पद्मश्री बलबीर दत्त आज की पत्रकारिता में अप्रासंगिक क्यों?

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आईनेक्स्ट के एडोटेरिल हेड शंभुनाथ चौधरी का विष्लेष्ण

झारखंड की पत्रकारिता के शीर्ष पुरुष बलबीर दत्त जी को पद्मश्री से नवाजा जाएगा। निश्चय ही यह हर्ष और गर्व का क्षण है। यह और बात है कि आज के दौर के कई पत्रकारों को बलबीर दत्त अप्रासंगिक लगते हैं। उन जैसी शख्सियत को आज की पत्रकारिता के माहौल में अप्रासंगिक माना जाता है, तो इसकी वजहें जानने की कोशिश जरूर होनी चाहिए। मेरी समझ के मुताबिक इसकी वजहें ये सकती हैं।

बलबीर जी अपनी कक्षा के हर विद्यार्थी को पहला मंत्र यह दिया करते – पढ़ो-पढ़ो-पढ़ो…लिखो-लिखो-लिखो। फिर विस्तार से इसकी व्याख्या कर बताते कि अच्छा पत्रकार वही होता है जो लगातार पढ़े, बार-बार पढ़े। इसी तरह कुछ लिखे तो उसे बार-बार लिखे। कुछ लिखे तो उसे ब्रह्मा की लकीर न समझ ले। दो बार लिखे, तीन बार लिखे। जो लिखे उसे पूरी तरह परख ले कि कहीं कोई गलती तो नहीं रह गई। अब आज के दौर की पत्रकारिता में यही सबसे फालतू बात समझी जाती है। पढ़ने से वास्ता नहीं और लिखा तो ज्यादा परखने की जरूरत नहीं।

बलबीर जी भाषा की शुचिता के प्रबल पैरोकार रहे हैं। भाषा शुद्ध हो, सरल हो। अब आज के दौर के पत्रकार उनके इस आग्रह को निरर्थक ही मानेंगे, क्योंकि आज पत्रकार बनने के लिए भाषा की शुद्धता या उसका ज्ञान तो कतई जरूरी शर्त नहीं।

बलबीर जी कहते हैं कि खबरों के प्रकाशन के पहले फैक्ट चेक बेहद जरूरी है। आप जो खबर लिख रहे हों, उसके तथ्यों को ठोंक-बजाकर परख लें। खबर धनुष से निकले तीर की तरह है। एक बार छप गई तो छप गई। उसका परिमार्जन शायद संभव नहीं। वह कहते हैं कि छपे हए शब्द इतिहास होते हैं। अगर आपने गलत लिखा तो संभव है कि इतिहास उस गलती को सच मान बैठेगा। यह अपराध है। आज किसी भी तरह ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव के चक्कर में दिन-रात लगे पत्रकार के लिए यह बात तो अप्रासंगिक ही है ना ! आज का पत्रकार सिर्फ आज की सोचता है, न बीते कल से उसका बहुत वास्ता है न ही आनेवाले कल से। उसे लगता है कि कुछ गलत लिख भी दिया तो क्या होगा? बहुत ज्यादा यही होगा कि अगले दिन चार लाइन का खंडन छापना होगा। वह किसी भी गलती के लिए अपराध बोध नहीं महसूस करता। बलबीर जी का दर्शन ठीक इसके उलट है। वह कहते हैं, खबर लिखते हुए बार-बार सोचिए कि कहीं आप जाने-अनजाने तथ्यों को उलटने-पलटने जैसा कोई अपराध तो नहीं कर रहे।

जिन लोगों ने बलबीर दत्त के साथ रांची एक्सप्रेस में 70 से 90 के दशक के बीच काम किया है, वह जानते हैं कि कैसे एक-एक शब्द की गलती सुधारने के लिए वह प्रति सप्ताह कक्षा लगाते थे। आज के संपादक को ऐसी बातों के लिए वक्त कहां ? जाहिर है कि बलबीर जी जैसे लोग अप्रासंगिक ही लगेंगे इस माहौल में।

आदरणीय बलबीर जी पत्रकारिता के वो शीर्ष पुरुष हैं, जिन्होंने झारखंड की धरती पर पत्रकारिता के संस्कार गढ़े। हजारों की तादाद में पत्रकार गढ़े। जिनके संपर्क में आकर, जिनकी बातें सुनकर, जिनसे ककहरा सीखकर सैकड़ों लोगों ने पत्रकारिता को जीने का सलीका सीखा। वह अाज के पत्रकारों को अप्रांसगिक लगते हैं तो इसमें किसका दोष है? यकीन मानिए, इसमें दोष हमारा है, हम पत्रकारों का है।

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