पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी ने लिखा- भाजपा को राजनीति का ककहरा सिखा दिया बिहार के जनादेश ने

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बिहार के जनादेश ने 2014 में खारिज हो चुके नेताओं को दोबारा केन्द्रीय राजनीति के बीच ना सिर्फ ला खड़ा किया बल्कि मोदी सरकार के सामने यह चुनौती भी रख दी कि अगर अगले एक बरस में उसने विकास का कोई वैकल्पिक ब्लू प्रिंट देश के सामने नहीं रखा तो फिर 2019 तक देश में एक तीसरी धारा निकल सकती है।’ अपने ब्लॉग (prasunbajpai.itzmyblog.com) के जरिए ये कहना है वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी का।

NDA_prasunnउन्होंने “राजनीति का ककहरा सिखा दिया बिहार के जनादेश ने ” शीर्षक से अपने ब्लॉग में लिखा है कि बीजेपी का यह भ्रम भी टूट गया कि बिना उसके नीतीश कुमार जीत नहीं सकते हैं। और नीतीश कुमार की यह विचारधारा भी जीत गई कि नरेन्द्र मोदी के साथ खड़े होने पर उनकी सियासत ही धीरे धीरे खत्म हो जाती। तो क्या बिहार के वोटरों ने पहली बार चुनावी राजनीति में उस मिथ को तोड़ दिया है, जहां विचारधारा पर टिकी राजनीति खत्म हो रही है।

यह सवाल इसलिये क्योंकि जो सवाल नीतीश कुमार ने बीजेपी से अलग होते वक्त उठाए और जो सवाल बीजेपी शुरु से उठाती रही कि पहली बार नीतीश को बिहार का सीएम भी बीजेपी ने ही बनाया।

तो झटके में जनादेश ने कई सवालो का जबाब भी दिया और इस दिशा में सोचने के लिये मजबूर कर दिया कि देश से बड़ा ना कोई राजनीतिक दल होता है। ना ही कोई राजनेता और ना ही वह मुद्दे जो भावनाओं को छूते हैं लेकिन ना पेट भर पाते है और ना ही समाज में सरोकार पैदा कर पाते हैं।

यानी गाय की पूंछ पकड़ कर चुनावी नैय्या किनारे लग नहीं सकती। समाज की हकीकत पिछड़ापन और उस पर टिके आरक्षण को संघ के सामाजिक शुद्धीकरण से धोया नहीं जा सकता। जंगल राज को खारिज करने के लिये देश में हिन्दुत्व की बेखौफ सोच को देश पर लादा नहीं जा सकता।

यानी पहली बार 2015 का बिहार जनादेश 2014 के उस जनादेश को चुनौती देते हुये लगने लगा जिसने अपने आप में डेढ़ बरस पहले इतिहास रचा और मोदी पूर्ण बहुमत के साथ पीएम बनें।

तो सवाल अब चार हैं। पहला क्या प्रधानमंत्री मोदी ने खुद को चुनावी जीत की मशीन मान लिया था? दूसरा, क्या नीतीश कुमार ने दोबारा विचारधारा की राजनीति की शुरुआत की है? और तीसरा, क्या लालू यादव आईसीयू से निकल कर दिल्ली के राजनीतिक शून्यता को भरने के केन्द्र में आ खड़ा हुये हैं? और चौथा, क्या कांग्रेस बिहार की जमीन से दोबारा खुद को दिल्ली में खड़ा कर लेगी?

जाहिर है यह चारों हालात उम्मीद और आशंका के बीच हैं। क्योंकि बिहार के जनादेश ने 2014 में खारिज हो चुके नेताओं को दोबारा केन्द्रीय राजनीति के बीच ना सिर्फ ला खड़ा किया बल्कि मोदी सरकार के सामने यह चुनौती भी रख दी कि अगर अगले एक बरस में उसने विकास का कोई वैकल्पिक ब्लू प्रिंट देश के सामने नहीं रखा तो फिर 2019 तक देश में एक तीसरी धारा निकल सकती है।

