प्रकृति का खेल या भ्रष्टाचार की रेल! कब खुलेगा इस आश्चर्य का राज़?

Share Button
Read Time:11 Minute, 11 Second

राजनामा.कॉम।  यह बात सही है कि प्रकृति के खेल निराले हैं और आज तक उन्हें कोई नहीं समझ पाया है। मगर यह बात झारखंड के हजारीबाग जिले के लोहारियाटांड गांव के पास रेल पटरियों की विचित्र गतिविधियों पर लागू नहीं होती है।

railक्योंकि यह प्रकृति का कोई खेल नहीं है, बल्कि यह पूर्व मध्य रेलवे के सम्बंधित इंजीनियरिंग अधिकारियों और निचले स्तर के रेल कर्मचारियों एवं ठेकेदारों की मिलीभगत, भ्रष्टाचार, नासमझी और नालायकी का परिणाम है।’

यह कहना है रेल इंजीनियरिंग के कई जानकारों और पूर्व एवं वर्तमान रेलवे इंजीनियरिंग के तमाम वरिष्ठ अधिकारियों का।

उनका कहना है कि ‘यह विज्ञान का नहीं, बल्कि अज्ञान का अचम्भा है, जिसे पूर्व मध्य रेलवे के कुछ अकर्मण्य, अज्ञानी, निकम्मे एवं भ्रष्ट इंजीनियरिंग अधिकारियों द्वारा प्राकृतिक चमत्कार और अंध-विश्वास के रूप में इसलिए निरूपित किया जा रहा है कि जिससे अपनी नालायकी को छिपाया जा सके।

उल्लेखनीय है कि रोज सुबह 8 बजने के बाद यहां की दोनों रेल पटरियां एक-दूसरे के नजदीक आने और आपस में सटने लगती हैं। दोपहर 3 बजे के बाद अलग होती हैं।

रेल इंजीनियरिंग के उपरोक्त जानकारों का मानना है कि यह वास्तव में इंजीनियरिंग कार्यों में बरती गई खामियों और भ्रष्टाचार का नतीजा है।

उल्लेखनीय है कि इन दिनों हजारीबाग-बरकाकाना रेल खंड पर आपस में स्वतः जुड़ने की खबरें सुर्खियों में है। रेल पटरियां’ शीर्षक से की खबरें प्रकाशित की गई थी कि झारखंड के लोहारियाटांड गांव गांव में रेल पटरियों की विचित्र गतिविधियों ने सबको अचंभे में डाल दिया।

रोज सुबह 8 बजे दोनों रेल पटरियों के एक-दूसरे के नजदीक आने और आपस में सटने तथा तीन घंटे में पूरी तरह चिपक जाने, फिर दोपहर 3 बजे के बाद स्वत: ही अलग होने की घटना को स्थानीय ग्रामीण चमत्कार मानकर उसकी पूजा करने लगे।

वेशक, रेल पटरियों की इस गतिविधि ने भू-विज्ञानियों को अपना सिर खुजाने को मजबूर कर दिया है।

क्योंकि यह पूरा वाकया एकदम अजीब और अचंभित करने वाला है। हजारीबाग-बरकाकाना रेल रूट पर बसे गांव लोहरियाटांड के पास से गुजरने वाली रेल लाइन पर यह प्राकृतिक अचम्भा घटित हो रहा है।

अभी इस रूट पर ट्रेनों की आवाजाही शुरू नहीं हुई है। हालांकि इसका उदघाटन गत 20 फरवरी को प्रधानमंत्री ने किया था।

कुछ ग्रामीणों और रेल पटरियों की देखरेख करने वाले इंजीनियरिंग विभाग के कर्मचारियों का कहना था कि उन्होंने इन रेल पटरियों की यह स्वचालित गतिविधि कई बार होते देखी है।

उन्होंने इस बारे में बहुत छानबीन करने की कोशिश की है, लेकिन अब तक इसका कोई उचित कारण अथवा औचित्य उनकी समझ नहीं आ पाया है।

rail1कर्मचारियों के साथ-साथ गांव वालों ने बताया था कि इन रेल पटरियों के आपस में चिपकने या एक-दूसरे की ओर खिंचने की प्रक्रिया को उन्होंने कई बार उनके बीच मोटी लकड़ी अड़ाकर रोकने की कोशिश भी की लेकिन, इन पटरियों का खिसकना नहीं रुका। उनका कहना था कि पटरियों का खिंचाव इतना शक्तिशाली है कि सीमेंट के प्लेटफॉर्म (स्लीपर) में मोटे लोहे की क्लिप से कसी पटरियां क्लिप तोड़कर चिपक जाती हैं। ऐसा 15-20 फीट की लंबाई में ही हो रहा है।

