पुलिस ने 2 लाख की दंड राशि की जगह वीरेन्द्र मंडल को फर्जी केस में यूं भेजा जेल

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राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट से हुआ सनसनीखेज खुलासा

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के निर्देश के बाबजूद वीरेंद्र मंडल को दंड राशि 2 लाख रुपए अब तक एक पैसा भी नहीं मिला, वहीं उल्टे सरायकेला-खरसावां पुलिस ने उसे पिता समेत एसटीएससी एक्ट के झूठे मामले में फंसाकर जेल भेज दिया…”

राजनामा.कॉम। सरायकेला-खरसावां पुलिस प्रशासन के भ्रष्टाचार और लापरवाही की पोल धीरे-धीरे खुलती जा रही है। वीरेंद्र मंडल प्रताड़ना कांड में सरायकेला-खरसावां पुलिस राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की नजरों में दोषी साबित हुई है।

बाद में पुलिस ने वीरेंद्र मंडल को दूसरे कांड में अभियुक्त बनाकर जेल की हवा खिला दी। वे राजनगर थाना मैं दर्ज एक झूठे मामले में गिरफ्तार हो कर सरायकेला जेल में बंद हैं।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की यह रिपोर्ट तब सामने आई, जब कोडरमा, डोमचांची के निवासी मानवाधिकार कार्यकर्ता ओंकार विश्वकर्मा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से शिकायत की कि राजनगर पुलिस ने वीरेंद्र मंडल नामक युवक को क्रूरता पूर्वक प्रताड़ित किए।

बाद में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राजनगर थाना प्रभारी को दोषी पाया तथा झारखंड के मुख्य सचिव को पत्र लिखकर वीरेंद्र मंडल के मानवाधिकार हनन के कारण उसे प्रोटेक्शन ऑफ ह्यूमन राइट्स एक्ट 1993 के मुताबिक 2 लाख रुपए बतौर मुआवजा देने का आदेश दिया।

परंतु झारखंड सरकार व सरायकेला पुलिस-प्रशासन ने अब तक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के इस आदेश पर कार्यवाही नहीं की। उल्टे वीरेंद्र मंडल को मुखिया सावित्री मुर्मू द्वारा दर्ज कराए गए झूठे केस में फंसा कर सरायकेला जेल में डाल दिया।

सरायकेला-खरसावां पुलिस का यह दुस्साहस चैंकाने वाला है। क्योंकि पुलिस प्रशासन अगर किसी से डरता है तो वह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से, परंतु सरायकेला पुलिस ने तो हद पार करते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश को भी ठेंगा दिखा दिया।

आज कोडरमा के मानवाधिकार कार्यकर्ता ओंकार विश्वकर्मा ने पुनः राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को पत्र लिखकर यह सूचना दी है कि पुलिस ने बदले की कार्रवाई में वीरेंद्र मंडल को जेल भेज दिया है तथा झारखंड सरकार के मुख्य सचिव ने वीरेंद्र मंडल को अब तक मुआवजा के रूप में 2 लाख रुपया भी नहीं दिया है।

मालूम हो कि 10 जनवरी 2017 को राजनगर पुलिस ने डकैती के एक मामले में बनकटी गांव के निवासी वीरेंद्र मंडल को 5 दिनों तक थाना में रखकर बुरी तरह प्रताड़ित किया था। पुलिस ने उसके गुप्तांगों में पेट्रोल डाला और उल्टा लटकाकर बुरी तरह पीटा।

कोडरमा के मानवाधिकार कार्यकर्ता ओंकार विश्वकर्मा ने 11 अक्तूबर 2017 को इसकी शिकायत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से की। उन्होंने आयोग से पूरे मामले की जांच करने का अनुरोध किया।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने 7 दिसंबर 2017 को इस मामले में संज्ञान लिया और सरायकेला-खरसावां के एसपी से इस मामले की शिकायत और कार्यवाही रिपोर्ट की मांग की।

इस पर एसपी चंदन कुमार सिन्हा ने 12 मार्च को 2018 को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को रिपोर्ट भेजी। रिपोर्ट में एसडीपीओ चांडिल द्वारा जांच की गई दिनांक 3 फरवरी 2018 की रिपोर्ट भी संलग्न की गई। इस रिपोर्ट में वीरेंद्र मंडल को राजनगर थाना के थाना प्रभारी द्वारा पीटने की पुष्टि की गई थी।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि पीड़ित वीरेंद्र मंडल जख्मी था, परंतु पुलिस द्वारा उसका इलाज नहीं कराया गया। इससे पुलिस के भ्रष्टाचार और लापरवाही का पता चलता है।

रिपोर्ट में यह भी लिखा गया है कि अगर वीरेंद्र मंडल को थाना ले जाने से पहले उसकी मेडिकल जांच कराई जाती तो स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाती।

मानवाधिकार की रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि राजनगर थाना के थाना प्रभारी ने इन तथ्यों को थानाकी डेली डायरी में भी अंकित नहीं किया था। इसलिए आयोग द्वारा राजनगर के थाना प्रभारी को भ्रष्टाचार का दोषी माना गया तथा उनके ऊपर विभागीय कार्रवाई करने की अनुशंसा की गई।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने माना कि तरह पीड़ित वीरेंद्र मंडल के मानवाधिकार की अवहेलना की गई। इसलिए पीड़ित मुआवजे का अधिकारी है, क्योंकि अपने कर्मचारियों की गलती की जिम्मेदार राज्य सरकार होती है।

राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने झारखंड सरकार के चीफ सेक्रेट्री को आदेश दिया कि वे पीड़ित वीरेंद्र मंडल को 2 लाख रुपए मुआवजे के रूप में दें और कार्रवाई की रिपोर्ट तथा रुपए दे देना का सबूत 8 सप्ताह के अंदर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को भेजें।

इस बारे में वीरेंद्र मंडल के परिवार से पूछने पर पता चला कि एक साल बाद भी राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के आदेश का पालन सरकार ने नहीं किया। वीरेंद्र मंडल को अब तक एक पैसा भी नहीं मिला उल्टे सरायकेला-खरसावां पुलिस ने उसे एसटीएससी एक्ट के झूठे मामले में फंसाकर जेल भेज दिया।

वीरेंद्र के साथ उनके पिता को भी इस मामले में अभियुक्त बनाकर जेल की हवा खिला दी गई। आज मानवाधिकार कार्यकर्ता ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को यह भी लिखा है वीरेंद्र स्वतंत्र पत्रकार हैं। राजनगर पुलिस ने उन्हें सरेआम हथकड़ी डाल कर घुमाया। यह अपने आप में मानवाधिकार उल्लंघन का अति गंभीर मामला है।

विश्वकर्मा ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग से खुद पूरे मामले की जांच करने की मांग की है। ऐसा समझा जाता है की जल्दी ही सरायकेला खरसावां पुलिस प्रशासन पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाज गिरेगी। (स्रोतः आजाद मजदूर)

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