पूँजीवादी कारपोरेट मीडिया का राजनीतिक अर्थशास्त्र

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paid-newsअख़बारों से लेकर टेलीविज़न पर किस्म-किस्म के धारावाहिक, खेल, संगीत, ख़बरें आदि लगातार सूचनाओं को हमारे मस्तिष्क पर बरसाते रहते हैं। अक्षरों, तस्वीरों, आवाज़, चलचित्र, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक संकेतों पर सवार हो सूचनाएँ चारों ओर दुनियाभर में लोगों पर बरसती हैं। हर जगह तश्तरियाँ, रिसीवर लिये हम बैठे रहते हैं। सैटेलाइट से घिरी दुनिया में टेलीविजन और इण्टरनेट सूचना के सबसे शक्तिशाली माध्यमों के रूप में खड़े हुए हैं। इनकी बदौलत हम लोगों की आँखें समुद्र की गहरायी से अन्तरिक्ष की अनन्तता तक पहुँच जाती हैं। मलेशिया के जहाज़ डूबने की कहानी, तुर्की का ट्विटर प्रतिबन्ध, अण्टार्टिका पर ग्लोबल वार्मिंग का असर, फ़िलिस्तीन में गृहयुद्ध, शेयर बाज़ार का चढ़ना-गिरना, चुनावी नेताओं का ‘तू नंगा-तू नंगा’ का खेल, दंगे, क्योंकि सास भी कभी बहू थी, कार्टून में बैटमैन-सुपरमैन आदि द्वारा दुनिया को बचाया जाना – ये सारी सूचनाएँ बेतरतीबी से हमारे मष्तिष्कों पर टूट पड़ती हैं। निश्चित रूप से मलेशिया के जहाज़ का गिरना एक सच्चाई है; परन्तु उसी समय मलेशिया में मज़दूरों की फ़ैक्टरियों में हो रही मौतें इन ख़बरों से ग़ायब होती हैं। इतिहास ग़ायब हो जाता है। मारुति के गिरफ़्तार 146 मज़दूर ग़ायब रहते हैं पर भारत के द्वारा टी-20 वर्ल्ड कप हारने पर लाखों दिल टूटने और युवराज के घर पर पत्थर बरसाया जाना बड़ी ख़बर बन जाता है। अरविन्द केजरीवाल का अपनी वैगनआर गाड़ी पर बैठकर धरना तो बड़ी ख़बर बन जाता है पर दिल्ली के हज़ारों मज़दूरों का दिल्ली सचिवालय पर ठेका प्रथा ख़त्म कराने के लिए किया प्रदर्शन किसी भी चैनल पर प्रसारित नहीं होता है। क्या कारण है कि सद्दाम हुसैन, गद्दाफ़ी की मौत का जश्न, इराक़ की हार, अफ़गानिस्तान की हार को विश्व शान्ति के लिए उठा क़दम बताया जाता है, लेकिन जब दूसरी ओर इस शान्ति के नीचे बेगुनाहों का ख़ून रिसता रहता है, तो न तो उस ख़ून को देखने के लिए आँखें मिलती हैं और न ही उन चीख़ों को सुनने के लिए कान। स्पष्ट है कि मौजूदा मीडिया कुछ ख़बरें हम तक पहुँचाता है, जबकि कुछ अन्य ख़बरें हम तक पहुँचने से रोकता है। वास्तव में, वह जो ख़बरें हम तक पहुँचाता है उनमें से अधिकांश का देश व दुनिया की बहुसंख्यक आबादी के लिए कोई वास्तविक महत्त्व नहीं होता है। जबकि अप्रासंगिक सूचनाओं और ख़बरों को व्यापक पैमाने तक उन लोगों तक पहुँचाया जाता है और उनके लिए उन्हें अहम भी बना दिया जाता है। ऐसा क्यों है? मीडिया को तो लोकतन्त्र का चौथा खम्भा कहा गया है! ऐसे में मीडिया हमारे समय की प्रातिनिधिक ख़बरों और यथार्थ को चित्रित क्यों नहीं करता है?