बकौल साइंटिस्ट डॉ. बी. के. मिश्रा, यह मैग्नेटिक फील्ड इफेक्ट भी हो सकता है और इसका पता भूगर्भ में ड्रिलिंग से ही चल पाएगा कि जमीन के अंदर वास्तव में क्या हो रहा है।

जबकि जूलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. डी. एन. साधु के अनुसार यह देखना होगा कि जिस चट्टान के ऊपर से ये रेल लाइन गुजरी है, वह कौन सा पत्थर है।

उधर, रेलवे के असिस्टेंट डिवीजनल इंजीनियर (एडीईएन) श्री एस. के. पाठक कहते हैं कि टेंपरेचर ऑब्जर्व करने के लिए लाइन के बीच-बीच में स्वीच एक्सपेंशन ज्वाइंट (एसएजे) लगाया जाता है। यह हजारीबाग-कोडरमा रेलखंड में तीन जगहों पर लगाया गया है।

हो सकता है कि जहां पर यह विचित्र गतिविधि हो रही है, वहां अभी एसएजे सिस्टम नहीं लगाया गया हो। इसका असली कारण तो अब जांच के बाद ही पता चलेगा।

हालांकि यह आश्चर्य की बात है कि रेल लाइन के सालों चलने वाले सर्वेक्षण में ऐसी किसी भूगर्भीय प्रक्रिया अथवा गतिविधि की कोई जांच या सर्वेक्षण किया गया था या नहीं।  इस बात की कोई जानकारी रेल अधिकारी देने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि इस बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं है।

रेल इंजीनियरिंग के जानकारों और रेलवे के कई पूर्व एवं वर्तमान वरिष्ठ इंजीनियरिंग अधिकारियों का इस घटना के बारे में कहना है कि इस तरह की भ्रामक खबर रेलवे की विश्वसनीयता और प्रतिष्ठा को क्षति पहुंचाने की नीयत से इसके कुछ विरोधियों और कुटिल-कामी लोगों की एक सोची-समझी रणनीति हो सकती है।

उनका यह भी कहना है कि उक्त खबर में चित्रित की गई भ्रामक स्थिति कुछ नालायक और भ्रष्टाचार में संलिप्त रेल कर्मचारियों एवं अधिकारियों के निकम्मेपन का उदहारण है, जो कि पूर्णतः रेलवे की प्रतिष्ठा को धूमिल करने वाली है।

उन सबों का मानना है कि उक्त रेल खंड में रेल पटरियों की गतिविधि की स्थिति पर लिखित स्पष्टीकरण में कहा है कि प्रकाशित फोटो में स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि उक्त रेल खंड में आगे गोलाई है और फ्लश बट वेल्डिंग प्लांट से लगातार वेल्डिंग की गई है, जो कम तापमान पर ठंडे दिनों में किया गया है। यह सीडब्ल्यूआर/एलडब्ल्यूआर को परिभाषित करता है। यह इस रेल लाइन के निर्माण कार्य को पूरा करने में बरती गई गंभीर असावधानियों का नतीजा है।

सभी जानते हैं कि तापमान बढ़ने पर रेल बढ़ती है और तापमान घटने पर यह सामान्य अवस्था में आ जाती है। यही उस रेल खंड में भी हो रहा है।

जहां तक दोनों रेल पटरियों का एक-दूसरी की ओर खिंचने और फिर आपस में चिपक जाने (सट जाने) की बात है  तो यह कोई प्राकृतिक घटना या चमत्कार नहीं, बल्कि ऐसा सिर्फ इंजीनियरिंग कार्य को सही ढ़ंग से संपादित नहीं किए जाने तथा सम्बंधित इंजीनियरिंग अधिकारियों, कर्मचारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत एवं भ्रष्टाचार के परिणामस्वरूप हो रहा है। इसकी गहराई से जांच किए जाने की आवश्यकता है।

सबसे बड़ी बात कि पूर्व मध्य रेलवे (ईसीआर) में रेलवे बोर्ड और उच्च रेल अधिकारियों की कृपा से ‘जुगाड़ फार्मूला’ चलता है। इसी फार्मूले के अनुसार ईसीआर में अधिकतर पदोन्नतियां और पोस्टिंग होती हैं।