क्योंकि डेढ बरस के भीतर ही बिहार के आसरे वही पारंपरिक नेता ना सिर्फ एकजुट हो रहे है बल्कि उन नेताओं को भी आक्सीजन मिल गया, जिनका जिन टप्पर 2014 के लोकसभा चुनाव में उड़ गया था।

हालात कैसे बदले, यह भी सियासत का नायाब ककहरा है। जो राहुल गांधी लालू के मंडल गेम से बचना चाह रहे थे। जो केजरीवाल लालू के भ्रष्टाचार के दाग से बचना चाह रहे थे। सभी को झटके में लालू में अगर कई खासियत नजर आ रही है तो संकेत जनादेश के ही हैं। क्योंकि मोदी सरकार के खिलाफ लड़ा कैसे जाये इसके उपाय हर कोई खोज रहा है।

आज जिस तरह राहुल, केजरीवाल ही नहीं ममता बनर्जी और नवीन पटनायक से लेकर देवेगौड़ा को भी बिहार के जनादेश में अपनी सियासत नजर आने लगी तो दूसरी तरफ महाराष्ट्र में जो शिवसेना बिहारियों को ही मुंबई से भगाने पर आमादा रही उसने भी बिहार जनादेश के जरिये अपनी सियासत साधने में कोई कोताही नही बरती। और बीजेपी को सीधी सीख दी तो मोदी और अमित शाह की जोड़ी को भी सियासी ककहरा यह कहकर पढ़ा दिया कि अगर महाराष्ट्र में आज ही चुनाव हो जायें तो बिहार सरीखा हाल बीजेपी का होगा।

यानी बिहार के जनादेश ने देश के भीतर उन सवालों को सतह पर ला दिया जिसके केन्द्र में और कोई नहीं प्रधानमंत्री मोदी और अमित शाह है।

तो सवाल यही है कि क्या अब बीजेपी के भीतर अमित शाह को मुश्किल होने वाली है और प्रदानमंत्री मोदी को सरकार चलाने में मुश्किल आने वाली है। क्योंकि राज्यसभा में 2017 तक बीजेपी बहुमत में आ सकती है यह अब संभव नहीं है।

असहिष्णुता और सम्मान लौटाने का मुद्दा बिहार के बिगड़े सामाजिक आर्थिक हालात को पीछे ढकेल चुका है। और देश के सवालों को जनादेश रास्ता दिखायेगा यह बहस तेज हो चुकी है।

यानी सिर्फ बीजेपी या मोदी सरकार की हार नहीं बल्कि संघ परिवार की विचारधारा की भी हार है। यह सवाल चाहे अनचाहे निकल पड़े हैं। क्योंकि संघ परिवार की छांव तले हिन्दुत्व की अपनी अपनी परिभाषा गढ़ कर सांसद से लेकर स्वयंसेवक तक के बेखौफ बोल डराने से नहीं चूक रहे हैं। खुद पीएम को स्वयंसेवक होने पर गर्व है।

तो बिहार जनादेश का नया सवाल यही है कि बिहार के बाद असम, बंगाल, केरल , उड़ीसा, पंजाब और यूपी के चुनाव तक या तो संघ की राजनीतिक सक्रियता थमेगी या सरकार से अलग दिखेगी। या फिर जिस तरह बिहार चुनाव में आरक्षण और गौवध के सवाल ने संघ की किरकिरी की। वैसे ही मोदी के विकास मंत्र से भी सेंध के स्वदेशी सोच के स्वाहा होने पर सवाल उठने लगेंगे। तो तीन फैसले संघ परिवार को लेने है।

पहला, मोदी पीएम दिखे स्वयंसेवक नहीं। दूसरा नया अध्यक्ष दिसंबर में अमित शाह का टर्म पूरा हो रहा है] उत्तर-पूर्वी राज्यों के सामाजिक सरोकारों को समझने वाला है। और तीसरा संघ के एजेंडे सरकारी नीतियां ना बन जायें।

नहीं तो जिस जनादेश ने लालू यादव को राजनीतिक आईसीयू से निकालकर राजनीति के केन्द्र में ला दिया, वहीं लालू बनारस से दिल्ली तक की यात्रा में मोदी सरकार के लिए गड्डा तो खोदना शुरु कर ही देंगे।

(साभार: prasunbajpai.itzmyblog.com)

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