इसका जवाब जानने के लिए यह जानना होगा कि तमाम मीडिया उपक्रम किनके द्वारा नियन्त्रित किये जाते हैं? वे किनकी सेवा करते हैं? वे किनके हितों की नुमाइन्दगी करते हैं? उनका मालिक कौन है? इन सवालों का जवाब जानकर ही हम आज मीडिया की भूमिका को समझ सकते हैं। टेलीविजन व बाद में इण्टरनेट के जन्म के साथ मौजूदा मीडिया का विकराल ढाँचा खड़ा हुआ है। यह फ़ेसबुक, ट्विटर आदि से लेकर अख़बार, टेलीविजन के व्यापक संजाल से बना हुआ है। साम्राज्यवाद के जिस चरण को आज भूमण्डलीकरण कहा जा रहा है उसमें सूचना का भी ज़बरदस्त भूमण्डलीकरण हुआ है। पूँजीवाद के साम्राज्यवाद की मंज़िल में पहुँचने का मतलब वित्तीय पूँजी के परजीवी, अनुत्पादक और सट्टेबाज़ चंगुल द्वारा पूरी धरती की जकड़बन्दी है। पूँजीवाद का मौजूदा भूमण्डलीय तन्त्र आज ‘तीसरी दुनिया’ के देशों में मास मीडिया के ज़रिये अभूतपूर्व रूप से व्यापक पैमाने पर जनमानस को अपने हितों के अनुसार अनुकूलित करने का प्रयास कर रहा है। पूँजीवादी सिद्धान्तकारों द्वारा दर्शन के क्षेत्र में प्रगतिशील व क्रान्तिकारी दर्शन और विचारधारा के खण्डन के लिए जो वैचारिक कचरा परोसा जाता है, उसी का बाज़ारू लोकप्रिय संस्करण टी.वी., सिनेमा, विज्ञापनों आदि के द्वारा व्यापक जन आबादी के समक्ष पेश किया जाता है। पूँजीपति वर्ग अपने विचारधारात्मक वर्चस्व को क़ायम करने और बनाये रखने के लिए मौजूदा मीडिया का कुशल व सूक्ष्म इस्तेमाल कर रहा है। वह पूँजीवाद की विजय को अन्तिम, पूँजीवाद को अजर-अमर बनाकर पेश करने का प्रयास कर रहा है, या यह सिद्ध करने का प्रयास कर रहा है कि पूँजीवादी व्यवस्था अपने तमाम नकारात्मक समेत मनुष्यों के समक्ष एकमात्र विकल्प है। यह सूचनाओं से एक विभ्रम का निर्माण करता है जो मौजूदा व्यवस्था के हित में होता है। परन्तु ऐसा भी नहीं है कि यह एक ऐसा मायाजाल है जिससे पार नहीं पाया जा सकता है। प्रभुत्वशाली पूँजीवादी मीडिया के वर्चस्व के बरक्स क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया का प्रति-वर्चस्व स्थापित करना आज के समय में क्रान्तिकारी शक्तियों के समक्ष एक अहम कार्यभार है। लेकिन फ़िलहाल हम इस विषय पर चर्चा नहीं करेंगे।

फ़िलहाल हम इस विषय तक अपने आपको केन्द्रित रखेंगे कि यह मीडिया किस प्रकार से इज़ारेदारी के युग की वर्चस्वकारी प्रणाली के तहत काम करता है। इसके मूल तक पहुँचा जाये तो यह साफ़ हो जाता है कि सूचनाओं के इस व्यापक तन्त्र द्वारा पैदा किये गये मायाजाल की भी एक निश्चित संरचना होती है जो इज़ारेदारीकरण और साथ ही व्यवस्था के अन्तरविरोधों की झलक दिखा जाती है। मौजूदा मीडिया पूँजीवाद की आर्थिक संरचना के ऊपर ही खड़ा होता है और यह पूँजीवादी राजनीति, अर्थतन्त्र और संस्कृति से स्वायत्त नहीं होता, जैसा कि “निष्पक्ष, स्वतन्त्र मीडिया” में यक़ीन रखने वाले लोग समझते हैं। “निष्पक्ष, स्वतन्त्र, स्वायत्त मीडिया” एक मिथक है। पूँजीवादी मीडिया का तन्त्र इसकी अधिरचना का एक मुख्य अंग है। अधिरचना के शीर्ष राज्यसत्ता को चुनौती देने के लिए मीडिया की अट्टालिका के खि़लाफ़ मोर्चा बाँधना ही पड़ता है। मीडिया के राजनीतिक अर्थशास्त्र के ज़रिये ही हम पूँजीवादी आर्थिक आधार और इसके बीच के सम्बन्ध को देख सकते हैं। यह सम्बन्ध भी कोई ‘बाइनरी मैपिंग’ नहीं होता है बल्कि एक जटिल सम्बन्ध होता है। इस जटिल सम्बन्ध की व्याख्या ज़रूरी है। मीडिया का राजनीतिक अर्थशास्त्र इसकी संरचना को समझकर इसके सही बोध तक पहुँचने में मदद करता है।

