पुरातत्व विभाग उदासीनता से मायूस हैं चंडी के लोग

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कहीं गर्भ में ही दफन न हो जाये रुखाई गढ़ टीले में छुपी  पीढ़ियों का इतिहास

नालंदा (जयप्रकाश )। किसी ने सही कहा है “गम का पता जुदाई से और इतिहास का पता खुदाई से” ज्ञात होता है । यह पंक्ति  रूखाई गढ़ टीले पर सटीक बैठती है । अपने इतिहास से बेखबर, गुमनाम और वीरान यह टीला सैकड़ों वर्ष से अपने आप में एक समृद्ध विरासत और कई पीढ़ियों का इतिहास समेटे खड़ा है, जो कभी प्रलंयकारी बाढ़ से तबाह हो गई थीं ।

नालंदा जिला मुख्यालय बिहारशरीफ से 25 किमी दूर चंडी प्रखंड के रूखाई के इस गुमनाम टीले पर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के पुरातत्व विभाग की टीम की नजरें इनाइत हुईं । पिछले वर्ष  अप्रैल माह में टीम ने टीले की खुदाई शुरू की थी।

लगभग 13दिन तक पुरातत्व विभाग  इस टीले के दफन इतिहास को मिट्टी खोदकर निकालने में लगी थी।जैसे -जैसे कुदाल -फावड़े मिट्टी का सीना फाड़ते जाते वैसे -वैसे उत्खनन में तीन हजार वर्ष पूर्व के इतिहास की परते खुलती चली गई । मौर्यकाल, कुषाण वंश, गुप्त, पाल वंश  एवं सल्तनत वंश के समकालीन जीवन शैली एक ही स्थान पर पाए गए।

rukhai-chandi-nalanda-1इस पुरास्थल की खुदाई से ज्ञात हुआ कि लगभग दो किमी के दायरे में बौद्ध काल से भी यहां अपनी संस्कृति फैली हुई थी । एक समृद्ध नगरीय व्यवस्था थी। खुदाई में कई कुएँ  मिले ,जो शंग एवं कुषाण युग के संकेत देते है।

रूखाई के टीले के दो हिस्से में शंग,कुषाण काल के पक्की ईटों के आठ तह तक संरचनात्मक अवशेष प्राप्त हुए है । ऐसा माना जाता है कि रूखाई में नाग पूजा का भी प्रचलन रहा होगा ।उत्खनन के दौरान टेरीकोटा निर्मित सर्प की मूर्ति भी मिली थीं ।

साथ ही कुत्ता, नीलगाय की छोटी मूर्तियाँ भी मिली । सिर्फ इतना  ही नहीं अगर सही ढंग इसकी खुदाई की गई होती यहां ताम्र पाषाण युग का भी अवशेष प्राप्त हो सकता था । इससे पूर्व कि इस टीले में दफन कई इतिहास हकीकत बनते खुदाई पर ब्रेक लग गया । उत्खनन कार्य में लगे पुरातत्व विभाग के निदेशक गौतम लांबा ने तकनीकी कारणों से पुरास्थल की खुदाई पर सितम्बर तक ब्रेक लगा दी।

रूखाई गढ़ टीले के बारे में कहा जाता है कि यहाँ पांच बड़े खाई थे। जिस कारण इसका नाम रूखाई पड़ा । गाँव में कई प्राचीन खाई के अवशेष आज भी मौजूद है । ऐसा माना जाता है कि यहां भगवान बुद्ध के आगमन की किवदंती है। यह क्षेत्र नालंदा -पाटलिपुत्र के क्षेत्र में आता था । इसी  गाँव के पास ढिबरा पर में चीनी यात्री फाहियान के ठहरने की भी बात कही जाती है ।

इसी रूखाई में पुरास्थल की खुदाई में उतरीय कृष्ण मार्जित मृदभाण्ड (एनबीपीडब्लू) मिले है । इसे किसी सभ्यता एवं संस्कृति से जोड़कर देखा जाता है ।

इन मृदभाण्डो की मदद से समकालीन इतिहास के सामाजिक -आर्थिक पक्षों पर भी काफी रोशनी पड़ती है । जिसने भूतकाल के अनेक अज्ञात रहस्यो को उद्घाटित किया है । इन मृदभाण्डो को 600 ई. पूर्व से लेकर 200 ई. पूर्व तक जोड़कर देखा जाता है।

rukhai-chandi-nalanda-1यहां से उत्खनन में ठिकडे (मिट्टी के बर्तन ), मानव हड्डी, रिंग वेल, अनाज के दाने, मिट्टी का फर्श, मिट्टी के मनके, चित्रित धूसर मृदभाण्ड, सल्तनत काल के सिक्के, नगरीय व्यवस्था के अवशेष, पांच कमरों का मकान, सहित कई अवशेष मिले है ।

प्राप्त अवशेष के काल निर्धारण के लिए खुदाई में मिलीं सामग्री को पुणे के डेक्कन कॉलेज, लखनऊ के बीरबल-साहनी, हैदराबाद और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय भेजने की योजना थी।

रूखाई गढ़ टीले के कई इतिहास गर्भ में दफन है । अगर राज्य सरकार की नजर इनायत हो जाए तो इस क्षेत्र में पर्यटन की असीम संभावना हो सकती है ।

ऐसा माना जाता है कि इस टीले के सम्पूर्ण क्षेत्र की खुदाई में लगभग पाँच साल का वक्त लग सकता है । जिसके लिए 30लाख की राशि खर्च हो सकती है । राज्य सरकार खुदाई के लिए राशि आवंटित करें तो बौद्ध काल से भी पूर्व की एक समृद्ध विरासत की खोज हो सकती है ।

साथ ही रूखाई नालंदा  के अन्य स्थानों की तरह पर्यटक स्थल के रूप में मानचित्र पर आ सकता है । इस टीले के गर्भ में छिपे कई रहस्यो पर से पर्दा उठता कि इसी बीच आधे-अधूरे खुदाई के बीचसितम्बर में फिर से खुदाई का वादा कर पुरातत्व टीम लौट गई।

ग्रामीणों को आशा थी कि इसकी खुदाई लम्बी चलेगी । सितम्बर गुजरे दो साल हो गए  लेकिन अपने वादे के अनुरूप पुरातत्व विभाग की टीम नहीं लौटी। इंडस वैली के समकालीन सभ्यता का सपना देख रहे ग्रामीण खुदाई शुरू नहीं होने से निराश है कि शायद कहीं उनके पूर्वजों का इतिहास टीले में दफन न रह जाए। आज इसी टीले पर कई परिवार अपने पूर्वजों के इतिहास से बेखबर जीवन यापन कर रहे हैं। शायद अपने पूर्वजों की विरासत संभाले।

………नालंदा से पत्रकार जयप्रकाश की खोजपरक रिपोर्ट

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