पहले डॉक्टर ने लूटा, फिर भगताईन ने ली एक विधवा आदिवासी की बिटिया की जान

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शोषण और उपेछा न गई गरीबी की दर से

मुकेश भारतीय

रांची। ओरमांझी प्रखंड के आनंदी गांव में एक आदिवासी समाज की विधवा की होनहार बेटी अचानक काल के गाल में समा गई। इस घटना के पीछे अशिक्षा, उपेक्षा, शोषण एवं गरीबी की दहलीज पर शासन-प्रशासन की उदासीनता साफ झलकती है।

पिछले दिन 10 वर्षीया निशा को गले के पास गिल्टी हो गई थी। उसी दर्द को दिखाने वह अपनी मां के साथ ओरमांझी प्रखंड चिकित्सा प्रभारी डॉ. आरबी सिंह के आवासीय निजी क्लीनिक गई थी। वहां उसका एक्सरे सहित सभी तरह के जांच किए गए। दो इंजेक्शन देने के उपरांत ढेर सारी दवाईयां लेकर घर जाने को कहा गया। घर पहुंचते ही निशा अकबकाहट के साथ उल्टियां करने लगी।

इससे उसकी मां घबरा गई और गांव के ही एक भगताईन के पास ले गई। उसकी मां बताती है कि भगताईन के प्रयास देख कर वह वेहोश हो गई और जब होश में आई तो पता चला कि उसकी बिटिया अब इस दुनिया में नहीं रही। सब कुछ 24 घंटो के भीतर खत्म हो गया।

anandiरांची में रेजा व दाई का काम करने वाली 32 वर्षीया एक विधवा उर्मिला मुंडा के पति सीताराम मुंडा की मौत आठ साल पहले भगवान बिरसा जैविक उद्यान के पास एक सड़क हादसे में हो गई थी। उर्मिला पर पांच बेटियों के लालन-पालन के साथ पढ़ाई लिखाई का भार आ गया।

सरकारी प्रावधानों के अनुसार उसे विधवा पेंशन मिलनी चाहिये थी लेकिन, उसे अब तक नहीं मिल सका है। उर्मिला बताती है कि उसे अब तक कोई सरकारी मदद नहीं मिली है। विधवा पेंशन के लिए उसने मुखिया, विधायक, सांसद समेत प्रखंड के काफी चक्कर लगाए और फिर थक-हार के बैठ गई।

बकौल उर्मिला, वह रोज लोगों के घरों के जूठे वर्तन मांजने और साफ सफाई करने   रांची जाती है। आस पास में काम मिलने पर रेजा का काम भी करती है। उसका एक ही सपना है कि उसके सारी बेटियां पढ़ लिख कर अच्छा काम करे। निशा पढ़ने-लिखने में काफी होनहार थी। उससे काफी उम्मीदे थी। लेकिन अब उसके आंसू के सिवा कुछ न बचा है।

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