सबसे पहला और अहम सवाल तो यह है कि मीडिया पर मालिकाना किसका है? पूरे विश्व में महज़ 7 इज़ारेदार कम्पनियाँ हैं जो पूरे सूचना तन्त्र को संचालित करती हैं। रेडियो, टीवी, अख़बारों, किताबों के माध्यमों पर इनका ही वर्चस्व है। संगीत के मार्केट, फ़िल्म स्टूडियो, न्यूज़ चैनल, अख़बार, पुस्तक प्रकाशन, रेडियो आदि लगभग सभी सूचना तन्त्रों पर इनका ही दबदबा है। वायकॉम, डिज्नी, एओएल.टाइम वार्नर, सोनी, विवेण्डी, न्यूज़ कॉर्पोरेशन व बेर्टेल्समैन मीडिया जगत की वे 7 इज़ारेदार कम्पनियाँ हैं जिनका 90 प्रतिशत बाज़ार पर क़ब्ज़ा है। इनमें से तीन अमरीकी कम्पनियाँ हैं (हो भी क्यों न! अमरीका दुनिया में दूसरे नम्बर पर मनोरंजन निर्यात करता है)। आज से 20 साल पहले तक कोई भी मीडिया में इज़ारेदारी का यह स्वरूप और पैमाना नहीं सोच सकता था। रूपर्ट मर्डोक की न्यूज़ कारपोरेशन, सम्भवतः दुनियाभर की सबसे आक्रामक नवोन्मेषक है, हालाँकि सोनी, बेर्टेल्समैन या ए.ओ.एल.-टाइम वार्नर का ज़िक्र भी किया जा सकता है। पर मर्डोक के पास जो उपग्रह टीवी सेवाएँ हैं, वे एशिया से यूरोप और लैटिन अमेरीका तक फैली हैं। 7 भाषाओं में प्रसारित होने वाले 30 चैनल के साथ एशिया में स्टार टीवी का दबदबा है। चीन में न्यूज़ कॉर्पोरेशन, टीवी सर्विस, फिनिक्स टीवी में इसका 45 प्रतिशत शेयर हैं, जो अब साढ़े चार करोड़ घरों तक पहुँचता है और बीते वर्ष उसके विज्ञापन राजस्व में 80 फ़ीसदी बढ़ोतरी हुई है। और यह ब्यौरा तो सिर्फ़ न्यूज़ कार्पोरेशन की समूची सम्पत्ति के पोर्टफ़ोलियो की महज़ शुरुआत हैं। ट्वेण्टियेथ सेंचुरी फ़ॉक्स फ़िल्म्स, फ़ॉक्स टीवी नेटवर्क, हार्पर कॉलिंस पब्लिशर, टीवी स्टेशन्स, केबल टीवी चैनल, मैगज़ीन्स और करीब 130 से ऊपर अख़बार और प्रोफ़ेशनल खेल टीम आदि का मालिकाना भी न्यूज़ कार्पोरेशन के पास है।

जहाँ पूरे विश्व पर इन 7 कम्पनियों ने अपना दबदबा क़ायम कर रखा है, तमाम देशों में दूसरे संस्तर पर कई इज़ारेदार कम्पनियाँ हैं जो अपने देशों के साथ इस विश्व बाज़ार को लालच भरी निगाह से देखती हैं। इनमें भी प्रमुखता से अमेरिका और यूरोप की कम्पनियाँ हैं। भारत की रिलायंस इण्टरटेनमेण्ट, सन टी.वी., ज़ी नेटवर्क जैसी कम्पनियाँ भी इसी त्रिज्या में आती हैं। ये मेक्सिको की तेलिविजिया, अर्जेण्टीना की क्लेरिन और वेनेज़ुएला की सिस्नेरोस ग्रुप जैसी ही है जिनका पहले संस्तर की इज़ारेदार कम्पनियों से अन्तरविरोध दुश्मनाना नहीं बल्कि दोस्ताना है और इनके बीच लगातार तमाम मेल-मिलाप होते रहते हैं। भारत के सन्दर्भ में मीडिया के मालिकाने की बात करें और इनके वैश्विक सम्बन्धों को देखें तो ऊपर दी गयी अवस्थिति और स्पष्ट हो जाती है।

