हाँ मैं झारखण्ड हूँ

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jharkhandमैं अपनी विशेषता के लिए जाना जाता है। हमारा देश अपनी सभ्यता एवं संस्कृति के लिए पुरे संसार में विख्यात है।

हमारा भारत देश अपने यहाँ होने वाले पूजा – पाठ , पर्व के लिए भी बेहद प्रसिद्ध है , अलग – अलग धर्म के लोग यहाँ निवास करते हैं , जहाँ आस्थानुसार लोगों के द्वारा अनेक देवी – देवताओं की पूजा की जाती है।

हमारे देश में 29 राज्य हैं , हर राज्य में वहां के पर्व विशेष महत्वा रखते हैं। जैसे महाराष्ट्र का गणेश पूजा पुरे भारत में सबसे उम्दा माना जाता है। उसी तरह पुरे भारत में दुर्गा पूजा – काली पूजा मनाया जाता है , पर कोलकाता का दुर्गा पूजा – काली पूजा अपने आप में ही विशेष है।

ऐसे ही हर राज्य में वहां होनेवाले पर्व – त्यौहार ख़ास होते हैं। पर मेरे नजर से हम झारखंडवासी इस सन्दर्भ में भारत के सभी राज्यों की अपेक्षा बहुत ही विशेष एवं ख़ास हैं। इसका कारण यह है कि झारखण्ड में सबसे ज्यादा प्राकृतिक की पूजा की जाती है।

झारखण्ड में अनेक प्राकृतिक की पूजा की जाती है। जैसे –

करमा पूजा – जिसमे बहन सारा दिन उपवास रख कर अपन भाई के लिए रात्रि में करम पेड़ के निचे बैठ कर पूजा करती है। इसे हरियाली का त्यौहार भी कहा जाता है।

सरहुल , तीज , जिवित्य , फसलों की कटाई से पहले जतरा अखरा  में गांव के हरियाली के लिए पहान के द्वारा पूजा की जाती है। इन सभी पर्वों में प्राकृतिक , पेड़ – पौधों के साथ पूजा की जाती है।

झारखण्ड में इसके अलावा भी अनेक पर्व ऐसे हैं जो हरियाली , पर्यावरण के लिए की जाती है।

वैसे तो झारखण्ड में दुर्गा पूजा एवं अन्य त्यौहार भी खूब धूम – धाम से मनाये जाते हैं , परन्तु जब बात आती है प्राकृतिक की तो सभी तन – मन से लीन होकर उल्लास के साथ पूजा – अर्चना करते हैं।

झारखंड राज्य के उत्तरी छोटानागपुर प्रमंडल के मुख्यालय हजारीबाग को हजार बागों का शहर कहा जाता है। कभी यहाँ आम के हजारों बाग हुआ करते थे तथा हजारों की संख्या में बाघ भी पाए जाते थे , क्यों न हों , ये चारों दिशाओं से वन सम्पदाओं से घिरा हुआ जो है।

जहाँ तक निगाहें उठें हरियाली ही हरियाली , इन्हीं वनों की देन है कि यहाँ बारिश खूब होती है। सालों भर बहुत ही सुहावना मौसम होता है यहां , कभी ज्यादा गरमी नहीं पड़ती ।

हजारीबाग शहर से लगभग 25 किलोमीटर की दूरी पर राष्ट्रीय उच्च पथ पर पूरब की ओर चलते हुए टाटी झरिया प्रखंड से एक किलोमीटर पहले हमें एक वन प्रदेश मिलता है।

“ दुधमटिया ” :  दुध-मटिया सखुआ के पेड़ों का घना जंगल है । इसकी विशेषता यह है , कि प्रत्येक पेड़ लाल-पीले कच्चे धागों में लिपटा किसी पवित्र बंधन से बंधा बहुत ही अद्भुत लगता है ।

प्रकृति हमारी सदा सर्वदा हितैषी रही है। प्राणदायिनी शुद्ध हवा हमें पेड़ों स ही प्राप्त होती है , जल भोजन औषधि सभी के लिए हम प्रकृति पर ही आश्रित रहते हैं। प्राण रक्षक संजीवनी , प्रकृति की ही देन है।

परन्तु हम इंसान इन बातों को दरकिनार करते हुए अपनी मुलभुत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए यहाँ भरी मात्र में पेड़ काटने लगे , जिससे वनों के सुंदरता में कमी आ रही थी। और जब पेड़ काट जायेंगे तो पर्यावण को बहुत नुकसान होगा।

इसी गति से लोग पेड़ काटते रहते तो हम इंसानों को ही सबसे ज्यादा नुक्सान होता आगे चल कर , पेड़ों की रक्षा के लिए उत्तराँचल में चले चिपको आंदोलन को कौन नहीं जानता।

