प्रेस काउंसिल की जगह हो मीडिया काउंसिल

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imagesवेशक मीडिया का दायरा अब पहले जैसा नहीं रहा। जिस समय प्रेस परिषद की अवधारणाये बनी और एक सार्थक उद्देश्य के लिये उसका गठन हुआ, तब प्रिंट मीडिया ही अस्तित्व में था।

आज मीडिया का दायरा काफी बढ़ गया है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के बाद शोशल मीडिया ने तो सूचनाओं व विचारों के आदान प्रदान की दुनिया ही बदल डाली है। भारतीय संविधान में वाक्य व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की आजादी के मायने भी बदल गये हैं। ऐसे में सबाल उठना लाजमि है कि प्रिंट मीडिया की तरह इलेक्ट्रॉनिक और शोशल मीडिया पर भी प्रिंट मीडिया की तरह अनुशासन जरुरी नहीं है ?

बात चाहे असम की घटनाओं को लेकर शोशल मीडिया की करतूतों की हो या आये दिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के कई अनैतिक सूचनाओं  के प्रसारण की या फिर तेजी से फैलते वेब जर्नलिज्म के धूंध की। कहीं न कहीं देश और समाज की एकता-अखंडता के लिये गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया है। कारण, इसमें अनुशासन व नैतिकता  का हावी होते जाना।

भारतीय प्रेस परिषद के सदस्य अरुण कुमार कहते हैं कि आज जितने भी जर्नलिस्ट काम कर रहे हैं, चाहे वे प्रिंट मीडिया के हों या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हों या फिर वेब मीडिया पर खड़े हों, उनके लिये एक रेगुलेटरी बॉडी बनाना जरुरी है। रेगुलेटरी बॉडी का अर्थ मिडीया के किसी हिस्से पर अंकुश लगाना नहीं माना जाना चाहिये बल्कि, उस पर अनुशासन और नैतिकता का शिकंजा मानी जानी चाहिये।

श्री कुमार यह भी कहते हैं कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एक-दो  स्वयंभू संस्थाओं के मातहत काम कर रही है। वेब मीडिया वेलगाम है। शोशल मीडिया पर कट्टरवादियों का कब्जा है। अगर इनसे जुड़े पत्रकारों के साथ कुछ भी होनी-अनहोनी होती है  तो उनके हित में प्रेस परिषद कोई सार्थक कदम नहीं उठा पाती। क्योंकि प्रेस परिषद का गठन जिस दौर में हुआ था, उस समय मार्डन मीडिया का हौचपौच नहीं था।

 

 

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