भारत में मीडिया कम्पनियों का विश्व स्तर की कम्पनियों की तरह तो अभी संकेन्द्रण नहीं हुआ है, परन्तु क़दम उसी तरफ़ ही बढ़ रहे हैं। परन्तु यहाँ भी राजनीतिक अर्थशास्त्र के वही नियम लागू हो रहे हैं, जो पूरे विश्व में लागू होते हैं। नवीन जिन्दल और ज़ी टी.वी. के बीच चले झगड़े और नीरा राडिया टेप खुलासा जैसी घटनाओं से कभी-कभी इस जगत के अन्तरविरोध और अन्तर्सम्बन्ध उभरकर सतह पर आ जाते हैं।

भारत में 31 मार्च 2011 तक 82,000 प्रकाशक समाचार पत्र पंजीयक में दर्ज थे। 250 एफ़.एम. फ्रिक्वेंसी, और करीब 800 चैनलों (जिनमे 300 न्यूज़ चैनल हैं) भारत से अपलिंक और डाउनलिंक कर सकते हैं। यह विराट ढाँचा है, परन्तु भारत के इस मीडिया जगत को 100 से भी कम मीडिया कोंग्लोमेरेट संचालित करते हैं। सन टी.वी., आदित्य बिरला ग्रुप, ज़ी टीवी, स्टार नेटवर्क, आदि बड़े कॉर्पोरेशन मीडिया को संचालित करते हैं। लॉण्ड्री न्यूज़ की एक ख़बर के अनुसार लगभग हर न्यूज़ चैनल या अख़बार में राजनेताओं का पैसा लगा है। आदित्य बिड़ला ग्रुप का पैसा टाइम्स नॉउ, आजतक और इण्डिया टुडे में भी लगा है। वहीं रिलायंस नेटवर्क और नेटवर्क 18 का कोंग्लोमेरेट मिलकर भारत में स्टार के नेटवर्क को चुनौती दे रहा है। हिन्दी अख़बारों में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर जैसे अख़बारों का दबदबा है। वैश्विक ताक़तें भी भारत के बाज़ार में बड़ी ताक़तें हैं। वॉयाकॉम का कलर्स, जापान के सोनी कारपोरेशन का सोनी टी.वी. और उसके अन्य चैनल, मर्डोक का स्टार टीवी नेटवर्क सबसे बड़े चैनलों में से हैं। यहाँ भी बड़ी मछलियाँ लगातार छोटी मछलियों को खा रही हैं। भारत के यू टीवी का डिज़्नी द्वारा ख़रीदा जाना, नेटवर्क 18 और वायाकॉम का सामूहिक कोंग्लोमेरेट ऐसी ही घटनाएँ हैं जो आगे और गति से बढ़ेंगी। यह भी हो सकता है कि वैश्विक पैमाने पर छोटी मछली (रिलायंस जैसी) बड़ी मछली बन जाये।

