बिहारः प्रेस परिषद की टीम खा गई गच्चा

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 MEDIAप्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्केण्डय काटजू को भेजी गई अपनी रपट में एक तरफा रुख अख्तियार करते हुये जांच टीम बिहार में पत्रकारिता की ‘डुबती लुटिया’ के लिए सीधे तौर पर नीतीश सरकार पर उंगली उठाते हुये सरकार की विज्ञापन नीति को बिहार में पत्रकारिता की धार को कुंद करने के लिए जिम्मेदार ठहरा रही है। जबकि इसका दूसरा महत्वपूर्ण पहलु खुद अखबार संचालकों के नजरिये और व्यवहार में आया बदलाव है।

जांच टीम ने अपनी रपट में इस हकीकत की  पूरी तरह से अनदेखी की है, कि अधिक से अधिक सरकारी विज्ञापन हासिल करने की ‘हवस’ में बिहार से निकलने वाले तमाम तथाकथित बड़े अखबारात सरकारी धुन पर ‘मुजरा’ करने की मानसिकता लंबे समय से अख्तियार किये हुये हैं, और इसी मानसिकता के तहत अपने ‘बाजारू व्यवहार’ से अधिक से अधिक सरकारी विज्ञापन भी गड़प रहे हैं। अखबारों द्वारा सरकारी खजाने की लूट खसोट का आलम यह है कि एक विज्ञापन को कई-कई महीनों तक छापा जा रहा है। यहां तक कि किसी कार्यक्रम विशेष के खत्म हो जाने के बाद भी उस कार्यक्रम विशेष से संबंधित विज्ञापन छप रहे हैं। इनका अंदाज कुछ ऐसा है-‘पत्रकारिता जाये चुल्हे में, मौका है, माल पीटो।’ सनद रहे कि कुछ अरसा पहले बिहार में पत्रकारिता पर अघोषित पाबंदी की शिकायत आने पर जस्टिस काटजू ने अपनी तरफ से पहल करते हुये बिहार में प्रेस की स्वतंत्रता की जांच करने के लिए एक तीन सदस्यीय कमेटी का गठन किया था।

