पत्रकारिता के जरिए पहाड़ ढाहने का दंभ भरने वाले भाइयों के लिए -2

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press-freedom (1)जन-सामान्य पत्रकारिता के नाम पर जो कुछ भी बाहर से देखता-समझता है, वह असलियत नहीं है, वह तो एक ‘सम्मोहन’ है, वास्तविकता इससे परे है। आम तौर पर पत्रकारिता दिशाहीन हो गई है। इसके लिए पत्रकारों को जिम्मेवार ठहराया जाता है। यह ठीक है कि व्यक्ति से समाज प्रभावित होता है। पत्रकार भी इसी समाज का अंग है। समाज का प्रभाव भी उस पर पड़ना स्वाभाविक है।

तर्क दिया जा सकता है कि पत्रकार तो समाज को प्रभावित करने के लिए यानी दिशा देने के लिए होता है, अगर वह प्रभावित हो जाएगा तो फिर समाज का क्या होगा? यह सवाल लाख टके का है। ऐसा तर्क देने वालों का कहना है कि पहले का पत्रकार देता था, लेता नहीं था। वह एक मिशन के तहत काम करता था। समाज और जन सेवा उसका उद्देश्य हुआ करता था।

मगर आज की पत्रकारिता उद्देश्यविहीन तथा दिशाहीन इस लिए हो गई है कि पत्रकार समुदाय अपने चरित्र और आदर्श को बचा कर रखने में सक्षम नहीं रह गये हैं। यह समुदाय भी सुविधाभोगी हो गया है। उसे वही दिखता है जो निहित स्वार्थ में वह समाज को दिखाना चाहता है। इसीलिए आज का पत्रकार अपने कार्य और जीवन में पारदर्शिता लाने का पक्षधर नहीं है।

आरोप यह भी लगता है कि आज के अधिकांश पत्रकार रूप-रुपया-रुतबा के दीवाने हैं, जो सहजता और सुगमता से प्राप्य हैं। एक पत्रकार बनने से पूर्व उसके अपने माप और मानदण्ड होते हैं,उसके पास ऐसी आदर्श और नीति होती है,जिसकी सराहना की जा सकती है, किन्तु तथाकथित पत्रकारों के आभामंडल से विस्मित होकर विस्फारित नेत्रों से चकित होकर अथवा यों कहें दिग्भ्रमित होकर वह उन्हीं का अनुयायी बन जाता है, क्योंकि वैसा करके उसे भांति-भांति के भौतिक सुख की प्राप्ति होती है।

इस प्रकार पत्रकारों का एक समूह तैयार हो जाता है, जो कतिपय लोभ और स्वार्थ में पत्रकारिता का उपयोग करता है। पत्रकारों का एक दूसरा वर्ग भी है,जो पत्रकारिता करने के लिए नहीं, बल्कि नौकरी करने के लिए इस पेषे को आधे-अधूरे मन या बेमन से स्वीकार करता है। एक तरह से विभिन्न क्षेत्रों मे हाथ अजमाने के बाद वह थका-हारा होता है। पत्रकारिता की नीतियों और सिद्धांतों से उसका दूर-दूर तक कोई सरोकार नहीं होता है।

ऐसे लोग अपनी नौकरी बचाने की चिन्ता में रहते हैं। इसलिए संपादक और प्रबंधक के अक्सर दबाव में रहते है और बड़े आसानी से गैरपत्रकारीय कार्यों में प्रवृत हो जाते हैं। पत्रकारिता के बहाने प्रबंधन को राजस्व उगाही में सहयोग करना, संपादकों और अन्य वरीय सहयोगियों के खुषामद करके उन्हें खुष करना नौकरी बचाए रखने के लिए इनकी मजबूरी होती है।

इस श्रेणी के पत्रकार प्रबंधन के इषारे पर जहां स्थानीय थाना से लेकर प्रषासन के आलाधिकारियों की जी-हुजूरी करते फिरतें हैं, वहीं संपादक के लिए रेल टिकट आरक्षित कराने से लेकर उनके हवाई टिकट का इंतजाम भी खुषी-खुषी करते हैं।

प्रशासन से मिलीभगत कर संस्थान के बिजली बिल में कटौती कराना, समय पर भुगतान न होने की वजह से कटे हुए टेलीफोन कनेक्षन का पुनस्र्थापित कराना, न्यूज प्रिंट लदे ट्रकों को नो इंट्री जोन में प्रवेष कराना,सरकारी विज्ञापनों के लिए सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के अधिकारियों व कर्मियों से सम्पर्क साधे रखना तथा अन्य नियम प्रतिकूल कार्यों में प्रबंधन को सहयोग करना इस श्रेणी के पत्रकारों की अतिरिक्त योग्यता होती है। अपनी इसी योग्यता से ऐसे पत्रकार प्रबंधन और संपादक के ‘प्रिय’ भी होते हैं।  

rakesh_pra

….. एक पत्रकार संगठन से जुड़े पत्रकार राकेश प्रवीर अपने फेसबुक वाल पर

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One comment

  1. मैने आपके समाचार पत्र में पत्रकारिता के जरिये …… लेख पढ़ा। बहुत ही शानदार लेख है। धन्‍यवाद।

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