मीडिया के पूरे राजनीतिक अर्थशास्त्र को समझने का एक आसान तरीक़ा विज्ञापन की पूरी राजनीति को समझना है। क्योंकि इन निजी कम्पनियों और इनके मुनाफ़े का अस्तित्व भी इस व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है। सभी बुर्जुआ अख़बार और बड़े मीडिया हाउस कारपोरेट से संचालित होते हैं व इनका मुनाफ़ा विज्ञापनों के ज़रिये आता है। विज्ञापन जगत इस मीडिया से ऑर्गेनिक (जैविक) तौर पर जुड़ा हुआ है और इसी कारण ख़बरों पर इसका भी प्रभाव होता है। राबर्ट मैक्चेस्नी कहते हैं कि – “विज्ञापनों की भूमिका का अध्ययन शायद यह समझने का सबसे अच्छा तरीक़ा है कि वाणिज्यिक मीडिया तन्त्र किस तरह से नवउदारवादी भूमण्डलीय वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ा हुआ है। अर्थव्यवस्था में सबसे बड़ी कम्पनियों द्वारा किया जाने वाला व्यापारिक व्यय विज्ञापनों से आता है। वाणिज्यक मीडिया तन्त्र एक ज़रूरी प्रसारण यन्त्र है, जिसके ज़रिये माल को दुनियाभर में प्रचारित किया जा सकता है। निस्सन्देह भूमण्डलीकरण इसके कारण ही अस्तित्व में आ पाया है। लगभग दुनियाभर के विज्ञापनों पर किये जाने वाले ख़र्च का तीन चौथाई हिस्सा केवल 20 मीडिया कम्पनियों की जेब में जाता है। विज्ञापनों पर किये जाने वाला ख़र्च टीवी के वणिज्यिक उपयोग के खुलने के बाद बहुत तीव्र गति से बढ़ा है, और यह सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर से दुगुनी तेज़ी से बढ़ रहा है। उदाहरण के तौर पर लातिन अमेरिका द्वारा विज्ञापनों पर किया जाने वाला ख़र्च 2000-2001 तक 8 फ़ीसदी तक बढ़ने का अनुमान है। इस 350 बिलियन डॉलर के उद्योग के समन्यवक सिर्फ़ 5 या 6 सुपर-ऐड एजेंसियाँ हैं जो पिछले दशक में अस्तित्व में आयी हैं और पूरी दुनिया के व्यापार पर प्रभुत्व रखती हैं।” पूरे विश्व में विज्ञापन उद्योग में इज़ारेदारीकरण उतना ही स्पष्ट है जितना कि वैश्विक मीडिया में और ये दोनों आपस में जुड़े हुए भी हैं। “एक विज्ञापन एक्ज़ीक्यूटिव के अनुसार मेगा एजेंसियाँ, मेगा ग्राहकों के व्यापार को सँभालने के लिए एक अद्भुत स्थिति में हैं।” (राबर्ट मैक्चेस्नी, ‘ग्लोबल मीडिया, नियोलिबरलिज़्म, एण्ड इम्पीरियलिज़्म’, मन्थली रिव्यू)

