प्रेम-प्रणय का आध्यात्मिक पर्व भगोरिया

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कभी सरदारपुर, कभी पेटलवाद, कभी पडियाल, तो कभी आलीराजपुर….सफर जारी था आदिवासी अंचल का।  सुबह नाश्ता-पानी कर कभी बाइक, कभी ट्रैक्टर-जीप, कभी बैलगाड़ी तो कभी और कुछ ये थे साधन इन गांवों की सैर के और भगोरिया के रसपान करने के। शाम होने पर कहीं भी किसी दोस्त के यहां तो कभी खुले मैदान में डेरा जम जाता।

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वैसे तो कई इलाकों में पहचान होने की वजह से ठहरने की कोई प्राब्लम नहीं थी, मगर हम दो-तीन लोग एक अल्हड़ अंदाज में ही ठहरना चाहते थे।

कभी हमारा वाहन अलीराजपुर के गांवों की ओर चल पड़ता तो कभी पड़ियाल के गांवों की तरफ तो कभी कट्ठीवाड़ा की तरफ। भगोरिया देखने। 

प्राकृतिक सौंदर्य और सीधा-सरल मेहनतकश जिन्दगी से लबरेज इस अंचल की ख्याति यूं तो कई कारणों से लेकिन इनमें भी सबसे प्रमुख कारण है भगोरिया जो आदिवासी अंचल झाबुआ, धार, आलीराजपुर, कट्ठीवाड़ा सहित अनेक ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में बड़ी उमंग और हर्षोल्लास से मनाया जाता है।

alirajpurप्रणय निवेदन के इस पर्व के दिन भोलेभाले आदिवासियों के साज-श्रंगार और वेषभूषाएं देखते ही बनते हैं। बड़ी दूर दूर से यहां तक कि विदेशी सैलानी भी भगोरिया देखने का लोभ जज्ब नहीं कर पाते हैं। आदिवासी अंचल में होलिका दहन से पहले ही इस त्योहार की शुरुआत हो जाती है और जिस दिन जिस गांव या कस्बे में हाट भरता है उसी दिन उस गांव में भगोरिया मनाया जाता है।

इस बहुजन समाज का हल बना यह भगोरिया पर्व। होलिका दहन से सात दिन पूर्व शुरू होने वाले इस भगोरिया पर्व में युवा वर्ग की भूमिका खासी महत्वपूर्ण होती है। अपितु यह पर्व युवा वर्ग के आसपास ही केंद्रित रहता है। जंगलों में जब टेसू खिलता है। महुआ गदराता है। ताड़ी शबाब पर आती है। हवाओं में हल्की-हल्की रोमांच भरने वाली ऊष्मा भरने लगती है, तब फागुन आता है और तब भगोरिया आता है।

भगोरिया मनाने की परंपरा बरसों से चली आ रही है। झाबुआ जिले के भगोर गांव से यह मेला शुरू हुआ। इसलिए इसका नाम भगोरिया मेला रख दिया गया। भगोरिया के दौरान अल्हड़ कुर्राट और मांदल की मस्त आवाज लुभाती है।

भगोरिया पर्व को आधुनिक प्रेम के आईने में देखने का प्रयास करेंगे तो आदिवासी वर्ग के शाश्वत प्रेम के प्रति भ्रम की स्थिति बन जाएगी।

Bhagoriya 4भगोरिया केवल प्रणय या सांस्कृतिक पर्व ही नहीं है, यह एक आध्यात्मिक पर्व भी है। फर्क सिर्फ इतना है कि इसे प्रौढ़ पीढ़ी मनाती है। प्रौढ़ आदिवासी भगोरिए के दिनों में मन्नतें मांगते हैं। यह मन्नतें खास कर बुरी दृष्टि से बचने व सुख की कामना के लिए ली जाती हैं।

इस दौरान आदिवासी जहां ढोल-मांदल के साथ मेला स्थल पर दिखाई देंगे वहीं मांदल की थाप पर थिरकते लोग भी नजर आएंगे।

अब तो मध्यप्रदेश की पहचान बने भगोरिया लोक पर्व को देश-दुनिया भी देख सकेगी। इस पर्व को झाबुआ की एक टीम आनलाइन करने जा रही है। एक क्लिक के जरिए आप झाबुआ के भगोरिया को घर-दफ्तर में बैठे-बैठे देख और सुन सकेंगे।

सोशल साइट का माध्यम बनी इस साइट पर भगोरिया की हर तस्वीर व लाइव वीडियो आप देख सकेंगे। भगोरिया पर बन रहा विशेष पेज इस लोकपर्व से जुड़ी हर महत्वपूर्ण जानकारी के साथ सांस्कृतिक तथ्य भी दिखाई देगा।

आदिवासी समाज सर्वाधिक उन्मुक्तता से अपनी मस्ती, अपने प्रेम को जहां उजागर करता है वह भगोरिया पर्व है।

आदिवासी बनाम भील जाति के लिए प्रणय ठीक वैसा ही है, जैसा पत्थर के धरातल पर किसी कोमल पुष्प का न केवल जन्म लेना अपितु अपनी इस सफलता पर इस तरह खिलखिला देना कि दुनिया का ध्यान भी उस पर जाकर ठहर जाए।

वन क्षेत्रों में रहकर प्रतिक्षण रोटी हेतु हाड़तोड़ मेहनत करने वाले इस समाज में प्रेम के लिए इतना ही अवकाश है, जितना विवाह के लिए प्रेम की आवश्यकता होती है। यहां प्रेम से ज्यादा जरूरी विवाह है।

विवाह का अर्थ है जीवन की कठिन राह पर कमाई की गाड़ी खींचने वाले एक साथी की प्राप्ति। आदिवासी समाज में विवाह के लिए जरूरी है ह्यवधू मूल्यह्ण चुकाने की क्षमता। यह वधू मूल्य हर युग में इसकी प्रतिदिन की आमदनी से कई गुना अधिक रहा है। जब वह एक रुपया रोज कमाता था तब उसे वधू लाने के लिए हजार रुपए चुकाने पड़ते थे।

हाल ही के वर्षों में शिक्षित युवा वर्ग में भगोरिए के माध्यम से चयन को नकारना शुरू कर दिया है। यहां तक कि उसे प्रणय पर्व कहने पर भी तीखी आपत्ति है। इसका मुख्य कारण भगोरिए में आ रही विकृति खासकर शहरी विकृतियां हैं।

देह दर्शन व सौंदर्यपान को लालायित तबके ने नितांत आदिवासी वर्ग के इस निश्छल पर्व में जबरदस्त हस्तक्षेप किया है।

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दुख इस बात का है कि पेटलावद के सफर के दौरान जो उत्साह पहले नजर आता था वो अबकी बार नहीं दिखा।  आदिवासी संस्कृति का महापर्व भगोरिया हाट का माहोल यहां नहीं जमा।

कई लोगों ने बताया कि  अंचल के ज्यादातर लोग मजदूरी के लिये बाहर गये हुए थे जो आशातीत संख्या में लौटकर नहीं आये इस कारण भीड भाड दिखाई नहीं दी। 

आदिवासी समाज आज से करीब २0 से २5 वर्ष पहले पेटलावद के आसपास के 20 गांव के आदिवासी ग्रामीण ढोल मांदल पर झुमते फिरते आते थे ओर खुब धमाल चैकडी भी करते थे लेकिन उन्हें ठीक तरह से प्रोत्साहन नहीं मिलने के कारण उनका अब हाट बाजार में आना बंद हो गया।    …..आदिवासी इलाकों के सफर पर अनिल शर्मा  की रिपोर्ताज

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