बंद एसी रुम की क्राइम मीटिंग से बाहर निकल AK-47 का धुंआ देखिए सीएम साहब

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सप्ताह भर भी नही बीता है, जब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने एसी कमरे में बैठकर बड़े बड़े टीवी स्क्रीन के सामने अपराध समीक्षा वाली बैठक किया था। अधिकारियों को कड़े निर्देश दिए थे,कई अधिकारियों को फटकार लगाई गई थी।

राजनामा.कॉम।  बंद वातानुकूलित कमरे मे हुई इस बैठक की खबर बाहर बताई गई। लगा सरकार और साहेब बढ़ते अपराध को लेकर बहुत सख्त है, लेकिन इसका नतीजा क्या निकला..बैठक के बाद अपराध रुक गया?

पुलिस वालों की सक्रियता बढ़ गई? तो जवाब है, कुछ नहीं हुआ। इस एक सप्ताह की घटनाओं को देखे तो लगता है और ने सरकार को चुनौती दी है। पूर्णिया में रिमांड होम के अंदर घुसकर दो लोगों की हत्या कर दी गई। पांच बाल अपराधी फरार हो गए।

आरा में एक साथ चार जगहों पर अपराधियो ने गोलीबारी की। पहले रंगदारी मांगी, फिर गोली मारी और जाते जाते अपना कार्ड छोड़ दिया कि मैं कौन हूं ,बावजूद इसके किसी की गिरफ्तारी नही हुई।

पटना में कोतवाली थाना के बगल में गैंगस्टर को गोलियों से भून डाला। भले ही गैंगस्टर मारा गया, लेकिन पुलिस को तो अपराधियो ने खुली चुनौती दी।

वैशाली में प्रशासन को खुली चुनौती देते हुए मोहर्रम जुलूस में हथियारों का प्रदर्शन किया गया, साम्प्रदयिक तनाव फैलाया गया। शहर का माहौल खराब हुआ और रविवार को जिस तरीके से मुज़फ़्फ़रपुर में एके 47 से गोलिया बरसाई गई, उससे तो साफ हो गया कि सीएम साहब आप बंद कमरे में चाहे,कितने भी मीटिंग कर लीजिए, अपराधियों पर इसका कोई असर नही होने वाला है।

जानते है क्यों क्योंकि आज बिहार की पुलिस कुछ करना ही नही चाहती। वो बस अपनी नौकरी और दारु-बालू के अवैध धंधे से सिर्फ काली कमाई कर रहे हैं।

बिहार पुलिस में आज दो तरह के लोग है। एक जो कुछ करना चाहते है, लेकिन उन्हें वैसा करने नही दिया जाता। वे अपराधियो पर लगाम कसना तो चाहते है, लेकिन उन्हें इसकी इजाजत नही। रिस्क वो लेना नही चाहते, क्योंकि सीनियर का सपोर्ट नही है।

मुख्यालय कागजी परफॉर्मेंस में विश्वास करता है। दूसरे वैसे लोग है, जिन्हें सिर्फ अपनी नौकरी करनी है। हाकिम जिसमें खुश है, वही करते है। काम करने से अच्छा है, अपने आका को खुश कर दो। इसका बखूबी आयना सीएम के नालंदा में देख सकते हैं।

अभी स्थिति है कि थोड़ी से गलती पर सिपाही और थानेदार पर तो कार्रवाई बड़ी तेजी से कर दी जाती है, लेकिन ऊपर के अधिकारियों पर किसी का लगाम नहीं है।

जो जहां है अपने समीकरण के हिसाब से है। काम करने से ज्यादा ध्यान समीकरण को ठीक करने में बीतता है।

पहले से ही भ्रष्टाचार में डूबी इस महकमे को शराब बंदी के रूप में एक ऐसा दीमक लग गया है जो अंदर ही अंदर इस महकमे को चट कर रहा है। अधिकारी भी कागजी उपलब्धि पर खुश हो रहे है।

आप जरा सोचिए मुंगेर में 70 से ज्यादा एके 47 आने की पक्की खबर मिली थी। अब तक 8 एके 47 बरामद भी कर लिया गया है। यह भी पता चला कि बिहार के किन किन नेताओ और अपराधियों के पास यह घातक हथियार पहुंच गया है, लेकिन बावजूद इसकी जांच एक जिले से बाहर नहीं सौपी गई हैं।

सबसे बड़ी बात है कि जब तक स्पेशलिस्ट पुलिस अफसरों को सपोर्ट नहीं मिलेगा, तब तक अपराधियो में न तो खौफ रहेगा और न ही क्राइम कंट्रोल होगा, क्योंकि बंद कमरों की मीटिंग से साहब तो खुश होंगे, लेकिन अपराधियो में खौफ नहीं होगा।

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