नोम चोम्स्की ने अपनी प्रसिद्ध रचना ‘मैन्युफ़ैक्चरिंग कंसेण्ट’ में कुछ मानदण्डों को ‘फ़िल्टर’ बताया है जिनसे हर सूचना को गुज़रना पड़ता है। ये हैं – (1) मालिकाना (2) विज्ञापन (3)पत्रकारिता के स्रोत (4) राजनीतिक बन्दिश (5) कम्युनिज़्म-विरोध। वास्तव में मोटे तौर पर यही वे मूल बिन्दु हैं जिनसे मीडिया का राजनीतिक अर्थशास्त्र व्याख्यायित होता है। हम इसी तर्क पर आगे पत्रकारिता की आज़ादी के सिद्धान्त को देखेंगे। आज पत्रकारिता की आज़ादी की बात करना मज़ाक़ बन चुका है। हाल ही में पेड न्यूज़ के तमाम खुलासों ने इस जगत में व्याप्त भ्रष्टाचार को ज़ाहिर कर दिया है। अगर किसी भी अख़बार या न्यूज़ चैनल की बात करें तो इन्हें लगातार ख़बरों के लिए कच्चे माल की ज़रूरत होती है। टीवी के कार्यक्रमों के स्लॉट बँटे होते हैं और उनके समय भी। तो ख़बरें लगातार कैसे पहुँचती हैं? रिपोर्टर और कैमरामैन हर जगह तो ख़बरों की तलाश में मौजूद नहीं हो सकते हैं। दरअसल संसद भवन, विधान सभा, सुप्रीम कोर्ट, सी.बी.आई., शेयर मार्केट, सेना तथा तमाम चुनावी पार्टियों के दफ़्तर ही ख़बरों के मुख्य स्रोत होते हैं। तमाम बड़े बिज़नेस कॉर्पोरेशन भी इन ख़बरों के बड़े स्रोत होते हैं। स्थानीय स्तर पर मीडिया के पुलिस विभाग, मुख्यमन्त्री निवास, डीसीपी ऑफ़िस आदि के बीट होते हैं। यानी ख़बरों के सबसे बड़े स्रोत नेताशाही, नौकरशाही और पूँजीपति वर्ग के प्रतिष्ठान ही होते हैं। किसी भी दिन का अख़बार उठाकर देखिये तो साफ़ तौर पर इन स्रोतों से मिली ख़बरें मिल जायेंगी। चाहे वह किसी बड़े नेवी अफ़सर के सेवानिवृत होने की बात हो या देश की सीमा पर हो रही हलचल की बात हो। तमाम सरकारी विभाग तथा निजी कम्पनियाँ अलग से अपना प्रेस सेक्शन बनाकर रखते हैं जो प्रेस रिलीज़ व रिपोर्टें तथा प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित करते हैं। इससे अख़बारों और टीवी चैनलों की ख़बर के लिए कच्चा माल जुटाने का बड़ा ख़र्च बचता है। इसका एक उदाहरण डी.एम.आर.सी. (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन) है जिसका बकायदा एक प्रेस सेक्शन है जो यह देखने का काम करता है कि अख़बारों और टीवी के ज़रिये मेट्रो की छवि हमेशा लुभावनी ही जाये। मज़दूरों की मौतों, हड़तालों को ग़ायब कर चमचमाती हुई मेट्रो की तस्वीर पेश की जाती है। यह इन्होंने अमेरिका से सीखा है। अमेरिका में पेण्टागन और स्टेट डिपार्टमेण्ट करोड़ों डॉलर मीडिया के ज़रिये ‘साइकोलोजिकल वारफ़ेयर’ पर ख़र्च करता है। 2009 में पेण्टागन ने 47 करोड़ डॉलर सिर्फ़ पब्लिक रिलेशन बनाने पर ख़र्च किये। मिलिट्री के ज्वाइण्ट टाउन न्यूज़ सर्विस ने 2009 में करीब 5400 प्रेस रिलीज़, 3000 टेलीविजन रिलीज़ और 1600 रेडियो इण्टरव्यू अलग-अलग न्यूज़ चैनल, अख़बारों और रेडियो आदि को दिये। इराक़, अफ़गानिस्तान के खि़लाफ़ युद्ध के पक्ष में माहौल बनाने का काम यहीं से होता है। पत्रकारिता की आज़ादी एक मिथक है।

चौथा फ़िल्टर बनता है राजनीतिक हदबन्दी का। यानी अख़बार और न्यूज़ चैनल पर प्रसारित की जा रही ख़बर पर रोक लगाने के लिए सिर्फ़ राजनीतिक दबाव डलवाकर उसे रोका जा सकता है या किसी ख़बर को प्रमुखता से चलाया जाता है। पाँचवाँ फ़िल्टर बनता है कम्युनिज़्म-विरोध का। भारत में आज के दौर में हर प्रकार के व्यवस्था विरोध को “माओवादी”, आतंकवादी आदि बनाकर पेश करना इसी का उदाहरण है। स्तालिन, माओ के खि़लाफ़ तमाम कुत्साप्रचार हिस्ट्री चैनल, नैटजियो, डिस्कवरी आदि जैसे चैनलों, फ़िल्मों और न्यूज़ चैनलों, अख़बारों में हमेशा जारी रहता है। भाकपा (माओवादी) के वामपन्थी दुस्साहसवाद की अलग से आलोचना की जा सकती है, लेकिन छत्तीसगढ़, झारखण्ड के आदिवासी इलाक़ों में आदिवासियों पर सेना द्वारा किये जाने वाले कथनीय दमन, यातना और उत्पीड़न पर मीडिया ख़ामोश रहता है या फिर इन सबको आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई के तौर पर पेश किया जाता है, लेकिन असम और कश्मीर में भारतीय सेना बेगुनाहों का जो ख़ून बहाती है, उसे देश की सुरक्षा करना बताया जाता है। कश्मीर की वादियों और पूरे उत्तर-पूर्व में हो रहे क़त्लेआम की चीख़ें राष्ट्र की रक्षा के नाम पर दबा दी जाती हैं। ये पाँचों फ़िल्टर जिनका ज़िक्र चोम्स्की करते हैं वे एक हद तक मीडिया की सच्चाई को व्याख्यायित करता है।

