प्रेस क्लब की सदस्यता में धांधली के बीच विजय पाठक को लेकर उभरे तत्थ

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राजनामा.कॉम। अब जबकि प्रेस क्लब, रांची की तदर्थ कमिटि की सदस्यता अभियान के दौरान व्यापक पैमाने पर धांधली बरते जाने के बाद चुनाव प्रक्रिया की घोषणा कर दी गई है और समर्थ सदस्यों ने विभिन्न पदों के लिये नामांकण कर दिया है, ऐसे एक बड़ा सबाल उठता है कि जिन लोगों ने द रांची प्रेस क्लब के निबंधन के दौरान फर्जीबाड़ा किया है या फिर सदस्यता प्रक्रिया के दौरान निजी खुन्नस निकालते हुये करीब ढाई सौ पत्रकारों को चुनाव प्रक्रिया से दूर रखा है, वैसे लोगों को चुनाव लड़ना किस नैतिकता का घोतक है।

एक अखबार के स्थानीय संपादक विजयकांत पाठक ने अध्यक्ष पद के लिये नामांकण भरा है। यह वही विजय पाठक हैं, जिन्होंने कथित द रांची प्रेस क्लब के निबंधन के दौरान हर कायदे कानून को ताक पर रख दिया।

पाठक ने सचिव/महासचिव की हैसियत से निबंधन कार्यालय में न तो अपना कोई आवास प्रमाण पत्र जमा किया था और न ही संस्था की। जबकि सारी जबावदेही इनकी ही तय थी।

उन्होंने संस्था की 7 सदस्यीय कार्यकारिणी समिति के सदस्यों के विवरण में दूसरे क्रम में अपना पता विजय पाठक, पिता- सुरेन्द्र पाठक, मकान संख्या-एलआईजी 203, हरमू कॉलोनी, जिला-रांची (झारखंड), शिक्षा- स्नाकोत्तर, पेशा- पत्रकारिता, एवं संस्था पद नाम- महासचिव बताया है। 

जबकि इसके पूर्व इसी सूची में प्रथम क्रम में श्री बलबीर दत्त, पिता-स्व. शिव दास दत्त, पता- देशप्राण लेन, शैक्षणिक योग्यता- रिक्त, पेशा-पत्रकारिता और संस्था पद नाम- प्रधान संपादक बताये गये हैं।

आकांक्षी व्यक्तियों की सूची एवं विवरण में भी उपरोक्त दोनों का हुबहू जिक्र है। सिर्फ संस्था का पदनाम का कोई जिक्र नहीं किया गया है। सबाल उठता है कि कथित संस्था की 7 सदस्यीय कार्यकारिणी समिति में बलबीर दत्त जी का संस्था पदनाम की जगह अध्यक्ष का उल्लेख क्यों नहीं किया गया। उन्हें भी 11 सदस्यीय आकांक्षी सूची में रखा जाना खुद में एक आश्चर्य है।

कथित संस्था की नियमावली के अनुसार संस्था द्वारा या संस्था के विरुद्ध कोई भी कानूनी कार्रवाई संस्था के सचिव के पदनाम से होगी।

इसके आलावे उपलब्ध दस्तावेज के अनुसार निबंधन कार्यालय को जो न्यायलीय शपथ पत्र में विजय पाठक ने संस्था का नाम रांची प्रेस क्लब बताया है और खुद को उसका महासचिव बताया है। साथ में यह भी उल्लेख किया है कि आलेख्य में दी गई सारी जानकारी व तत्थ पूर्णतः सत्य है।

अब सबाल उठता है कि प्रेस क्लब, रांची के हो रहे आम चुनाव में एक प्रेस संस्था के निबंधन में फर्जीबाड़े करने वाले विजय पाठक सरीखे लोग कैसे सरीक हो रहे हैं।

मनमानी तरीके से ही सही, जिस तरह से सदस्य (वोटर) बनाये गये हैं। उसमें उनके अखबार में मातहत काम करने वालों को काफी प्रथमिकता दी गई है।

अगर ऐसे लोग एन-केन-प्रकेरेण चुनाव जीत अध्यक्ष बन जाते हैं, कोई नई परिकल्पना या बदलाव की उम्मीद कैसे किया जा सकता है। वेशक पूर्व के उभरे तत्थों की गहराई से जांच-पड़ताल और वर्तमान में उस परगहन चिंतन-मंथ की जरुरत है। 

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