जांच कमेटी ने अपनी रपट में बिहार में ‘आपातकाल’ जैसी स्थिति होने की बात स्वीकारी है। इस आधार पर काटजू कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार में प्रेस को अघोषित रूप से सरकारी प्रवक्ता की भूमिका में खड़ा कर दिया है। रपट में कहा गया है कि सूबे में पत्रकारों को बहरा और लाचार करके पूरी तरह से दबा दिया गया है। रपट के मुताबकि अखबारात सूबे में अपहरण, अपराध, हत्या, सत्ताधारी नेताओं और उनके गुर्गों द्वारा भूमि कब्जा और भूमि माफियाओं की खबरों की या तो पूरी तरह से अनदेखी कर रहे हैं या फिर उन्हें बेहद कम स्थान दे रहे हैं। बिहार में स्वतंत्र और निष्पक्ष पत्रकारिता को बुरी तरह से कुचल दिया गया है। इतना ही नहीं विरोध प्रदर्शन और जन समस्या से संबंधित खबरों की भी पूरी तरह से अनदेखी की जा रही है। सरकारी नुमाइंदों से अवांछित प्रश्न पूछने की हिमाकत पत्रकार नहीं कर पा रहे हैं। जांच कमेटी बिहार में पत्रकारिता के वर्तमान परिदृश्य को  पकड़ने में कामयाब रही है, जिसे कोई ‘कमाल’ नहीं कहा जा सकता। बिहार का एक अदना सा पाठक भी इस बात को अच्छी तरह से समझ रहा है कि असली खबरों को अखबारी पन्नों से दूर रखा जा रहा है। यदि खबरें दी भी जा रही हैं तो अंदर के पन्नों पर, वो भी सार संक्षेप में। इस लिहाज से देखा जाये तो इस हकीकत तक पहुंचने के लिए जांच टीम को कुछ खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी होगी। और इस हकीकत को उकेरने के लिए भारी भरकम जांच की भी जरूरत नहीं थी।
जांच टीम द्वारा बिहार में पत्रकारिता की स्थिति पर जो अहम बिंदु सामने आया है वह है पत्रकारों द्वारा सरकारी नुमाइंदों से अवांछित प्रश्न पूछने की हिम्मत न जुटा पाना। सवाल उठता है कि बिहार में पत्रकार प्रश्न पूछने के अपने मौलिक अधिकार से भी वंचित क्यों हैं? और उससे भी अहम सवाल यह है कि प्रश्न पूछने के उनके अधिकार से वंचित करने के लिए बिहार में कौन सा मैकेनिज्म काम कर रहा है? इस पूरे मामले पर से ‘रूमानियत’ अंदाज में घूंघट उठाने के बजाय जांच टीम ने सिर्फ सरकार पर ही हथौड़ा चलाने का काम किया है। मानों उस पर पहले से ही यह दबाव था कि पूरा ठीकरा नीतीश सरकार के सिर पर फोड़ना है। यह सहज सी बात है कि दुनिया की कोई भी सरकार नहीं चाहती है कि उसकी मुखालफत वाली खबरें छपे। इस तरह की खबरों को रोकने के लिए  वह हर हथकंडे का इस्तेमाल करती रही थी, करती रही है और करती रहेगी। यह खबरनवीसों का काम है कि जनहित की खबरों के साथ वे किसी भी तरह का समझौता न करते हुये तथ्यों पर आधारित ठोस खबरें लोगों तक पहुंचाएं। सरकारी नुमाइंदों से तल्ख प्रश्न करना इसी प्रक्रिया का एक हिस्सा है। सूबे में पत्रकारों को उनकी असली भूमिका से ही महरूम कर दिया गया है। और इसके लिए सिर्फ सरकार को ही जिम्मेदार ठहराना जांच टीम की नीयत पर शक पैदा करता है।
अखबारात के मालिकान और संचालक भी बहुत हद तक इसके लिए जिम्मेदार हैं। ताली एक हाथ से नहीं बजती और यहां तो पूरा मुजरा चल रहा है। यदि बेबाक शब्दों में कहा जाये तो अखाबारात के मालिकानों और नीतीश सरकार के बीच ऊंचे स्तर पर ‘अवैध संबंध’ स्थापित हो चुके है। और यह रिश्ता पूरी तरह से कारोबारी है। जब कोई ‘ओरिजनल खबरनवीस’(सूबे ड्पलीकेट खबरनवीस इतनी अधिक संख्या में विचरण कर रहे हैं कि खबनवीसी की परिभाषा ही बदल गई है) थोड़ा सा भी फुदकने की कोशिश करता है तो उनका पंख मड़ोड़ दिया जाता है। सरकारी ओहदों पर बैठे लोग सीधे अखबारों के मालिकानों को फोन लगा कर खबरनवीस के हाथ में मोबाइल थमा देते हैं और दाल-रोटी छिनने के डर से वह तुरंत अपनी औकात में आकर प्रश्न पूछना भूल जाता है। जांच टीम ने बिहार में पत्रकारिता के इस मैकेनिज्म पर रोशनी डालने से परहेज किया है।
जांच टीम का कहना है कि निजी व्यवसायिक विज्ञापनों के अभाव में बिहार की पूरी मीडिया इंडस्ट्री मुख्यरुप से सरकारी विज्ञापनों पर ही निर्भर है। ऐसी स्थिति में सरकार स्वाभाविक तौर पर एक पक्षीय हो जाती है। इसी का फायदा उठाकर बिहार सरकार मीडिया का बांह मरोड़ रही है। जांच टीम इस पूरे मामले को एक तरफा अत्याचार के रूप में चित्रित कर रही है, जबकि यहां मामला दो तरफा मोहब्बत की है। असल मसला है वहां पत्रकारों को अखबारात के अंदर पत्रकार बनाये रखने का। बिहार में कई उम्दा पत्रकार सड़कों की धूल फांक रहे हैं, क्योंकि वे अखबारात के वर्तमान ‘माल बटोरो’ पालिसी के लिए मुफीद नहीं है। वे खबरों की बात करते हैं, जबकि अखबारात को अधिक से अधिक विज्ञापन लाने वाले प्रबंध संपादकों की जरूरत है। ये तथाकथित प्रबंध संपादक विज्ञापन बटोरने के चक्कर में न सिर्फ खबरों को ‘किल’ करते हैं बल्कि खबर पकड़ने वाले ओरिजन खबरचियों को हर तरह से हतोत्साहित भी करते हैं। ये भूल जाते हैं कि अखबारात की विश्वसनीयता का एक मात्र आधार जनहित वाली खबरें ही होती हैं। यह सौ फीसदी सच है कि कोई भी पाठक विज्ञापन देखने के लिए अखबार नहीं खरीदता है।
बेहतर होगा कि बिहार में अच्छे पत्रकारों को प्रोत्साहित करने की नीति को न सिर्फ सांचे में ढाला जाये बल्कि उस पर फौरी तौर पर अमल करने की भी पुख्ता व्यवस्था  की जाये। बेहतर पत्रकारों को ‘सुरक्षित जोन’ में होने का अहसास कराना भी जरूरी है। इसके लिए काम के बुनियादी माहौल को दुरुस्त करने की जरूरत है, जिसमें आर्थिक सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य और बीमा भी शामिल है। विगत में बिहार बेहतर पत्रकारिता का गढ़ रहा है। यहां से निकले कई उम्दा पत्रकार आज भी राष्ट्रीय पत्रकारिता में अपनी चमक बिखेर रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से बिहार में पत्रकारों की नई पौध बेहतर खाद पानी के अभाव में ‘जेहनी प्रदूषण’ और ‘बौद्धिक कुपोषण’ का शिकार हो रही है। यह दुर्भाग्य की बाद है कि जांच टीम इस हकीकत को चिन्हित करने में पूरी तरह से नाकाम रही है। अब चिंता का विषय सिर्फ बिहार की खस्ताहाल पत्रकारिता ही नहीं है, बल्कि विगत में सूबे में उम्दा पत्रकारों को  निर्मित करने वाली वह सहज प्रक्रिया भी है जो बुरी तरह से चरमरा कर चूं चूं कर रही है। अब इस मैकेनिज्म से सिर्फ ‘चूं चूं’ पत्रकार ही निकलेंगे। और ऐसे ‘चूं चूं पत्रकारों’ को अपनी धुन पर नचाते रहना मीडिया मालिकों के साथ-साथ सरकार के लिए भी सहज होगा।
……………. आलोक नंदन
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