सच तो यह है कि साम्राज्यवादी-पूँजीवादी व्यवस्था के अन्तर्गत सिर्फ़ ऐसा ही बुर्जुआ मीडिया खड़ा हो सकता है। यह इस पूरी व्यवस्था की लूट को बनाये रखने का एक महत्त्वपूर्ण हथियार है। जिस प्रकार “मुक्त व्यापार” पूँजीवाद राजनीतिक तौर पर अधिक पूँजीवादी जनवादी स्पेस मुहैया कराता था, उसी प्रकार वह मीडिया जगत में भी पत्रकारों, सम्पादकों, लेखकों, कलाकारों आदि को अधिक स्वायत्तता और स्वतन्त्रता देता था, और मीडिया सापेक्षिक अर्थ में ‘निष्पक्ष’ रह पाता था; लेकिन इज़ारेदार पूँजीवाद के उदय के साथ जहाँ राजनीतिक तौर पर भी पूँजीवाद अधिक से अधिक ग़ैर-जनवादी, निरंकुश और सर्वसत्तावादी होता गया, वहीं मीडिया भी पूर्णतः जड़ित (इम्बेडेड) होता चला गया; मीडिया के सापेक्षिक निष्पक्षता की बात करना भी बेमानी हो गया, पत्रकारिता के आदर्शों की चर्चा अप्रासंगिक हो गयी, कलाकारों की रचनात्मकता पूँजी द्वारा संचालित और बिकाऊ हो गयी। आज मीडिया खुले तौर पर पूँजीपति वर्ग के शासन के पक्ष राय बनाने का काम करता है। यहाँ तक कि जनता का एक हिस्सा भी मीडिया की पूँजी-परस्ती से वाक़िफ़ होने लगा है। विशालकाय मीडिया घरानों की आपसी प्रतिस्पर्द्धा अन्धी है और वे कई बार एक-दूसरे की भी पोल खोल देते हैं। शासक वर्ग के आपसी अन्तरविरोधों के कारण कारपोरेट मीडिया की असलियत एक हद तक आम लोगों के सामने भी आ जाती है।

लेकिन इन सबके बावजूद पूँजी की संरचना में पूर्णतः जड़ित मीडिया का व्यापक जनमानस पर गहरा प्रभाव है और समाज में यथास्थिति के पक्ष में राय बनाने में इसकी अहम भूमिका है। पूँजीवादी मीडिया के वर्चस्व के बरक्स आज एक वैकल्पिक मीडिया खड़ा करने की आवश्यकता है। ज़रूरी नहीं है कि यह वैकल्पिक मीडिया पैमाने और पूँजी के मामले में प्रभुत्वशील कारपोरेट मीडिया का मुकाबला करे। ऐसा मीडिया अपने स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं के बूते क्रान्तिकारी साहित्य को घर-घर पहुँचा सकता है, क्रान्तिकारी अख़बारों व पत्र-पत्रिकाओं को नुक्कड़-चौराहों, ट्रेनों, बसों, बस्तियों-कालोनियों तक पहुँचा सकता है। ऐसी नाट्य व संगीत टोलियाँ बनाये जाने की आवश्यकता है जो व्यापक आम मेहनतकश आबादी के बीच क्रान्तिकारी नाटकों, गीतों आदि के माध्यम से एक नये क्रान्तिकारी पुनर्जागरण और प्रबोधन की शुरुआत करे। यहाँ तक कि जनसंसाधनों के बूते पर अपने कम्युनिटी रेडियो स्टेशन व टीवी चैनल तक खोले जा सकते हैं। निश्चित तौर पर, पूँजीपति वर्ग ऐसे प्रयासों को कुचलने का हर-सम्भव प्रयास करेगा। लेकिन पूँजीवादी जनवाद जब तक इतनी गुंजाइश और स्पेस देता है, प्रगतिशील ताक़तों को उसका इस्तेमाल करना चाहिए। साथ ही, क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया के उपक्रमों को कुचलने का हर प्रयास पूँजीवादी जनवाद की भी पोलपट्टी को जनता के सामने खोलेगा। इसलिए, हर नज़रिये से आज ऐसे व्यापक क्रान्तिकारी वैकल्पिक मीडिया के एक पूरे ढाँचे को खड़ा करने की ज़रूरत है।

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