वास्तव में यह ‘ईसीआर’ यानि ‘ईटिंग-चीटिंग-रेलवे’ है, जहां अधिकतर जातिगत एवं ग्रुपिज्म के कारण और दीमक से भी खतरनाक कीड़ा लगे होने से यह कुछ चोरों, चापलूसों, चुगलखोरों और  चरित्रहीन भ्रष्टाचारियों की रेलवे बनकर रह गई है। ‘ईसीआर ’ का मूल मंत्र है कि ‘बने रहो पगला, काम करेगा अगला’।

ऐसी मानसिकता से ग्रसित रेल अधिकारियों एवं कर्मचारियों की इस रेलवे का अब ईश्वर ही मालिक है। यहां के अधिकांश रेल अधिकारी और कर्मचारी कथावाचक की भूमिका निभाते हैं।

यही नहीं, उक्त रेल खंड में ट्रैक लिंकिंग में जल्दबाजी के चलते उक्त स्थान पर या तो दो विपरीत दिशाओ से लिंकिंग कार्य कराया गया है। अथवा उक्त स्थान को छोड़कर उसके बाद अगला ग्रुप लिकिंग कार्य प्रारम्भ कर दिया गया है।

ऐसा लगता है कि उक्त स्थान पर रेल का कट गैप या फिश प्लेट जोड़ अस्थाई रूप में नहीं रखा गया है, जिससे उक्त स्थान पर अधिक स्ट्रेस लॉक हो गया है।

बहरहाल, विशेषज्ञों की राय में स्ट्रेस लॉक को काटकर और वहां से 6 इंच रेल का टुकड़ा निकालकर उसे वास्तविक एलाइनमेंट में लाने तथा अगले दिन वहां द्रुत गति से डिस्ट्रेसिंग करवाने से यह तथाकथित प्रकृति का खेल या भ्रष्ट इंजीनियरिंग अधिकारियों एवं कर्मचारियों और ठेकेदारों की मिलीभगत का जुगाड़ू खेल स्वतः ही समाप्त हो जाएगा। (साभार और संपादित खबर)   

0 0
Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleppy
Sleppy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %
Share Button

Relate Newss:

मेड इन चाइना होगी मोदी सरकार की पटेल स्टैचू ऑफ यूनिटी
रघुबर जी, शराबबंदी को लेकर अपनी बाट न लगाईए
शुक्रिया सरायकेला उपायुक्त, संतोष सरीखे पत्रकारों के जज्बे को सलाम
झारखंड जर्नलिस्ट एशोसिएशन के अध्यक्ष पर सचिव ने लगाये गंभीर आरोप
मुख्यमंत्री जनसंवाद 181 ने भी नहीं ली इस अमानवीयता की सुध !
मैला साफ करने को मजबूर है एएनएम
बढ़ी साझेदारी के बीच अब CNN IBNTV के रुप में दिखेगा tv18 और CNN
जादूगोड़ा चिटफंड घोटाले में दैनिक हिंदुस्तान का एक पत्रकार भी शामिल
झाविस चुनाव में मोदीजी का कुछ यूं हुआ पहला संबोधन !
दैनिक खबर मंत्र के निदेशक और मालिक के खिलाफ राजभवन के सामने महाधरना देगें बंधन तिग्गा
इस वीडियो ब्लॉगर के सपोर्ट में नहीं दिख रहा मीडिया का कोई धड़ा या संगठन ?
दैनिक भास्कर ने आतंकी के बाद बीएसएनएल कर्मी बताया!
सीएम नीतिश के चहेते जदयू विधायक के गांव में अवैध शराब पर पुलिस का गंदा खेला !
अब इस रिपोर्टर का कौन सा ईलाज करेंगे नालंदा एसपी !
IAS एसोसिएशन के खिलाफ पटना हाई कोर्ट में जनहित याचिका
भला-चंगा आदमी अस्पताल में भर्ती होकर खबर छपवा लिया !
भुखमरी के कगार पर पहुंचे कशिश न्यूज चैनल के लोग !
भगवान बिरसा जैविक उद्दान में लूट और मनमानी का आलम
लालू-नीतीश के लिए दो क्विंटल की माला तैयार करने का ऑर्डर
खबर देने वाली एजेंसी UNI की खबर न किसी ने दिखाई न छापी !
दैनिक हिन्दुस्तान ने किसान का करा दिया हवा में पोस्टमार्टम!
रंजीत बेज हत्याकांडः पुलिस के हाथ खाली, लेकिन हिन्दुस्तान अखबार का खुलासा देखिए
राहुल गांधी के बाद कांग्रेस का टि्वटर अकाउंट भी हैक, किए गंदे ट्वीट्स
उत्तराखंड के सीएम हरीश रावत ने कहा, गौ-हत्यारों को नहीं है भारत में रहने का अधिकार
झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष के खिलाफ माहौल गर्म

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Loading...