पीटीआई और भाषा में हर साल करोड़ों का घपला !

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पीटीआई भाषा में हर साल केन्‍द्र सरकार मातृभाषा हिन्‍दी को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपये देती है। लेकिन हकीकत ये है कि हिन्‍दी को बढ़ावा देने के नाम पर इसकी हिन्‍दी इकाई भाषा बिना संपादक के वर्षों से चल रही है।

इतना ही नहीं भाषा छोड़कर जा चुके श्री कुमार आनंद का वहां के फोल्‍डर में अब भी नाम है। इतना ही नहीं कई छोड़ चुके या सेवा निवृत्‍त हो चुके कर्मचारियों के भी नाम फोल्‍डर में हैं। आखिर ये हेराफेरी क्‍यों। सरकार को इस तरह हिन्दी के ना पर हो रही लूट को रोकना चाहिए।

ताज्‍जुब तो यह है कि संवाददाताओं से डेस्‍क का काम लिया जा रहा है और वह भी पीटीआई के अंग्रेजी का टेक का उपसे सिर्फ अनुवाद कराया जा रहा है। हिन्‍दी क्षेत्रों में इनकी कार्यालय बंद होते जा रहे हैं। हैं। हिन्‍दी को बढ़ावा देने की कोई रणनीति नहीं है। बस अनुवाद के बल पर हिन्‍दी केा बढ़ावा मिल रहा है और सरकारी पैसा खुर्द-बुर्द किया जा रहा है।

बैलेंसशीट से पता चलता है कि पीटीआई समाचार एजेंसी नहीं रियल एस्‍टेट बन गई है क्‍योंकि मालिक सबक्रिप्‍शन के नाम पर भारी छूट का लाभ डठा रहे हैं। सर्कुलेशन कुछ और पीटीआई को पैसा कुछ। (साभारः फेसबुक

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