मीडिया ट्रायल नहीं होना चाहिए। फैसला अदालतों में ही होना चाहिए।

दिल्ली में फीजियोथेरेपिस्ट के साथ चलती बस में हुए सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद किशोर अपराध कानून में उम्र सीमा को घटाने की हो रही मांग पर उन्होंने कहा कि संसद को ही इस संबंध में कानून बनाने का अधिकार है। धमकी की वजह से पूर्व एयर होस्टेस गीतिका शर्मा की मां अनुराधा शर्मा की आत्महत्या के संबंध में पूछे जाने पर उन्होंने कहा, यह बहुत दुखद है। हम पहले से ही कह रहे है कि गवाहों की सुरक्षा होनी चाहिए।

न्यायामूर्ति ने वैकल्पिक न्याय व्यवस्था को बेहद अहम बताते हुए कहा, देश की विभिन्न अदालतों में इस समय 3.5 करोड़ मामले लंबित हैं। मामलों की संख्या बढ़ने से हम रोक नहीं सकते, क्योंकि आबादी बढ़ेगी तो मामले भी बढ़ेंगे। केंद्रीय कानून मंत्री के साथ बैठक हुई है, जिसमें निचली अदालतों में जजों की संख्या दोगुनी करने का फैसला लिया गया है।

पटना के एएन सिन्हा इंस्टीट्यूट में न्याय दिलाने में वकीलों की भूमिका व खंडपीठ के साथ उनके रिश्ते विषय पर आयोजित सेमिनार में जस्टिस कबीर ने वैकल्पिक न्याय व्यवस्था की चर्चा करते हुए कहा, मुझे मध्य प्रदेश में लगी महालोक अदालत में आमंत्रित किया गया। छह लाख मामले निबटाए गए। दूसरी बार वहां इसका आयोजन हुआ तो 13 लाख मामलों का निष्पादन हुआ। एक दिन में इतनी संख्या में मामले निबटाए जाने के बाद वहां तीसरी बार जब महालोक अदालत लगी तो 27 लाख मामलों को निबटाया गया। यह वैकल्पिक न्याय व्यवस्था की अहमियत का एक बड़ा उदाहरण है। यही वक्त का तकाजा है।

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One comment

  1. There is an observation and terse comment of the Hon’ble Supreme Court of India in the Coal-Gate Scam hearing, ‘The CBI is a caged parrot, which speaks in the Master’s (Government) language.’ This statement has flashed in every media. Whether it is a media trial? It is an another question- “Why does media highlight the matters on peak and choose basis only under the malafidy pressure tactic?” The Judiciary should introspect their controversial judiciary process adopted in the most general public cases. Even Indian Judiciary themselves behave like a caged-parrot of powerful politicians and bureaucrats of the States and Country and common man does not get justice. Mostly Judges are indulged in greasing the palms and obliging the powerful politicians and bureaucrats of the States and Country to get absorbed in some Governments bodies after retirements. So comment of media-trial is itself a matter of thorough open public debate.

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