पेड़ों को बचाने के लिए ये लोग पेड़ों से लिपट जाया करते थे , लेकिन झारखंड के हज़ारीबाग ज़िले के एक सरकारी स्कूल के आदरणीय शिक्षक ” श्री महादेव महतो जी ” ने बखूबी समझा। और चल चिपको आंदोलन से भी बेहतर 1995 से एक अभियान प्रारम्भ किये।

इस अभियान के तहत वो स्कूली बच्चों के साथ मिलकर प्रत्येक वर्ष 7 अक्टूबर पेड़ों के साथ रक्षाबंधन मनाना आरम्भ किये ।

वैसे तो रक्षाबंधन पर्व भाई – बहन के बीच आपसी प्यार के बंधन का प्रतीक है , स्निग्ध और नि:स्वार्थ प्रेम का। जिसमे बहन अपने भाई के हाथ में रेशम के धागों का राखी बांधती , यह रेशम का धागा विश्वास का एवं सुरक्षा का धागा होता है।

” फिर पेड़ों के साथ रक्षाबंधन “

सुनने में थोड़ा अजीब जरूर लगता है , पर है नहीं। पेड़ों के साथ रक्षाबंधन ग्रामीणों की भोली-भाली आस्था का वनों के साथ अटूट रिश्ता कायम करता है। जहाँ ग्रामीण इन वनों को कभी किसी प्रकार की क्षति नहीं पहुँचाने का संकल्प लेते हैं वहीं ये पेड़ आजीवन शुद्ध वातावरण और स्वच्छ वायु प्रदान करते रहने का मौन – मूक वचन देते हैं ।

७ अक्टूबर से पहले  हजारीबाग में साइकिल रैली निकाल कर जागरूकता अभियान चलाया जाता है। जिसमे हजारीबाग क्या पुरे झारखण्ड से कई हजार लोग इस रैली में हिस्सा लेते हैं।

इस रैली का मकसद यह होता है कि  ” पर्यावण मेला ” के लिए लोगों को जागरूक करें और सभी ७ अक्टूबर के दिन दुधमटिया पहुँच कर पेड़ों के साथ रक्षाबंधन मनाये। यह सभी तस्वीर कल रैली की ही है ,

रैली के वक़्त जगह – जगह लोगों के द्वारा रैली में हिस्सा लिए साइकिल सवारों का स्वागत किया जाता है।  सड़क के किनारे – किनारे स्कूली बच्चे शोर करते हुए सभी का हौसला अफजाई करते हैं। समाज सेवी अपनी इक्षा से शरबत , पानी , चना बांटते  हैं।  सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम होते हैं , CRPF के जवान का इसमें विशेष योगदान होता है हर  वर्ष।

1995 में आरम्भ हुए इस अभियान में लोगों को इसकी विशेषता का आभास हुआ। और हर वर्ष धीरे – धीरे यहाँ के लोग जागरूक हुए , और पिछल कुछ वर्ष में यह इतना प्रसिद्ध हुआ है कि देश के अनेक जगह से दर्शक यहाँ जुटते हैं।

हजारों की संख्या में ग्रामीण (स्त्री , पुरुष- बूढ़े बच्चे सभी ) , बाहरी दर्शक , समाज सेवी , पर्यावरणविद मिलकर भावनाओं के फूल अक्षत चढा कर मंत्रोच्चार के साथ कच्चे धागे से प्रत्येक पेड़ का रक्षाबंधन करते हैं ।

आज यहाँ दुध-मटिया में मेला का भी आयोजन किया जाता है , ढोल ,मंजीरे लेकर लोग लोक गीत गाते हुए यहाँ लोग पहुँचते हैं।

दिन भर उत्सव का माहौल रहता है । पेड़ों को सजाया जाता है , झंडी – पताके लगाए जाते हैं। स्कूली बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है ।

गाँव की पूरी आबादी इस वन प्रदेश को सुशोभित करती रहती है , दिन भर मेला लगा रहता है , जहाँ एक से बढ़कर एक मनोरंजन की चीजें रहती हैं। बहुत ही उत्सव का माहौल होता है ,

सुबह से शाम तक स्त्रियों के मधुरगीतों और बच्चों की मीठी किलकारियों से वन प्रांगण गुंजायमान रहता है । ” श्री महादेव महतो जी ” 1995 में आज के दिन पेड़ों के साथ जो रक्षा बंधन मानना आरम्भ किये हैं ,

वो धीरे – धीरे हजारीबाग से बाहर निकल कर पुरे झारखण्ड में लोग अपने – अपने तरीके स मनाना आरम्भ कर दिए हैं। और वो दिन दूर नहीं जब इसकी लोकप्रियता झारखण्ड के साथ – साथ हमारे पुरे देश में फ़ैल जायगी। और विदेश भी हमारे इस पहल से प्रेरणा लेंगे।

urmila” उर्मिला कुमारी   “

बाबा पथ , नियर – आनंद बिहार , हुरहरु , हजारीबाग

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